Wednesday, December 23, 2015

सर्दी में वर्षा


इस समय दोपहर के ढाई बजे हैं, वर्षा अभी भी हो रही है. जब से वे यात्रा से वापस आये हैं, उसके अगले दिन से धूप के दर्शन नहीं हुए हैं, नवम्बर के दूसरे सप्ताह में ठंड बढ़ गयी है. अगले हफ्ते दिल्ली जाना है और वहाँ से विदेश यात्रा पर. अभी वीसा नहीं आया है पर उम्मीद है चार-पांच दिनों में मिल जायेगा. उसे आज बाजार जाना है, बच्चों के लिए कुछ मीठा लाना है, दीपावली के बाद यह पहली योगकक्षा होगी. बनारस पहुंचने के दूसरे दिन ही उसका गला खराब हुआ, अभी भी पूर्णरूप से ठीक नहीं हुआ है ऊपर से यह ठंडा-गीला मौसम. यात्रा के दौरान व्यायाम आदि भी ठीक से नहीं हो पाता, खान-पान भी अनियमित हो जाता है. खैर, शरीर है तो कुछ न कुछ व्याधि तो कर्मफल के अनुसार होगी ही, इसे इतना महत्व देना ठीक नहीं. उन्हें इस बात का अभिमान होने लगा था कि योग के कारण वे अपने शरीर को स्वस्थ रखने में सक्षम हैं. कोई भी गर्व हो उसका टूटना ही ठीक है. जब तक वे असहाय नहीं हो जाते, अहम् पूरी तरह से नष्ट नहीं हो जाता, ईश्वर के द्वार खुलते नहीं ! मन की अवस्था तो शांत है, स्थिर है, समाहित है. मन किसी वस्तु की आकांक्षा नहीं करता. आवश्यकता की वस्तुएं पहले से ही उपलब्ध हैं, मन जानता है, यह जगत चार दिन का मेला है, बस इससे अधिक कुछ भी नहीं, यहाँ की हर शै बस धोखा ही है, वासतविकता नहीं है, पोलमपोल है, सो मन अपने में ही मगन है !  

नजर बेजुबां है, जुबा बेनजीर है ! संतों की वाणी ऐसी ही होती है, जिसे सुनकर भीतर सारे सवाल शान्त हो जाते हैं. आज भी सद्गुरू को सुना, शांत सागर की तरह, अनंत आकाश की तरह, पावन चन्दन की तरह उनकी वाणी अमृत के समान थी. वे कितने-कितने उपाय बताते हैं, जिस शांति तथा आनन्द का अनुभव वे कर रहे हैं, वह चाहते हैं कि सभी सदा के लिए सारे दुखों से मुक्त होकर, व्याधियों से मुक्त होकर ईश्वरीय आनन्द का अनुभव करें. वे सभी अपने भीतर स्थित उस अनंत खजाने को पा लें, उन्हें उसकी झलक तो कई बार मिली है पर अपनी नासमझी में वे उसे खो देते हैं, खो देते कहना भी ठीक नहीं है. क्योंकि जो है, जहाँ है, जैसा है, सदा है, सदा से है, वैसा ही है, उसे वे भुला देते हैं, यही कहना ठीक हगा. किन्तु वह कभी नहीं भुलाता, भीतर से सदा याद दिलाता रहता है. आजकल उसका ज्यादा समय आत्मचिंतन में लगता है, पिछले दिनों जब वे यात्रा पर थे, तो कितना समय परचिन्तन में लगा, उसकी भरपाई तो करनी ही होगी. अस्तित्त्व संतुलन बनाना जानता है. जब बहुत दिनों तक ध्यान नहीं कर पाया तो अब मन ध्यान में ही टिका रहना चाहता है. शांत  एकांत में अपने आप में ऐसे गुम कि खुद को भी खुद का अहसास न हो, इस तरह कि जैसे वह है ही नहीं, अहंकार शून्य स्थिति..सद्गुरू कहते हैं जिसने जीवित रहते मरने का गुर सीख लिया वह सदा के लिए अमर हो जाता है. वह चाहे किसी भी क्षण इस जगत से विदा ले, अब क्या अंतर पड़ता है. वह जैसे अब है, वैसे ही तब भी तो रहेगी. भीतर जो चेतना है, परम शांति है, उसे छूने के बाद बाहर का सब कुछ उसी के प्रकाश में दिखता है !


आज बादल छंट गये हैं, तेज धूप खिली है, भली लग रही है. आज सुबह नींद खुली पर मन तंद्रा में खो गया, दस मिनट के लिए ही सही पर पुनः सोना यही दिखाता है कि प्रमाद हुआ. उसे लगा जीवन कितना विचित्र है, मन अपनी ही बनाई वीथियों में घूमता रहता है. चाहे कितना भी उत्थान हो जाये पतन की गुंजाइश रहती है. सद्गुरु कहते हैं, शरण में आ जाओ इसके सिवा कोई चारा नहीं. मन का नियन्त्रण बहुत कठिन है, उसे तो शरण में ही जाना होगा. जो हो सब स्वीकार..क्योंकि उसे जब एक बार पता चल गया है कि मन तो चेतना को जगत व्यवहार के लिए मिला एक उपकरण है, इसका उपयोग करना है और अपने आप में रहना है. 

3 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24-12-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2200 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. बहुत बहुत आभार !

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  3. bhut badhiya likha hai apne
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