Monday, June 30, 2014

कन्याकुमारी का स्मारक


आज चेन्नई में उनका तीसरा और अंतिम दिन है. रात स्वप्न में उसे काले ग्रेनाइट की बनी एक इमारत, एक वृक्ष तथा एक विशाल छिपकली दिखे. होटल की खिड़की से बाहर सड़क पर लोग अपने-अपने काम से लौटते हुए दिख रहे हैं, उनमें से कुछ शायद अपने सम्बन्धियों से मिलने जा रहे हों. वे यहाँ घर से इतनी दूर भारत को खोजने निकले हैं, शायद खुद को भी. सुबह आठ बजे उन्होंने टाटा सूमो पर आज का सिटी टूर आरम्भ किया. तेरह किमी लम्बा मरीना बीच तथा उस पर स्थित एमजीआर व अन्ना के समाधि स्थल देखे. कुछ अन्य मन्दिरों में सुंदर प्रतिमाओं के दर्शन  किये. नल्ली तथा कुमारम् नाम की दो प्रसिद्ध वस्त्रों की दुकानों में भी गये. नल्ली इतनी विशाल है कि उसमें अनेकों प्रकार की लाखों साड़ियाँ होंगी. बच्चों को यहाँ की खरीदारी में कोई रूचि नहीं थी, उन्हें मनपसन्द आहार दिलाकर वे एक विशाल, आधुनिक शापिंग काम्प्लेक्स ‘स्पेंसर प्लाजा’ देखने गये. संध्या पौने छह बजे उन्हें चेन्नई से कन्याकुमारी के लिए प्रस्थान करना था.

सूर्योदय हो गया है और स्वर्णिम किरणें उसकी डायरी को छू रही हैं. वे ‘कन्याकुमारी’ पहुंचने वाले हैं. उसने भारत के इस सुंदर स्थान के बारे में कितना कुछ पढ़ व सुन रखा है जहाँ तीन सागर मिलते हैं, जहाँ वह चट्टान है जिस पर बैठ स्वामी विवेकानन्द ने उस  सत्य को प्राप्त किया था जिसे हर एक अपने अपने ढंग से खोज रहा है. यह ट्रेन कितनी साफ-सुथरी है. लोग विनम्र हैं. कल रात रेल कर्मचारी ने भोजन के लिए कूपन दिए. श्वेत प्लास्टिक की ट्रे में करीने से ढका भोजन परोसा गया. समूह के कुछ लोगों ने भोजन नहीं लिया, सम्भवतः दोपहर को उडुपी रेस्तरां में खाए गोभी कोरमा-चपाती, बिरयानी व दही-चावल का स्वाद वे अभी तक भूले नहीं थे. बहुत खोजने के बाद उन्हें शाकाहारी भोजनालय मिला था. कल ट्रेन में बच्चों ने कुछ देर शतरंज खेला. वे रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनों के नाम उच्चारित कर बहुत प्रसन्न हो रहे थे, चेंगलपट्टू, मेलमारूवट्टूर तथा डिंडीगुल आदि दक्षिण भारतीय नाम उनके लिए अनोखे थे. अभी वे सो रहे हैं. जून सामने की बर्थ पर बैठे पत्रिका पढ़ रहे हैं. सहयात्री शांत व सुशिक्षित दक्षण भारतीय हैं.

कल सुबह दस बजे उनकी ट्रेन कन्याकुमारी स्टेशन पहुँची, स्टेशन खाली था और स्वच्छ  भी, उन्हें अपना अपना सामान स्वयं उठाकर ऑटो रिक्शा तक ले जाना पड़ा. उन्हें स्टेशन से मात्र डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित विवेकानन्द आश्रम जाना था, जहाँ एक  रात्रि उन्हें ठहरना था. यहाँ का हरा-भरा शांत वातावरण, अनवरत बहती शीतल हवा के झोंके महसूस कर सभी यह एक से अधिक दिन रुकना चाहते हैं पर आज ही उन्हें प्रस्थान करना है. उन्होंने आश्रम के भोजनालय में दोपहर का सात्विक भोजन लिया फिर इसी केंद्र की निशुल्क बस द्वारा ‘विवेकानन्द स्मारक’ देखने गये. एक लांच में बैठकर अन्य कई यात्रियों के साथ वे उस चट्टान तक गये जहाँ लगभग एक शताब्दी पूर्व स्वामी जी ने बैठकर सत्य का साक्षात्कार किया था. वहीं निकट की चट्टान पर तमिल कवि थिरुवल्लुवर की एक सौ तेतीस फीट ऊंची प्रतिमा दर्शनीय है. उन्होंने ‘कुमारी अम्मन मन्दिर’ देखा, जहाँ पार्वती ने शिव के साथ विवाह की इच्छा की पूर्ति के लिए प्रार्थना की थी. संध्या को वे ‘गाँधी मंडपम’ भी देखने गये, जहाँ मरणोपरांत गाँधी जी के अवशेष जनता के दर्शनार्थ रखे थे. वापस आकर वे इसी आश्रम में एक प्रदर्शनी को देखने गये जिसमें भारत के इतिहास तथा स्वामी के जीवन चरित को चित्रों के माध्यम से दिखाया गया है.





4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अच्छी खबरें आती है...तभी अच्छे दिन आते है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. बहुत बहुत आभार !

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    1. स्वागत व आभार !

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