Wednesday, October 7, 2015

मिनी मैराथन


सदगुरु कहते हैं कि ‘खुदा’ कुछ लोगों को दिखाई नहीं देता पर उन्हें तो उसके सिवा कुछ दिखाई नहीं देता. यह सृष्टि और परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं. परमात्मा सबके भीतर उसी तरह समाया है जैसे फूल में खुशबू ! कृषि, ऋषि और ख़ुशी का देश भारत तभी विकास के पथ पर आगे बढ़ सकता है जब वे अपने भीतर गुरू तत्व को जगाएं, अपने आचरण से दूसरों को सिखाएं ! ज्ञान उनके आचरण में झलके ! सदगुरू अपने आचरण से, अपने व्यवहार से सारी दुनिया को यह संदेश दे ही रहे हैं. अब उन्हें देखना है कि उनकी बुद्धि कैसे शुद्ध बने, उनके मन कैसे शांत हों. आज नये वर्ष के प्रथम दिन सुबह-सुबह सदगुरू के अमृत वचन सुने. आने वाले शेष सारे दिनों में भी उनकी स्मृति सदा बनी रहे, यही कामना है. यह वर्ष उसे परमात्मा के और निकट ले जायेगा. सेवा के नये अवसर मिलेंगे और अंतर्मन शुद्ध होगा. सेवा वे अपने मन व वचन से भी कर सकते हैं यदि कर्म से न कर पा रहे हैं. जिसको अपने लिए कुछ करना नहीं, कुछ पाना नहीं और कुछ जानना नहीं, जो कृत-कृत्य है, प्राप्त-प्राप्तव्य और ज्ञात-ज्ञातव्य है, वही ईश्वर-कृपा का अधिकारी है. उसके जीवन का प्रत्येक क्षण जगत के लिए सुखकर हो, शुभ हो ! वाणी सौम्य हो तथा कर्म बंधनकारी न हों. पूर्वजों को सुख देने वाले हों तथा प्रियजनों के लिए हितकारी हों ! उसकी हर श्वास नाम से युक्त हो, पवित्र आत्मा में सदा उसकी स्थिति हो ! भगवान को अपना मानकर जब भक्त उनका स्मरण करता है तो वह सदा योग में बना रहता है, वह असंग रहता है दुःख से भी व सुख से भी. वह अकर्ता भाव में रहता है. उसके संकल्प व्यर्थ नहीं होते, कर्म में अवश्य परिणत होते हैं. उसका हृदय खाली रहता है ताकि प्रभु उसे अपना निवास बना लें.
आज सद्गुरु ने कहा कि जब कोई किसी से प्रेम करता है तो बार-बार उसका नाम पुकारता है, उसकी चर्चा करता है, ऐसे ही भक्त भी जप करता है तो वह प्रेम में होता है. ऐसा जप उसे भीतर से आनंद प्रदान करता है. प्रेम अथवा ध्यान दोनों में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा. आज नन्हा वापस हॉस्टल चला गया, वह शांत है और समझदार भी. नये वर्ष की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान लगभग सभी से हो गया है. आज उसे मिनि मैराथन का पुरस्कार मिलेगा. उसकी छात्रा ने नये वर्ष  का कार्ड दिया, उसे हिंदी पढ़ाना सफल हुआ है. कल एक सखी की सिंगापूर यात्रा के फोटो देखे त्तथा वह सामान भी जो वे वहाँ से लाये हैं, कुछ देर ‘परचर्चा’ भी की. किसी की अनुपस्थिति में उनके बारे में बातें करना ठीक नहीं है. पिछले हफ्ते मन जिस द्वेष के कारण दुखी था, वह अब दूर हो गया है, यदि असंग रहकर कोई घटनाओं को देखे तो कोई दुःख कभी न रहे.

आज भी सदगुरू के वचन सुने, अमृत के समान मधुर और हितकारी वचन ! अहंकार से मुक्त होकर जब मन कामना रहित होता है अथवा तो परहित के अतिरिक्त या ईश्वर के प्रति प्रेम के अतिरिक्त कोई कामना नहीं रहती, उसी क्षण मन आत्मा में टिक जाता है. आत्मा में जिसकी सदा ही स्थिति हो ऐसा मन शरणागति में जा सकता है, उसमें कोई उद्वेग नहीं है, वह राग-द्वेष से परे है, उनका लक्ष्य वही है. इस क्षण उसके मन में कोई कामना नहीं है, कैसी गहन शांति है भीतर...गहन मौन..वे कहते हैं इस मौन में ही सत्व का जन्म होता है, उसकी तरंगें न केवल भीतर बल्कि बाहर का वातावरण भी पावन कर देती है. आज दोपहर भूपाली राग का अभ्यास किया, संगीत आत्मा को झंकृत कर देता है. कल शाम नृत्य-संगीत का अद्भुत संगम क्लब के वार्षिक उत्सव के दौरान देखा व हृदयंगम किया, वापस आकर ओशो को सुना. ध्यान का आनंद छुपाओ और फिर जब भीतर लबालब भर जाये तो उसे बाहर लुटाओ, शीघ्रता न करो. उसे अपने भीतर रुनझुन.. कभी वंशी सुनाई देती है, प्रकाश की अद्भुत छटा दिखती है. कभी-कभी अचानक सारा शरीर जड़वत् हो जाता है, लगता है जैसे वह तैर रही है, रोज सुबह परमात्मा उसका नाम लेकर उठाता है !


1 comment:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 08 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर

    चर्चा - 2123
    में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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