Wednesday, June 26, 2019

स्पीकिंग ट्री



सुबह के ग्यारह बजने वाले हैं. अभी-अभी पिताजी से बात की, उन्होंने यू-ट्यूब पर बच्चों की कोई फिल्म देखी. स्मार्ट फोन का जादू चल गया लगता है, अब वह व्हाट्स एप भी इस्तेमाल करना सीख गये हैं. सुबह क्लब की एक सदस्या से मिल कर आयी. उन्होंने अपने अभिनय के शौक के बारे में बताया. कह रही थीं, स्टेज की बजाय रिहर्सल के दौरान उन्हें अधिक आनंद आता है. शेष दोनों महिलाओं से फोन पर बात हुई, आज सबके लिए लिखेगी. कल शाम की परांठा पार्टी अच्छी रही. एक सखी की माँ आई हुईं थी, परिवार सहित बुलाया, जून के मित्र भी आये. दोपहर को सब क्लब गये थे, वार्षिक उत्सव था क्लब का आज. साज-सज्जा अच्छी थी. पिछले दिनों मन में जो उहापोह चल रहा था, व्यर्थ था. उनकी कल्पना और स्मृति में डोलने की आदत ही ऊर्जा के सर्वाधिक क्षय का कारण है. जीवन को जैसा वह है वैसा ही स्वीकारने की कला आ जाये तो मन निर्भार रह सकता है. आज अमेजन से मंगवाए 'वाकिंग शू' भी आ गये हैं, सी ग्रीन रंग के बेहद हल्के जूते हैं.

अभी हाथों में जुम्बिश है, अभी कदमों में राहे हैं
अभी है हौसला दिल में, मंजिल पर निगाहें हैं

अभी ग्यारह बजने में आधा घंटा है, हाथ में कलम है, सामने खुला हरा-भरा लॉन और खिली हुई धूप..पेड़ों के पत्तों की सरसराहट, चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दे रही है. हल्की सी ठंडक भी है, हवा जब छूती है तब ज्ञात होती है. पिताजी से बात की सुबह साढ़े आठ बजे. वह हिंदी के अख़बार से 'ऊर्जा' तथा अंग्रेजी के अख़बार से 'स्पीकिंग ट्री' नोट कर रहे थे. आज का विषय था करुणा, करुणा और प्रेम का अंतर बताया उन्होंने, फिर कहा, ये तो बड़ी-बड़ी बातें हैं, जन्मों लग जाते हैं इनका पालन करने में. विनम्र आत्मा की यही पहचान है, पर उसे उस वक्त जो सही लगा कह दिया, यदि कोई पूरे दिल से इन्हें स्वीकारता है तो वह उस क्षण उस भाव में स्थित ही माना जायेगा. आत्मा जिस क्षण अपने मूल स्वभाव में टिक जाती है, उतनी देर तो वह परमात्मा के साथ एक होती है. साधना का तो कोई अंत नहीं क्योंकि परमात्मा अनंत है. सुबह टहलने गये तो इक्का-दुक्का लोग ही दिखे. वापसी में ऊपर लिखी पंक्तियाँ मन में गूँज उठीं, दोपहर को इसे पूर्ण करेगी. इस वर्ष की पहली कविता होगी यह. कल शाम क्रिया के बाद गले में खराश हुई, रात को नींद भी खुल गयी थी, पहले किसी ड्रामे का शोर आ रहा था, बाद में एक स्वप्न देखकर खुली, जिसमें मिठाइयाँ हैं ढेर सारी, मन भोजन के प्रति कितना आसक्त है, यह इस स्वप्न से ही ज्ञात होता है. साधक को तो किसी भी  वस्तु के प्रति आसक्त नहीं रहना है. रात्रि को सोने से पूर्व का ध्यान पुनः आरम्भ करना होगा, ध्यान यानि अपने स्वरूप में टिकना, अपने भीतर उस मौन का अनुभव करना जो आनंददायक है, तृप्तिदायक है.

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28-06-2019) को "बाँट रहे ताबीज" (चर्चा अंक- 3380) पर भी होगी।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत बहुत आभार !

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