Friday, March 15, 2019

नींद और जागरण



आज से नन्हे और सोनू ने योग सीखना आरम्भ किया है, ईश्वर से प्रार्थना है कि वे इसे जारी रखें और अपने जीवन को शुद्धतम बनाएं. आज स्कूल गयी थी, रास्ते में एक सहकर्मी अध्यापिका ने बताया, अभी तक उसके माँ-पिता जी उसका ध्यान रखते हैं और अकेले यात्रा करने पर चिंता व्यक्त करते हैं. उसकी खुद की बिटिया इतनी बड़ी हो गयी है कि जॉब कर रही है पर माता-पिता के लिए बच्चे कभी बड़े नहीं होते. कल कई कविताओं की मात्राएँ ठीक कीं, अतुकांत कविताओं के विषय में पढना होगा.
उसने एक बार पुनः सुना, विवेक का अर्थ है देह से स्वयं को पृथक जान लेना. देह में स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर तथ कारण शरीर तीनों ही आ जाते हैं. ज्ञानी विदेह अवस्था में रहता है. जगत में रहते हुए भी मुक्त अवस्था में ! साधना के बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है. विवेक की प्राप्ति में यह संसार सहायक है पर एक बार विवेक हो जाने के बाद संसार होते हुए भी विलीन हो जाता है. भक्ति, ज्ञान अथवा कर्म के मार्ग पर चलकर मन को शुद्ध करना प्रथम साधना है, जो साधक को करनी है. मन जितना-जितना शुद्ध होता जाता है, पुराने संस्कार नष्ट होते जाते हैं, अथवा तो ध्यान का संस्कार दृढ़ हटा जाता है और अंत में समाधि का अनुभव होता है. समाधि के समय क्या बोध होता है, इसको सुनना ही कितनी शांति से भर जाता है. चित्त समाधि का अनुभव करता है तो उस पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. समाधि के लिए ज्ञान और वैराग्य जीवन में साधना है. मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा यदि जीवन में होगी तभी साधना दृढ़ होगी.

ग्यारह बजने को हैं. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के ‘अभ्यास’ व ‘सत्व’ एप ने उसकी सुबहें ज्यादा प्राणवान बना दी हैं. सुबह क्रिया की फिर सूर्य नमस्कार व पद्म साधना भी. बाद में दो ध्यान किये, रुचिकर थे. कल बड़े भाई व छोटी बहन को भी इस एप के बारे में बताया. मौसम आज बेहद सुहावना है, कल रात वर्षा हुई. कल रात स्वप्न भी थे, जागरण भी था, नींद गहरी नहीं थी, पर वर्षा का पता भी नहीं चला, अर्थात भीतर का होश था बाहर का नहीं. कल दो हफ्ते के लिए नैनी की सास गाँव गयी है, उसके बिना सारे बच्चे व दोनों बहुएँ असहाय महसूस कर रहे हैं, एक-दो दिन में अभ्यास हो जायेगा उन्हें. जून आज जल्दी आने वाले हैं. सुबह अस्पताल गये थे रक्त की जाँच कराने, भोजन के बाद भी एक टेस्ट होगा. महीनों बाद आज कढ़ी बनाई है. काव्यालय से उपहार की सूचना आई है, एक पुस्तक ‘कनुप्रिया’ तथा एक चित्र अथवा तो गीति काव्य का एक सॉफ्टवेयर !

कल शाम नैनी को चावल चोरी करने के लिए मना किया. उसने स्वीकारा तो नहीं पर वह जानती है कि उसके सिवा कोई स्टोर में जाता ही नहीं. आज सुबह आई तो रोज की तरह ही व्यवहार कर रही थी, अर्थात उसका संस्कार गहरा है. परमात्मा ने उसे इस घटना का साक्षी बनाया है तो इसके पीछे कोई गहरा कारण है. उसके भीतर भी संदेह था. रोज सुनती पढ़ती है, ‘विचार ही वास्तविकता बन जाते हैं, अच्छे विचार चुनें’, तो जो विचार भीतर था वही सम्मुख आकर प्रकट हो गया है. न जाने कितनी बार भीतर संदेह का विचार पनपा होगा. यह सही है कि भरोसा किया था पर भीतर गहराई में संदेह भी था. जैसे वह संस्कार बदल नहीं पाती, नैनी भी अपने इस संस्कार को बदलने में अशक्य है. जीवन में उन्हें जो भी अनुभव होते हैं वह उनके ही पूर्व कर्मों के कारण होते हैं. बाहर माली द्वारा भेजा गया एक बूढ़ा व्यक्ति घास काट रहा है, उसे भी थोड़ा सा भोजन आज देना होगा.


2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व नींद दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    ReplyDelete