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Thursday, May 8, 2014

पेपर मैशे- एक सुंदर कला


Today when they got up in the morning at 5 am, it was quite cold, put sweaters first time in this winter but now weather is sunny and warm. Nanha, was not well so did not go to school, is doing his remaining home work. Last evening he started writing a ‘story’. Jun asked about his health on phone and told her that he had 99  fever  he had checked it in the morning but did not tell them to avoid unnecessary tension. Nanha is feeling normal at this moment, she took breakfast with him, thought they  should be very careful in this changing weather. She did not write letters this week, in fact not felt close enough to write from dil se… one day pen will automatically write, mind will be responsive and then she will feel like saying something to someone.

पिछले तीन दिन यूँ ही बीते गये, घर में पेंटिंग का काम चल रहा था, शनिवार को काम पूरा नहीं हुआ, वे कारीगर का इंतजार करते रहे. शाम को एक मित्र परिवार आया. इतवार को गमलों की सफाई व रंग रोगन करवाया. आज सुबह पड़ोसिन से मिलने गयी, उसके पैर में मोच आ गयी थी, जहाँ वे लोग गये थे, संगमरमर की सीढ़ियों से पैर फिसल गया, अब वह काफी ठीक है. कल उसने आंवले का मुरब्बा बनाया, जो प्रक्रिया पिछले पांच दिन पहले शुरू की थी, कल पूर्ण हुई. दो दिन के लिए चने के पानी में रखना, फिर अच्छी तरह धो कर उन्हें कांटे से गोदकर चौबीस घंटों के लिए फिटकरी के पानी में, फिर उसी पानी में उबालकर चाशनी में डालना. उन पंजाबी दीदी ने एक किताब दी थी जिसमें पढ़कर उसने यह विधि सीखी थी. उनके लॉन में लगे दो पेड़ों पर अभी सैकड़ों आंवले लगे हैं. पिछले तीन-चार दिनों से वह स्वयं में थोड़ा बदलाव महसूस कर रही है,  अपने आप के प्रति जैसे ज्यादा सजग हो गयी है.

पिछले कुछ दिनों से वह अपने-आप में नहीं है, हर वक्त एक उल्लास सा छाया रहता है, जैसे आँखों के सामने कोई रेशमी पर्दा झिलमिला रहा हो. अपना अस्त्तित्व अर्थपूर्ण लगने लगा है. ध्यान में मन नहीं लगता पर हर वक्त गुनगुनाने का सा मूड रहता है, उसने दो गीत अपने आप सीखे, टीवी पर जब छोटे-छोटे बच्चों को इतने विश्वास से गाते हुए देखती है तो बहुत अच्छा लगता है. संगीत किसी दूसरी ही दुनिया में ले जाता है. आज भी मौसम खिला-खिला है, धूप अच्छी लगने लगी है, अब कमरे में ठंड लगती है, यानि सर्दियां आ गयीं. कल जून मोरान गये थे वापसी में ऊन और कई फल लाये, पैंजी के फूलों के पौधों के लिए खर्च करना उन्हें थोड़ा ज्यादा लगा जबकि फलों पर खर्च करना नहीं, एक उनके तन को पुष्ट करेंगे और दूसरे मन को ख़ुशी देंगे. नन्हा कल स्कूल से पेपर रिसाईकलिंग का तरीका सीख कर आया था, उसके पास शाम को बनाने का समय नहीं था सो सुबह वही बनाती रही, नैनी के बेटे ने भी सहायता की, पर पेपर बहुत स्टिफ बन गया है, पापड़ जैसा, पता नहीं उसकी टीचर क्या कहें, शायद हँसे, revive शायद कुछ ज्यादा पड़ गया, नन्हा स्कूल से आकर प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा. उसने स्कूल में होने वाले skit में भाग लिया है, एक कहानी भी लिख के दी है. इस स्कूल में उसे अच्छा मंच मिला है.

आजकल जब वे उठते हैं, बाहर अंधकार छाया रहता है, सूर्य उनके जगने के बाद ही आकाश में ऊपर चढ़ता है पर वे भीतर अपने कामों में व्यस्त रहते हैं सो उसकी लालिमा और आकाश में उसका ऊपर उठना देख नहीं पाते. सर्दियों में काम की गति भी कुछ कम हो जाती है. जब नन्हा स्कूल चला जाता है तब जून और वह दस मिनट के लिए गाइडेड मैडिटेशन के लिए बैठते हैं और उगते हुए सूर्य को कल्पना में देखते हैं. वह हिन्दी पुस्तकालय से एक किताब लायी है, ‘हिंदी भाषा की समस्या’, हिंदी सारे देश में बोली व समझी जाती है फिर भी इसे राष्ट्र भाषा तो दूर राज भाषा का दर्जा भी नहीं मिल पाया है, लोग इसे बोलने में अपनी हेठी समझते हैं. उसने अभी किताब की भूमिका ही पढ़ी है.  






Monday, August 5, 2013

सपनों का ताजमहल



....और कल शाम बस स्टैंड पर बेहद प्रतीक्षा करने के बाद जून आ गये, नन्हे ने दूर से ही देख लिया था, बढ़ी हुई दाढ़ी मैले कपड़े और सफर की थकान, उसने आते ही मौन में ही उससे बात की, उनके एक मित्र भी वहीं थे, उन्हीं की कार से वे लोग गये थे बाद में नहा-धोकर जब वे बाथरूम से निकले तो पहले से नजर आने लगे छलकती हुई मुस्कान के साथ. इस बार भी वह  उनके लिए ढेर सारे उपहार लाये हैं, अपने लिए प्याजी रंग की ऊन जो पहली नजर से देखने पर उसे उतनी अच्छी नहीं लगी पर अब पसंद आ रही है. नन्हा अपना स्कूल बैग पाकर खुश है. घर कैसा भरा-भरा लग रहा है. काम भी जैसे बढ़ गया है, अब उसे समय बिताने के तरीकों के बारे में नहीं सोचना होगा, हर वक्त वे साथ जो होंगे.
आज शाम जब वे टहलने गये तो जून ने सुझाव दिया, सूरत वे नहीं जा रहे तो आगरा ही चलते हैं, ताजमहल देखने की उसे बरसों से तमन्ना है. नन्हे को भी बहुत अच्छा लगा, उसने अभी-अभी ताजमहल के बारे में काफी कुछ पढ़ा है. साथ ही देहरादून जाने पर एक दिन के लिए मसूरी भी जाया जा सकता है.
फरवरी का प्रथम दिन. जून ने फोन किया वह गैराज जाने के कारण देर से आएंगे. धूप बहुत तेज है सो वह खिड़की के पास वाली कुर्सी पर कमरे में ही बैठी है. जैसा कि संदेह था वह आंवले वाला बूढ़ा आज नहीं आया और अभी-अभी उसने पड़ोसिन से उसके माली से बात करने के लिए कहा है. परसों दीदी का पत्र आया था, उन्होंने लिखा है घर में चोरी की बात सुनकर उन्हें अपना आत्मनिर्भर न होना खल रहा था. वह लिख रही थी कि अचानक कानों को चुभने वाला तेज शोर शुरू हुआ और लगभग ५-७ मिनट तक जारी रहा, एक अजीब सी कैफियत थी, और अब वह शोर थम गया है, नन्हा गेट तक देखने गया आकर बताया, गैस को लीक किया जा रहा था. कुछ देर बाद फिर से शोर आने लगा.
 आज उसने लाहौर रेडियो से गजलें सुनी, तो.. टीवी पर रेडियो का भी आनन्द लिया जा सकता है. इस वक्त धूप में बैठे हुए जब बीच-बीच में ठंडी हवा का झोंका आकर सहला जाता है तो हल्की ठंडक का अहसास होता है. कल इतवार था, दोपहर को थोड़ी देर फिल्म देखी, शाम को ब्यूटी पार्लर गयी, एक मोटी सी लडकी थी वहाँ, उसके चेहरे पर एक अच्छा सा भाव था जैसे पुरानी जान-पहचान हो, पार्लर वाली सभी लडकियों के चेहरे पर एक अलग ही भाव होता है, जैसे देखते ही सब जानना चाहती हों. वहाँ से वे एक मित्र के यहाँ गये जहाँ उनके एक मित्र मिले, बता रहे थे, सुबह पांच बजे उठ जाते हैं, ७ बजे तक बेटा पढ़ाई करता है, नन्हा सुबह उठकर पढ़ाई नहीं कर पाता, पर आज समझाने पर थोड़ी देर की. अचानक वह पंछियों की आवाजें सुनने लगी और दस मिनट तक वही सुनती तरही, लॉन में झाडू लगाती नैनी की बेटियों की आवाज भी आ रही थी, वे दोनों कल रात भर अपनी सहेली के यहाँ रहकर आई हैं, कल शाम से उनकी माँ परेशान थी.

अभी कुछ देर पहले सुबह के काम खत्म हुए थे कि ध्यान आया, एक सखी से बात कर ली जाये, उसने कल शाम अपने बगीचे से पत्ता गोभी भिजवाई थी. वह एक सुलझी हुई पढ़ी-लिखी अच्छी मित्र है, उसके साथ कभी नाराजगी या गलतफहमी होने का डर नहीं है. कल शाम बहुत दिनों बाद असमिया सखी से भी मिली, लेकिन जैसी उम्मीद थी, वह इतने दिन न मिलने पर नाराज होगी, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, शायद उसने भी यह मूलमंत्र समझ लिया है कि अपेक्षा ही दुःख देती है. कल सुबह खत लिखने बैठी ही थी, जून आ गये वह छोटी बहन का पत्र लाये थे, पढ़कर अच्छा नहीं लगा, रिश्तों के कारण कितना खिंचाव हो सकता है इस जगत में. जून भी थोड़ा परेशान हो गये. मार्च में उनके घूमने जाने के कार्यक्रम के बारे में सोचकर, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे उन्हें अपनी ओर से हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए और अपने कार्यक्रम को दर्शनीय स्थानों को देखने तक ज्यादा केन्द्रित रखना चाहिए न कि रिश्तेदारों से मिलने तक. एक तटस्थता बनाये रखकर अपने उन स्वप्नों को सच होते देखना चाहिए जो ताजमहल और मसूरी की कल्पना में उन्होंने देखे हैं. माँ-पापा तो यकीनन उन्हें देखकर प्रसन्न होंगे ही...इतना ही पर्याप्त है.