Sunday, November 10, 2013

स्माल वंडर - एक मजेदार कार्यक्रम


कल जून ने उसे बैडमिंटन का अभ्यास कराया, थोड़ी ही देर में थक गये, उनके अनुसार कम से कम एक महीने के ऐसे अभ्यास के बाद ही उसे प्रतियोगिता में खेलने का विचार बनाना चाहिए, लेकिन आज दोपहर उसे जाना है, हार भी हुई तो क्या, कम से कम एक शाम कुछ अलग तरह से बीतेगी. आजकल वे रोज शाम को small wonder देखते हैं, उन्हें खूब हंसाता है यह सीरियल, सोमवार से शुक्रवार तक हर रोज. आज माली ने खीरे, करेले और भिन्डी के बीज लगा दिए. उसका ध्यान आवाज पर गया तो याद आया, कारपेंटर आया है, बेडरूम में मच्छरदानी के लिए दो और रॉड लगाने के लिए, नन्हे के अकेले सोने के कारण उन्हें एक सिंगल नेट भी खरीदनी पड़ेगी. वह बड़ा हो रहा है और उसे भी आजादी पसंद है, आजकल रात को खुद किताब पढकर सोता है. मगर उसे सुबह जगाना वैसा ही मशक्कत का काम है जैसा पहले था.

कल रात अचानक कहीं से बादल आ गये और हर वर्ष की तरह बीहू पर वर्षा हो ही गयी है, बादलों से भरा आकाश, नीलिमा को पूरा ढक लिया है जैसे, सूर्य देव को भी हफ्तों बाद अवकाश  मिला है. इस समय वे एक मित्र परिवार का भोजन पर इंतजार कर रहे हैं, जून और नन्हा उनकी अहमदाबाद की यात्रा की योजना बना रहे हैं, मार्च में होने वाली उनकी यात्रा की मानसिक तयारी अभी से शुरू हो गयी है. यात्रा मन, प्राण को नई शक्ति से भर देती है, एक नई उमंग और जोश से भी, वर्ष में एक बार तो सभी को यात्रा करनी चाहिए.  उस दिन शनिवार को उनका बैडमिंटन का गेम अच्छा रहा, सौभाग्य से उसकी पार्टनर अच्छी थी, उन्होंने छह गेम जीते और winner रहे, लौटने में काफी देर हो गयी थी. जून ने खीर बनाकर रखी थी और डिनर के लिए सब्जी भी बना दी थी, नन्हा और वह दोनों उसकी ख़ुशी में शामिल थे. कल इतवार था, दोपहर को अमोल पालेकर की एक फिल्म देखी, अगले दो दिन बीहू का अवकाश है. वे क्लब जायेंगे, जहाँ बीहू मनाया जायेगा.

कल वे तिनसुकिया गये थे, शाम को नन्हे ने नैनी के बेटे की सहायता से आग जलाई, उन्ही की लेन में रहने वाले एक नये पड़ोसी भी पहली बार आए, मिसेज बहुत बात करती हैं, पतिदेव बीच- बीच में कुछ कह देते हैं. आज सुबह वैक्यूम क्लीनर की सहायता से सारे घर की सफाई की. इस वक्त नन्हा tell me why पढ़ रहा है और जून इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कब बत्ती बंद हो.

आज धूप आंख-मिचौली खेल रही है, कभी सूर्य बादलों के पीछे छिप जाता है और सुबह के वक्त ही शाम का अहसास होने लगता है, थोड़ी ही देर में झाँकने लगता है. ठंड भी बढ़ गयी है. बहुत दिनों से उसने कोई खत नहीं लिखा है. भाई-भाभी से फोन पर बात की, निहारिका की आवाज भी सुनी, अभी वह एक साल की हुई है और बोलने भी लगी है. कल शाम एक परिवार आया, वे एक दिश खरीद रहे हैं, और जून की सहायता चाहते हैं, आज सुबह नींद देर से खुली, देर होने पर जल्दी ही झुंझलाहट हो जाती है, ऐसी बातों पर भी जिन पर वैसे कभी ध्यान भी नहीं जाता है. उसने जून की मनपसन्द त्रिदाली बनाई है, पालक+बथुआ का साग भी. बहुत दिनों बाद पड़ोसिन से फूलों पर बात हुई, उसे लिली के बल्ब और अगले सीजन में गुलाबों की दो कटिंग्स चाहिए, अच्छा लगता है यह सोचकर कि उनके बगीचे में भी ऐसा कुछ है जो देने लायक है. माली आया और जल्दी ही चला गया, शायद उसे भी मौसम ने परेशान किया हो. कल घर स से दो पत्र आए और पिता के बनाय दो कार्ड भी मिले, इसके अलावा पुराने परिचितों के भी कार्ड्स मिले, नये साल पर वर्ष में एक बार ही सही, सब  कोई याद तो कर लेते हैं एक-दूसरे को और यह संदेश दे देते हैं कि हम भी हैं इसी धरती पर कहीं न कहीं. उसे ध्यान आया, जनवरी आधा बीत गया और उसने कुछ लिखा नहीं, परसों पिकनिक पर जाना है, शायद वहीं या रास्ते में ऐसा कुछ हो की कविता खुदबखुद फूट पड़े. आज दोपहर सूट की कटिंग करनी है, बहुत दिन हो गये हैं इस इंतजार में कि कहीं से कोई सहायता मिल जाएगी, पर ईश्वर भी उसकी सहायता करते हैं जो अपनी सहायता खुद करता है.




Tuesday, November 5, 2013

.कैक्ट्स के फूल


नये वर्ष का प्रथम सोमवार ! नन्हे ने इस साल अलग सोना शुरू किया है, उसी कमरे में उसका अलग पलंग बिछता है. उसके लिए यह एक बड़ा अनोखा काम है, पर इसकी वजह से वे नेट नहीं लगा पा रहे हैं, गुड नाइट से मच्छर भगाने होते हैं

आज दिन की शुरुआत बेहद अटपटे ढंग से हुई है, अभी वह नींद में ही थी कि फोन की घंटी बजी, सुबह-सुबह किसका फोन होगा अभी सोच ही रही थी कि घंटी बंद हो गयी. जून उसके लिए चाय बनाकर लाये और अपनी मीठी-मीठी समझदार बातों से उसके उखड़े हुए मूड को सीधा करके ही दफ्तर गये. आज उनके विवाह की साल गिरह है सो मन तो खुश है ही, और इस साल एक खास बात और है कि उन्हें एक दसरे को जानते हुए दो दशक हो गये हैं. उसने खुद को विश किया कि आज का दिन और यह पूरा साल खुश रहे ताकि जून भी खुश रहें और उनका बेटा भी. इस वक्त सुबह के दस भी नहीं बजे हैं, किचन का काम अधूरा है पर लॉन में पसरी धूप देखकर वह यहाँ हाले दिल सुनाने आ गयी है. कल शाम क्लब में Independence Day देखी, बहुत अच्छी फिल्म है, रोमांचक, विस्मयकारी, amazing फिल्म. देखते-देखते लग रहा था वे किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गये हैं. उसको भी हल्की सर्दी का अहसास हो रहा है, अक्सर एक हल्की सी कमजोरी का अहसास घेर लेता है, शायद उसी का असर मन पर हो रहा हो जो चीजों को उनके सही परिप्रेक्ष्य में नहीं ले पा रहा है.

कल शाम उन्होंने मित्रों के साथ ‘दिलजले’ फिल्म देखकर व गाजर का हलुआ खाकर विवाह की वर्षगाँठ मनायी, एक अच्छा भला परिवार कैसे एक नेता के कहने पर आतंकवादी होने का आरोप लगाकर बर्बाद कर दिया जाता है. वाकई नेता ऐसा कर सकते है पहले वह यकीन नहीं करती थी पर अब लगता है इस दुनिया में सब सम्भव है. कल उन्होंने कुछ पुराने खत भी पढ़े, प्रेम में लिखे खत.. कभी तो बचकाने लगते हैं पर उनमें उस तीव्रता का अहसास हर शब्द पर होता है, जो उन दोनों ने एक सा महसूस किया था और उस वक्त की सच्चाई थी. कभी कभी उसके मन में जो संशय उठता है कि कहीं... शायद वह बौद्धिकता की उपज हो, आधुनिकता का आवरण ओढ़ने की कोई दबी हुई आकांक्षा का.. मन यह क्यों न माने कि छलावा यह नहीं बल्कि वह था.

सुबह एक परिचिता का फोन आया कि शनिवार को लेडीज क्लब की ओर से होने वाले बैडमिंटन गेम में भाग ले, न कहना तो उसने सीखा नहीं है और कहा भी तो स्वयं को अनाड़ी बता के, खैर..अब उस दिन तीन बजे जाना है. आज बैंगन का भरता बनने में काफी समय लग गया. सुबह उठते ही जब ‘जागरण’ के लिए टीवी खोला तो DD I पर योगाभ्यास पर एक कार्यक्रम आ रहा था, साढ़े छह बजे वह खत्म हुआ तो फूल खिलाने वाली एक अनोखी कैक्टस प्रजाति ‘मेजाम्बिस’ पर एक फिल्म देखी, छोटे-छोटे पत्थरों के आकार के पौधे और उनमें खिले बड़े आकार के सुंदर रंगीन फूल बहुत अच्छे लग रहे थे, इस दुनिया में इतनी अनोखी और सुंदर वस्तुएं हैं कि कोई चाहे तो सारी जिन्दगी इसी में बिता दे. कल उन पुराने तेलगु मित्र का कार्ड आया, जून ने भी फौरन उन्हें भेजने के लिए कार्ड पर  लिखा we remember you all ! जून चाहे उनसे (यहाँ जब वह थे) विरोध करते रहे हों किसी बात पर दिल ही दिल में, सबके लिए स्नेह है उनके मन में. कल उसे समझा रहे थे..इन्सान को अच्छे बनने का प्रयत्न करना चाहिए.. और क्षमा बड़न को चाहिए.. आज उन्हें फील्ड जाना था पर नहीं गये किसी प्रॉब्लम की वजह से जो वेल साईट पर उठ खड़ी हुई है.





गाजर का हलुआ


नव वर्ष का प्रथम दिवस ! इस समय रात्रि के नौ बजने वाले हैं, वे लोग टीवी समाचार का इंतजार कर रहे हैं. नन्हे की तबियत ठीक नहीं है, गोहाटी में उसे सर्दी लग गयी थी, इसलिए आज स्कूल नहीं गया लेकिन नये साल का स्वागत करने में वह उन दोनों से आगे रहा, कल रात वह देर तक नहीं जग सकी और पुराना वर्ष कब नया बन गया पता ही नहीं चला. जबकि नन्हे ने जगकर सारे प्रोग्राम देखे, सवा बारह बजे अपने आप टीवी बंद किया और सुबह ड्राइंग रूम भी सजाया. शाम को दो-तीन मित्र परिवारों को चाय पर बुलाया था. टीवी पर असम में पिछले दो-तीन दिनों से हुए बोडो उग्रवादियों के हमलों पर रिपोर्ट आ रही है, एकाएक ही बम विस्फोट की वारदातें बढ़ गयी हैं, उनकी यात्रा शांति पूर्ण रही, यही सोचकर संतोष हुआ उसे. आज उसने सेवइयों की खीर बनाई और उम्मीद की कि उसकी मिठास सारे साल उनके साथ रहेगी.

टीवी पर सीताराम केसरी के सीपीपी लीडर चुने जाने की चर्चा हो रही है. नन्हा आज दिन भर अस्वस्थ रहने के बाद अब ठीक लग रहा है, शाम को उसके पेट में दर्द था, वे बाजार से नींबू और सोडा लाये. आज सुबह वह देर से उठी, जून को नाश्ता देने के बाद फिर सो गयी, रात को साढ़े बारह बजे तक टीवी पर hello new year देखकर देखकर सोयी थी. पर इस रतजगे का असर दिनभर बना रहा, दोपहर को ‘उपमन्यु चटर्जी’ की किताब पढ़ती रही, फिर शाम को वे घूमने गये. जून का कहना है, उनके घर पर आ जाने के बाद उसे कोई निजी कार्य नहीं करना चाहिए, सब काम ऐसे हों जो वे दोनों मिलकर कर सकें.

जून आज फ़ील्ड ड्यूटी पर हैं, सो देर से आएंगे. नन्हा भी खेलने गया है, आज वह कल से बेहतर है. नूना भी इस वक्त हल्का महसूस कर रही है, तन और मन दोनों से हल्का, पता नहीं अपने आप ही कभी मन ख़ुशी से भर उठता है, बेबात मुस्कुराने लगता है और कभी छोटी सी बात भी मन को भारी कर जाती है. शायद हारमोंस का कोई खेल हो. उसने अपने मन को संयमित करना भी तो छोड़ दिया है. योग-ध्यान किये हफ्तों हो गये हैं. आज सुबह वक्त से नींद खुल गयी, बाहर कोहरा बेहद घना था, बाद में धूप में वह टहलने गयी थी. शाम को इतनी ठंड बढ़ जाती है कि घर में बैठकर मूंगफली खाना और टीवी देखना ज्यादा अच्छा लगता है. माली ने धनिये के बीज डाले, डायन्थस और फ्लाक्स के पौधे अच्छी गति से बढ़ रहे हैं. अभी-अभी पेड़ से एक सूखा पत्ता पीठ पर गिरा लॉन में धूप चारों ओर बिछी हुई है और नीचे घास पर ध्यान से देखने पर नन्हे कीट रेंगते हुए दिख रहे हैं, शायद वे भी धूप का आनन्द उठा रहे हैं.


कल शाम जून का स्वेटर पूरा हो गया, आज वह पहन कर भी गये हैं, कल शाम साढ़े छह बजे वे आये, तिनसुकिया से ढेर सा समान लाये, लाल गाजर और खोया भी, उनके विवाह की वर्षगाँठ पर गाजर का हलुआ जो बनाना है उनके प्रेम की तरह मीठा...कल क्लब में लंच है वे शायद ही जाएँ, कहीं दूर से फोन की घंटी की आवाज लगातार आ रही है. 

Wednesday, October 16, 2013

आंवले का पेड़


दिल की बातें समझें ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं
दीवाने हम जैसे जग में रोज कहाँ खिलते हैं

धूप गुनगुनी चादर ओढें नदियों की भाषा भी बूझें
पत्थर-पत्थर पाँव बढ़ाएं ऐसे कदम कहाँ चलते हैं

आँखों से मन पढने वाले खो गये वे दिल मतवाले
भूले भूले से कुछ वादे अब शाम हुए से ढलते हैं

Be happy ! it is a way of being wise !
This is a golden advice, few moments earlier she was so miserable but now heart is swinging with swing.
बाल्मीकि रामायण में किषिकंधा काण्ड के अंतर्गत राम के मुख से ‘चौमासे’ का वर्णन अद्भुत है, कल्पना की उड़ान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक जाती है. उपमाएं भी नवीन हैं और भाषा इतनी सुंदर, उस काल में भी मन बादलों को देखकर कैसी अनोखी कल्पनाएँ किया करता था, कवि कालातीत होता है. वह हर युग में ऐसा ही रहेगा, भाव प्रवण हृदय लिए प्राकृतिक सुन्दरता से विभोर ! वह अपने हृदय में भी उन सभी विधाओं को उमगते, विकसित होते देखता है जैसे बाहर. उसका दिल और प्रकृति कब एक हो जाते हैं पता ही नहीं चलता संसार के सबसे सुंदर गीतिकाव्यों , महाकाव्यों में से है रामायण और रामायण में प्रक्रति का सुंदर चित्रण ! कल रात बल्कि सुबह  पौने तीन बजे नन्हा बेड से नीचे गिर गया, वह तो झट दुबारा सो गया पर उसे बाद में नींद नहीं आई. सुबह जून भी यही कह रहे थे.

कल दोपहर नन्हा अपने प्रोजेक्ट वर्क के लिए मैप बना रहा था, वे खाना खाकर लेटे ही थे कि  नन्हे ने आकर कहा कोई मित्र आए हैं, उसे इस वक्त किसी के आने की उम्मीद नहीं थी, पर उसकी वह सखी सीधा कमरे में ही आ गयी और उस दिन के व्यवहार के लिए क्षमा मांगने लगी, उसकी भी आँखें भर आयीं, और कुछ ही मिनटों में सारे गिले शिकवे दूर हो गये.

पिछले आधे घंटे से कुछ ज्यादा समय से वह पत्रिका के लिए कोई अच्छी कविता खोज रही थी, पर उसे लगा डायरी में लिखी सारी कविताएँ मन की अकुलाहट को प्रकट करने का साधन मात्र हैं, इतना तो समझ में आया कि दुःख एक सिलसिला है जो आगे भी जारी रह सकता है. यूँ भी सुख-दुःख जीवन में लगा ही रहता है. ऐसी कविता जो महज आत्मकाव्य के घेरे से बाहर आ सके अर्थात सबके पढ़ने के योग्य हो अथवा जिसका आयाम विस्तृत हो, सिर्फ दो हैं, जून ने भी उन्ही दो को ठीक करने को कहा है. लेख लिखने का समय शायद ही मिले. उसने बाहर जाकर देखा माली ने आंवले का पेड़ काफी काट दिया है, कटी हुई डालियों से बच्चे आंवले तोड़ रहे हैं. एक बूढ़ा  उनके यहाँ आंवले लेने आया करता था, उसने सोचा तुड़वा कर कुछ उसके लिए रखेगी,.

कल शाम को उन्हें यात्रा पर निकलना है, पहाड़ अपनी ओर खींच रहे हैं, बर्फ से ढकी चोटियां उन्हें निमन्त्रण दे रही हैं और मन में ख़ुशी लिए वे कल अपनी यात्रा आरम्भ करेंगे. ईश्वर उनके साथ है. आज पहली बार उसने दो स्वेटर पहने हैं, धूप में बैठना भला लग रहा है., पहाड़ों पर तो शायद तीन-चार पहनने पड़ें. जाने की तैयारी भी आज करनी है. ढेर सारे गर्म कपड़े, शालें, स्कार्फ, टोपियाँ, जुराबें और दस्ताने. कल सारे कार्ड्स पर जून ने पते लिख दिए, नये वर्ष से पहले ही सबको मिल जायेंगे. नन्हे के स्कूल में स्पोर्ट्स मीट चल रही है, कल उसने तीन events में भाग लिया, खेलकूद में उसकी उतनी रूचि नहीं है जितनी पढ़ाई में, जैसे वे भाई-बहन थे बचपन में. आज उसे जून का स्वेटर पूरा करने की पूरी कोशिश करनी है, सो वह उसी क्षण से जुट गयी.

शनिवार, ३ बजे हैं दोपहर बाद के. दो घंटे बाद उन्हें निकलना है, अगले दो घंटों में उन्हें तैयार होना है, नाश्ता खाना है और साथ के लिए पैक करना है. उसने सोचा एक बार अपने साथ बैठकर सभी चीजों का जायजा ले ले, यानि सभी कुछ व्यवस्थित करने के साथ अपने विचारों को भी व्यवस्थित कर ले. सुबह उसकी पड़ोसिन का फोन आया, उसे गुजराती स्टिच सीखना था, उसने बताया तो है पर वापस आकर पुनः बताएगी. एक हफ्ते के लिए घर से दूर जाते वक्त मन थोड़ा सा आशंकित तो है, ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि देगा और खास तौर से उसे कि सही निर्णय ले सके. छोटे-छोटे निर्णय, क्योंकि बड़े-बड़े तो जून के सुपुर्द हैं, उनके सुपुर्द कर दिया है स्वयं को और वह  सक्षम हैं उन्हें हर हाल में सुरक्षित रखने में. सो अब इस डायरी से विदा लेती है, वापस आकर फिर मिलेगी.

Tuesday, October 15, 2013

स्वप्नों का संसार



आज सुबह वह उठी तो रात देखे सपनों की बातें दिमाग में स्पष्ट थीं, अजीबोगरीब सपने, सोने से पहले टीवी सीरियल देखकर सोयी थी, जिसमें murder, kidnapping, war सभी कुछ था, इसी वजह से और उनकी यात्रा के प्रति आशंका लिए मन रात भर कल्पनाएँ बुनता रहा. एक नृत्यांगना भी देखी जो अख़बारों में English column भी लिखती है और भी कई बेसिर पैर की बातें... कल शाम क्लब में उसने जून से कहा, वह उसके बैडमिंटन खेल को प्रोत्साहित नहीं करते हैं, तो उन्होंने पता नहीं इसका क्या अर्थ लिया, उसे लगा, इन्सान अपने अलावा और किसी से भी अपने मन की बात नहीं कह सकता. बाद में एक बालिका से टीटी में हार गयी, खैर.. उसका अफ़सोस नहीं हुआ बल्कि आनन्द आया. लाइब्रेरियन ने पिछले हफ्ते ली एक साप्ताहिक पत्रिका north-east वापस करने के लिए कहा था, रद्दी में चली गयी है शायद, उसके बदले में कोई और पत्रिका देने से शायद काम चल जाये. सुबह-सुबह नन्हे को भी उपदेश सुनने पड़े...उसे लगता है कि उनका कोई असर होने वाला नहीं है सो चुप रहना ही बेहतर है, वह अपनी प्रक्रति के अनुसार एक ढर्रे में ढलता जा रहा है जिसे बदलना सम्भव तो है पर मुश्किल भी है.

इस वक्त उसका मन एक ऐसे दुःख को अनुभव कर रहा है जिसका अहसास पहले कभी नहीं हुआ, यदि हुआ होगा तो बरसों पहले जब किसी सखी ने स्कूल या कालेज में उसका दिल तोडा होगा. आज ऑंखें भरी हैं और दिल भारी, एक सखी के कुछ शब्द कानों में अब भी ताजा हैं, एक मित्रता की मौत कैसे होती है यह तो पता नहीं पर कहीं गहरे कुछ चटक जरुर गया है.

डायरी उठाई तो एक दर्द भरी कविता अंगड़ाई ले रही थी. सच ही है दुःख मानव को सृजनशील बनाता है. कल रात भी सपने देखती रही और एक पहेली का हल जो पहले नहीं मिल रहा था, काफी देर बाद मिल ही गया. सपने में ही पायी वह ख़ुशी अब भी याद है, कैसा सुकून मिला था, पर सपने आखिर सपने ही होते हैं. पहले-पहल जब आँख खुली तो शायद उसी स्वप्न की वजह से मन हल्का लगा कि शायद सब कुछ भुला दिया है पर कहाँ, जरा सा होश आया नहीं कि वही दंश भरे शब्द कानो को बेंध कर दिल को चीरते चले गये, शायद वह overreact कर रही है. उसे इस वाकये को इतनी अहमियत नहीं देनी चाहिए, पर उसका मन, उसका पागल मन किस कदर जुड़ा था, उसे ऐसी ठेस लगने पर प्रतिक्रिया स्वाभाविक नहीं क्या ? समय धीरे-धीरे सारे घाव भर देता है पर एक मित्र का दिया घाव ऐसा गहरा होता है कि समय के पास भी उसकी कोई दवा नहीं होती.. क्यों नहीं होती होगी अगर कोई लेना चाहे और न मिले ऐसा तो हो ही नहीं सकता, अचानक उसके मन के भावों में जोश भरने का श्रेय एक अन्य परिचिता को है, जो क्लब की पत्रिका के लिए कुछ लिखने का वायदा कर चुकी हैं, पहले भी वादे तो बहुतों ने किये पर निभाएं ऐसे लोग कम ही होते हैं. कल शाम जून ने जब उसका चेहरा देखा तो समझ गये, कुछ हुआ है. उस वक्त की उनकी परेशानी और उसके दुःख को अपना दुःख समझने की वह कोशिश ...उस पल वे दोनों कितना करीब आ गये थे, एक ही सोच में बंधे हुए, सुख की चरम सीमा में भी शायद इन्सान ऐसे ही बंध जाते हैं. ख़ुशी की याद आ रही है.. उसने सोचा, लक्षण तो अच्छे हैं, लगता है जल्दी ही इस सदमे से उबर जाएगी. पर पिकनिक के लिए जिस जोश और मूड की जरूरत होती है वह कहीं मर गया है.


Sunday, October 13, 2013

सिक्किम की सैर


फिर एक अन्तराल.. आजकल सुबह रजाई से निकलने का मन नहीं होता, ठंड बढ़ गयी है. नन्हा भी आजकल उठने में आनाकानी करता है, यूँ तो वह हर मौसम में करता है. ‘जागरण’ भी नहीं देख पाती और कोई अच्छी किताब भी नहीं पढ़ी है. कविता भी नहीं लिखी. पढ़ना-लिखना आजकल  बस अख़बार या इक्का-दुक्का पत्रिकाएँ पढ़ने तक ही सीमित रह गया है. क्लब मीट आने वाली है, पत्रिका के लिए मांगें तो प्रेरित होकर वह झट लिख सकती है, उसने सोचा ही था कि एक फोन आया क्लब की कमेटी के एक सदस्य का. इसी महीने वे लोग दार्जिलिंग जाने की बात सोच रहे हैं. साल का अंतिम महीना शुरू हुए पांच दिन बीत गये हैं, कुछ हफ्तों बाद नया साल आ जायेगा और इसी तरह साल दर साल गुजरते जायेंगे, नन्हा बड़ा हो जायेगा और...

छोटी बहन और मंझले भाई के पत्र आए हैं, जिनमें जवाब देने लायक बाते भी हैं. बहन ने अपनी जिस समस्या का जिक्र किया है वह उसके साथ भी है हूबहू वही. भाई ने अपने तबादले का जिक्र किया है. श्रीनगर में हुए बम विस्फोट में फारुख अब्दुल्ला बाल-बाल बचे, शांति और विश्वास (जो लोगों की शक्ति पर निर्भर है) की जीत होगी और हिंसा चाहे कितना भयानक रूप धारण कर ले एक दिन उसे मरना होगा क्योंकि अमन पसंद आदमी की जिन्दगी में उसकी कोई जगह नहीं. जून और नन्हा British comedy देखने के लिए तैयार हैं और वह भी कुछ देर पहले शुरू हुए सिर के दर्द को भूलकर बस हँसना चाहती है.

जून ने फोन पर बताया, २२ तारीख को उनकी सीट रिजर्व हो गयी है यानि वे दार्जिलिंग और सिक्किम जा ही रहे हैं. एक सहयात्री परिवार भी उनके साथ जा रहा है. बहुत दिनों बाद डीडी पर कवि सम्मेलन का एक अंश सुना ‘अंगड़ाई न लो चैत का आलस्य बिखर जायेगा’. अच्छी कविता थी. किसी सखी से एक किताब लायी थी, अभी शुरू भी नहीं की है, उसमें रूचि ही खत्म हो गयी है. वह बातें व्यवहारिक नहीं लगतीं या कहें कि उन पर चलना बहुत मुश्किल है. आजकल उसका अध्यात्मिक ग्राफ निचली तरफ जा रहा है फिर एक दिन कोई झटका लगेगा और ऊपर की ओर चढ़ना शुरू होगा. कभी रुककर, थम कर आराम से बैठकर अंतर में झांके तो पता चले कि वहाँ कितना सूनापन भर गया है. लेकिन दुनियादारी के प्रलोभनों में पड़ा मन कहीं विश्राम लेना ही नहीं चाहता, हर वक्त किसी न किसी उधेड़बुन में लगा ही रहता है तो भला जरूरत ही कहाँ महसूस होगी उसे तारनहार की. एक तरह से यह भी ठीक है, हर वक्त काम में लगे रहना, खाली न बैठना भी राजयोग का एक लक्ष्ण है, और उसे काम करना, करते-करते थक जाना अच्छा लगता है. जैसे कल टीटी की wall प्रैक्टिस करते समय महसूस हो रहा था.

पीटीवी पर एक आर्टिस्ट नजीर के बनाये खूबसूरत लैंडस्केप देखे, जिनसे नजरें हटाना मुश्किल था, इतने सुंदर चित्र भी बनाये जा सकते हैं, इन्सान भी एक जादूगर से कम नहीं. आज सुबह समाचर सुनते वक्त ख्याल आया कि कहीं अचानक वह मर जाये तो इन डायरियों का क्या होगा, जून इन्हें संभाल कर तो रखेंगे या फिर यूँ ही किसी के हाथ लग जाएँ और...कल दोपहर जून एक बड़ा सा पार्सल लाये, सलाद काटने के लिए SUZI CHEF नाम की एक hand operated मशीन भी थी  उसमें, सलाद अच्छा कटता है उसमें, अभी और कुछ तो काटकर देखा नहीं है. इस बार पिकनिक पर जाने का विशेष उत्साह है, सर्दियां ज्यादा खुशनुमा हैं इस बार, धूप खिली रहती है. इस समय भी लॉन में धूप पीछे पीठ को छूती हुई निकल रही है. कल शाम गुलाब के पौधों से मिलकर झड़ चुके गुलाबों की टहनियों को काटा, गुलदाउदी के पौधों को बांधा, पानी दिया. नन्हे के लिए नाईट ड्रेस सिली, जून और नन्हे दोनों ने ही तारीफ करके उसका हौसला बढ़ाया है.





Wednesday, October 9, 2013

गर्मागर्म पकौड़े


आज दिन बदली भरा है, सो हल्की ठंडक महसूस हो रही है आज काम जल्दी समाप्त करके उसे टोपी बनानी है. शाम को एक सखी के घर जाना है, उसका जन्मदिन है, उसके हाथ में हरी मिर्च छूने से जलन हो रही है, किसी पत्रिका में इसके मिटाने का उपाय पढ़ा था पर याद नहीं है, वक्त पर याद न आये ऐसे पढने से क्या लाभ, वह पत्रिकाएँ पढकर बहुत जल्दी ही भूल जाती है. लेडीज क्लब की मीटिंग में एक सरप्राइज गेम था, पर न तो वह विज्ञापन ही पहचान सकी न कलाकारों के चित्र, किसी ने कहा आप इतनी पत्रिकाएँ पढ़ती हैं, ठीक ही कहा, उसे ज्यादा पहचान होनी चाहिए, पर वह विज्ञापन न तो देखती है न पढ़ती है. टीवी पर ‘झूठी’ फिल्म आ रही है, माँ-पिता बहुत शौक से देख रहे हैं. कल शाम असमिया सखी बहुत दिनों बाद आयी, उसने पकौड़े बनाये, और लगा कि उसमें तेल बहुत लगता है, इतना तेल स्वास्थ्य के लिए शायद ठीक नहीं है, अच्छा है कि वह साल में एक या दो बार ही बनाती है. कल दोपहर ‘बुनियाद’ देखा, अच्छी लगती है लाजो जी की बातें और हवेलीराम का उसे ‘लाजो जी’ कहना. नन्हे का आज हाफ डे है, २६ से उसकी परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं शायद इसीलिए. नैनी बगीचे से मूला का साग तोड़ कर लायी है, इस वक्त काट रही है.

  
ठंड एकाएक पिछले दो दिनों से बढ़ गयी है, कल सारे स्वेटर, स्कार्फ आदि निकाल दिए, आज धूप दिखाने के लिए रखे हैं. जून आज सुबह माँ-पिता को गोहाटी तक छोड़कर वापस आ गये, उस दिन जब वे जा रहे थे उसकी आँखें भर आई थीं. उनका रहना उसे अच्छा भी लगा और कुछ बंधन सा भी था. फिर इतवार और कल का दिन नन्हे को पढ़ाते व पढ़ते बीते. इस बार उसे पढ़ाने में मेहनत कम लग रही है, जैसे-जैसे बड़ा हो रहा है उसे याद करने की अथवा रटने की जरूरत कम होती जा रही है.

पिछले दो दिन फिर मौन, कल सुबह आशा पारेख और धर्मेन्द्र के अभिनय में उलझी रही और परसों एक पुराने मित्र के लिए लंच बनाने में, पता नहीं क्यों उनसे मिलकर वह जिसे कहते हैं न दिल से ख़ुशी होना, वह नहीं हुई, जून भी उतना खुलकर नहीं मिले जैसे अन्य मित्रों से मिलते हैं. वह अपने दिल्ली वासी होने के या विदेश भ्रमण करने के गरूर में खोये से लगे खैर.. नन्हे से कहकर उनके बेटे के लिए कार्ड अवश्य बनाना है. कल रात जून से और भी कार्ड बनाने की बात कही थी, नया साल आने वाला है और उन्हें कई जगह कार्ड भेजने हैं. आज धूप नहीं निकली है सूरज बादलों के पीछे छिपा है, सर्दियों में धूप की कीमत कितनी बढ़ जाती है. जून आजकल खुश रहते हैं, कुछ दिनों की नियमित दिनचर्या से मिली आजादी को अच्छी तरह enjoy करते हुए ! कल पूरे एक महीने बाद उसने पत्रों के जवाब दिए, फोन और पत्र दूरियों को कम कर देते हैं.

अपने–अपने घरों में कैद
खुद से बतियाते
अपने इर्दगिर्द ब्रह्मांड रचने वाले लोग
क्या जानें कि नदी क्यों बहती है
दूर बीहड़ रास्तों से आ
ठंडे पानी को अपने अंक में समेटे
तटों को भिगोती, धरा को ठंडक
पहुंचाती चली जाती है
क्यों सूरज बालू को सतरंगी बनाता
नदी की गोद से उछल कर शाम हुए उसी में सो जाता है
आकाश झांकता निज प्रतिबिम्ब
संवारते नदी के शीशे में वृक्ष भी अपना अक्स
सदियों से सर्द हुआ मन
धूप की गर्माहट पाकर पिघल कर
बहने लगता है नदी की धरा के साथ
बर्फ की चादर से ढका धरा का कोना
जैसे सुगबुगा कर खोल दे अपनी आँखें
नन्हे नन्हे पौधों की शक्ल में
मन की बंजर धरती पर भी गुनगुनी धूप
की गर्माहट पाकर गीतों के पौधों उग आयें
हल्की सी सर्द हवा का झोंका घास को लहराता हुआ सा
जब निकल जाये
तो गीतों के पंछी मन के आंगन से उड़कर
नदी के साथ समुन्दर तक चले जाँए..
धूप की चादर उतार, शाम की ओढ़नी नदी ओढ़े जब
सिमट आयें अपने-अपने बिछौनों में
अगली सुबह का इंतजार करते कुछ स्वप्न