Monday, September 10, 2012

रेल यात्रा



कल जून ने उसे ‘शांतला पट्ट महादेवी’ उपन्यास के चारों भाग लाकर दिए. कुछ वर्ष पूर्व इसका एक भाग उसने पढ़ा था, आगे पढ़ने की बहुत इच्छा मन में थी. कहीं मिला ही नहीं, और अब पढ़ने बैठती है तो किताब छोड़ने का मन ही नहीं होता. कल शाम वे काली बाड़ी गए. सोनू को बहुत अच्छा लगा बाद में बाजार गए फिर एक परिचित के यहाँ बहुत दिनों के बाद. उनके यहाँ जाकर अच्छा लगा, स्वच्छता नहीं थी न बैठक में न शयन कक्ष में पर किचन साफ था. आश्चर्य है किसी के यहाँ की सफाई पर टिप्पणी करने का उसका कभी इरादा नहीं हुआ, शायद वह दूसरे धर्म का है इसलिए..
आज फिर एक लम्बे अंतराल के बाद डायरी लेकर बैठी है, जून ने जो किताबें लाकर दी थीं, पढ़ती रही लगातार, चारों भाग समाप्त कर दिए. उन दिनों तो समय का भान ही नहीं था. बहुत अच्छा लगा ‘सी. नागराजन’ का यह उपन्यास. शांतला का चरित्र कितना महान था, कितना अद्भुत, सबसे अच्छी बात उसे यह लगी कि अपने मन की शांति खोना न खोना हमारे अपने वश में है. कल उन्हें जाना है, तिनसुकिया से ट्रेन पकडनी है, तैयारी अभी आधी ही हुई है. एक परिचित माँ-बेटी भी उनके साथ जाएँगी, उन्हे दिल्ली जाना है. पहली बार गर्मी के मौसम में वे घर जा रहे हैं. सुबह से ही वह व्यस्त है, अभी दोपहर के भोजन में एक घंटा शेष है, काम करते-करते उसे थोड़ी भूख महसूस हुई, सोचा बिस्किट ही खा ले तब तक. कुछ देर पूर्व बंगाली सखी से मिलकर आयी.

आज फिर एक सप्ताह बाद डायरी लिखने का सुयोग मिला है. जून उसे और नन्हे को छोडकर वापस चले गए हैं. उनके जाने के एक दिन पहले उसका व्यवहार उनके प्रति अच्छा नहीं कहा जा सकता पर वह मन से विवश थी. ऐसे वातावरण में उस स्थिति की कल्पना भी दुष्कर थी. पर यह तो स्पष्ट है कि जाते समय वह नाराज नहीं थे. आज वह गोहाटी में होंगे, पत्र लिखेंगे, वह भी लिख रही है. सोनू यहां खुश है. उसका मन भी स्थिर है. अच्छा लग रहा है यहाँ रहना.

जून आज सुबह दफ्तर गए होंगे वापस जाकर. पता नहीं उसने गोहाटी से भेजे पत्र में क्या लिखा है, उसे लिखा है या नहीं, पर वह उसकी तरह हृदयहीन नहीं है न ही उसकी तरह स्वार्थी है. स्वार्थवश ही तो उसने ऐसा व्यवहार किया था या प्रेमवश. शायद प्रेमवश ही. उससे अलग रहना कहीं गहरे चुभ रहा होगा न..तभी तो. प्यार कभी मरता नहीं, कभी कम नहीं होता, कुछ भी नहीं बदलता. नन्हे को अपने पापा की याद नहीं सताती, वह अपने दोस्तों में खुश है. काफी देर से बिजली नदारद है.



   


स्ट्राबेरी आइसक्रीम+पाइन एपल केक



Staying ok अच्छी किताब है, अभी तो आधा ही पढ़ा है और अभी पूरी तरह लगकर जिसे पढ़ना कहते हैं, उस तरह नहीं पढ़ पाती है, फिर भी मन में कहीं अंदर तक छू जाती हैं उसमें लिखी बातें, व उदाहरण. Family medical guide भी जून ने लाकर दी थी जब वह अस्वस्थ थी, अभी उसे भी पढ़ा नहीं है. कल जून फिर गया, जन्मदिन वाले घर में, बुलाया सभी को था, पर उसने कहा कि बासी भोजन सोनू व उसके लिए ठीक नहीं है, नूना को याद आया, वह कहना भूल गयी कि उसके लिए भी तो ठीक नहीं है, पेट के भारीपन की शिकायत वह भी तो कर रहा था. उन्हें आधा मीटर कपड़ा भी और देना है, उसकी बेटी की फ्रॉक के लिए जो उपहार में उन्होंने दिया, वैसा ही. उसकी सखी उनके घर नहीं आती, यह बात उसे अच्छी नहीं लगती, उसे अच्छी लगती होगी तभी वह ऐसा करती है, और अब कहीं दूसरी मित्र भी आना बंद न कर दे, उस दिन वह जबरदस्ती उसके यहाँ से गुलाब की कटिंग जो ले आयी थी. खैर...यही दुनिया है, यहाँ रूठना-मनाना तो चलता ही रहता है.

असम बंद के कारण आज दफ्तर बंद है, जून घर पर ही हैं. कल से ही बोडो का १९९ घंट का बंद भी शुरू हो गया है, देश में सबसे अधिक बंद असम में ही होते हैं. कल शाम वे उनके घर गए, पर वहाँ बैठना उसे अच्छा नहीं लग रहा था, उसकी सखी का ठंडा व्यवहार...शायद यह उसके मन का भ्रम हो.

आज देश के ५०० शहरों में नेहरु जन्मशती दौड़ हो रही है, दस लाख लोग दौड़ रहे होंगे इस वक्त. वह एक मित्र के लिए स्वेटर बना रही है. नन्हे के रोने की आवाज आयी तो वह बाहर गयी, देखा पडोस की उड़िया आंटी का हाथ पकड़े रोते-रोते वह आ रहा है, दूध वाले ने उससे कहा कि वह अपने साथ लेकर जायेगा तो वह डर कर रोने लगा. कुछ देर पूर्व ही गया था उनके घर. आज शाम को उन्हें एक और पार्टी में जाना है.

स्वप्न झरे फूल से
गीत चुभे शूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे
अपनी जिंदगी पर नजर दौड़ाए तो यही दीखता है उसे. टीवी पर कुछ देर पहले स्ट्राबेरी आइसक्रीम और पाइन एपल केक बनाने का तरीका देखा, अच्छी तरह बताया है और तरीका भी आसान है. प्रेशर कुकर में भी केक बनाया जा सकता है, उन्होंने कभी प्रयास ही नहीं किया था.

आज उनके विवाह को पूरे चार वर्ष दो महीने हो गए. कल दोपहर बाहर लॉन में बैठकर Staying ok एक घंटा तक  पढ़ी. बेहद अच्छा लगा. सम्भव हुआ तो आज भी पढ़ेगी और हो सका तो भविष्य में भी. आज उसने बालों में शैम्पू किया है, शायद आज हेयर ड्रेसर के पास जाये, कभी सोचती है उसे बाल बढ़ाने चाहिए, पर ज्यादा लम्बे बाल तो उसके होते नहीं, अभी तक कुछ निश्चय नहीं कर पाई है कि...खैर देखा जायेगा. नन्हा उठकर बाहर आ गया है जहां वह बैठी है, नाश्ता करके वह बायीं ओर के साथ वाले घर में उससे एक साल छोटे बच्चे के साथ खेलने चला गया है, और वह यहाँ बैठी है कुछ सोचती हुई, दस-ग्यारह दिनों के बाद उन्हें जाना है, कल जून का मूड ऑफ था, बेहद उदास दिख रहे थे, उसके सिर में दर्द भी था शायद यही कारण रहा हो, या फिर घर की याद आ रही हो. पापा-माँ के बारे में वह उससे बात तो नहीं करते हैं, लेकिन मन में सोचते जरूर रहते हैं. इस हफ्ते के पत्र अभी लिखने शेष हैं, अभी लिखेगी. महरी अभी आई नहीं, सो बर्तन साफ होने के बाद ही खाना बनेगा. दीदी ने उसके पत्र का जवाब इस बार बहुत जल्दी दे दिया है. उसने सोचा, वह बनारस जायेगी तो अपनी किताबें भी ले जायेगी और वहाँ भी एक निश्चित दिनचर्या बना लेगी उसके अनुसार कार्य करने से परेशानी कम होगी और कार्य भी ज्यादा हो सकेगा.  



   



Saturday, September 8, 2012

गुलाब की कटिंग



आज उसकी नाराज सखी अपने परिवार के साथ घर गयी है, उसने सोचा, जब वह वापस आयेगी तब शायद भूल जाये और उनके सम्बन्ध पहले की तरह हो जाएँ. आज फिर वर्षा हो रही है, ठंड भी बहुत है, बिल्कुल पालक के पकौड़े खाने का मौसम है. लेकिन वे बाजार नहीं जा पाएंगे, कल भी नहीं जा पाए थे. नन्हे ने आज ठीक से भोजन नहीं किया, इसी से वह जान जाती है कि उसकी तबियत कुछ नासाज है. जल्दी ही सो भी गया आज. कल शाम वे एक परिवार से मिलने गए, गृहणी को  अच्छा नहीं लगा कि वह बनारस में रहकर पढाई करे, जून चाहते हैं कि अगले माह मार्च में जब वे वहाँ जाएँ उसके बाद वह और सोनू वहीं रुक जायें, जून में प्रवेश परीक्षा है. उसके बाद वापस आने का कोई औचित्य नहीं. खैर भविष्य में जो होगा उसके लिए क्या चिंतित होना, फ़िलहाल उसे आज की बात सोचनी चाहिए, उसने सोचा.

आज कई दिनों के बाद वह लिख रही है, अस्वस्थ थी, अभी भी पूरी तरह स्वस्थ है, ऐसा नहीं कह सकती. आज शनिवार है, संभवतः सोमवार से अपनी पुरानी दिनचर्या आरम्भ कर सके. नन्हा अभी सो रहा है, साढ़े आठ बजे हैं सुबह के, हाफ डे के कारण जून जब दोपहर को सोना चाहेंगे तो सोने नहीं देगा, धूप भी पड़ रही है उस पर खिड़की से, पर कैसे ठाठ से सोया है, जैसे सुबह अलार्म सुनने के बाद भी जून सोये रहते हैं. कई पत्रों के जवाब देने हैं, आज सभी को लिखेगी. कल उसकी मित्र आ गयी, उसकी और से, मित्रता रहे, ऐसी कोई चेष्टा या भाव नजर नहीं आता, जून ने उसे जबरदस्ती भेजा उन्हें भोजन पर बुलाने के लिए, पर वे लोग नहीं आये.

कल शाम नाश्ते में उन्होंने आलू के परांठे खाए, आलू पहले का था शायद इसलिए रात तक जी भारी रहा दोनों का, टिफिन में हल्का नाश्ता ही ठीक रहता है उनके लिए. नन्हा सोया है, कभी-कभी बेहिसाब, असीम प्यार आता है उस पर, उसकी भोली बातों पर. मौसम में गर्मी का पुट आता जा रहा है, अब स्नान करने के बाद स्वेटर पहनने की आवश्यकता महसूस नहीं होती. आज सुबह उसने बहुत दिनों बाद घर के सामने गली में कई चक्कर लगाये, प्रातः कालीन शीतल पवन का आस्वादन किया तभी मन उसका शांत है. सब कुछ ठीकठाक चल रहा हो तो वैसे भी मन शांत रहता है, उसे ध्यान आया, बनारस में वे लोग कैसे होंगे, अब तो दुर्घटना को चार महीने हो गए हैं, पर यह वक्त बहुत थोडा है.

मार्च का महीना, यानि फूलों का महीना. आज मार्च का प्रथम दिन है, खिली-खिली धूप है और वातावरण में है खुनकी सी, नन्हा उठ गया है पर बेड पर लेटे-लेटे ही टीवी देख रहा है. उसके गीले बाल जरा सूख जाएँ तब भीतर जायेगी. कल एक सखी से उसने गुलाब की कटिंग मांगी, जो उनके यहाँ से कितने सारे पौधे ले कर गयी है, पर उसने महसूस किया कि देने में उसे बहुत अड़चन हो रही थी. उसने निर्णय किया कि अब किसी से कुछ नहीं मांगेगी. आज उन्हें एक मित्र के यहाँ जाना है, उनकी बेटी का जन्मदिन है, उसी की तैयारी में थोड़ी सहायता करने.  मौसम के अनुसार मूड भी बदल जाता है तो कल से जून ने गर्मी मनानी शुरू कर दी है, अब देखें उनका रवैया कैसा रहता है, गर्म पानी नहीं आता है आजकल, टंकी में पानी चढ़ ही नहीं पाता है. टीवी पर नन्हे का मनपसंद कार्यक्रम ‘नमूने’ आ रहा है. कल जन्मदिन की पार्टी में उसका एक नई महिला से परिचय हुआ, बातचीत से सहयोग करने वाली लगी, उसके यहाँ भी पार्टी है, उसने सोचा पूछेगी, क्या उसे कोई सहायता चाहिए.




Thursday, September 6, 2012

फिर फिर बरसे बदली-बादल




फिर बदली छाई है आज, बस दो दिन धूप निकली, ठंड भी कितनी बढ़ गयी है. कल शाम वह थोड़ी देर के लिये उदास हो गयी थी फिर सोनू की किसी बात पर हँसी तो बस... जैसे सारी उदासी छंट गयी. उसे थोड़ा सा प्यार करो तो कैसा खुश हो जाता है, नन्हा फरिश्ता ही तो है वह उसका, कितनी प्यारी-प्यारी बातें करता है और कितने नए-नए तरीके से. आज से वह उसे कभी नहीं डांटेगी, जब तक कि बहुत ही जरूरी न हो. प्यार से सब समझ जाता है पर जब देखता है कि उसका मूड ठीक नहीं है, तो वह भी रुख बदल लेता है. आज शाम उन्हें किसी परिचित के यहाँ जाना है, वे लेने आएँगे. जून परसों आ जायेंगे घर फिर से भर जायेगा, उन्हें कहीं आने-जाने की जरूरत नहीं रहेगी, उनका छोटा सा घर और वे तीनों. देखें वह बनारस की क्या खबर लाते हैं, उसने सोचा.

कल लगभग सारा दिन उन्होंने बाहर बिताया, सुबह नौ बजे ही उसकी मित्र का फोन आ गया था, वह बारह बजे वहाँ पहुंच गयी, शाम को पांच बजे लौटी. अच्छा रहा पूरा वक्त, नन्हा खेल रहा था उनकी बेटी के साथ, एक बार भी नहीं रोया, वही रोई तीन-चार बार, जैसी की उसकी आदत है. उसकी एक दूसरी मित्र कुछ नाराज दिखी, उसे अजीब लगा, स्वार्थ के लिए मनुष्य कितना गिर सकता है, इतने वषों की मित्रता का भी उसे ख्याल नहीं आया. उसके भीतर एक उदासी छा गयी है. सब कुछ कितना पीछे छूट गया सा लगता है, लगता है यहाँ अकेले है, एकांत चाहने पर अकेलेपन से भय तो नहीं लगना चाहिए न, लगता है कोई कमी है जरूर, नहीं तो दिल में कांटे की तरह न चुभती छोटी सी बात.

परसों जून आ गए, सुबह ही आ गये थे नाईट सुपर से, दिल्ली का ट्रिप एक तरह से व्यर्थ ही गया, इतनी तकलीफें उठानी पडीं सो अलग, हाँ यह अच्छा हुआ कि बनारस होकर सबसे मिलकर आ गए. बताया कि माँ अभी भी पूर्ववत बनी हुई हैं, उदास रहती हैं, माँ का हृदय होता ही ऐसा है, या कहें स्त्री का हृदय. वे लोग अगले माह वहाँ जायेंगे. आज फिर मौसम बादलों भरा है. असम को सच ही वर्षा का घर कहते हैं. जून जब यहाँ नहीं थे, उनके विभाग के किसी अधिकारी ने बॉस को बताने की कोशिश की थी की वह इंटरव्यू के लिए गए हैं न कि घर. यह दुनिया स्वार्थी लोगों से भरी हुई है.. कल देवर की एक मित्र की चिट्ठी पढ़ी, कैसा लगता है किसी अदृश्य व्यक्ति के नाम लिखा कुछ पढ़ना, वह होता तो कितनी बातें सोचता, पढ़कर जवाब देता, फिर सिलसिला चलता रहता अब तो एक तरफा खालीपन है जो कितनी आवाजें दो, जवाब में कुछ नहीं भेजेगा. एकाएक उसे ध्यान आया आज फार्म में लगाने के लिए फोटो खिंचाने उसे स्टूडियो जाना पड़ेगा, वह लिखना छोड़ कर काम में लग गयी.



Wednesday, September 5, 2012

चन्द्रकान्ता -देवकीनंदन खत्री


कल वे चले गए, अभी तो ट्रेन में होंगे, कल शाम को जाकर पहुंचेंगे. कल से समय अच्छा ही बीत रहा है, शाम को उसकी सखी आ गयी थी, उसके पति भी दिल्ली गए हैं. सुबह वह उसके घर गयी और अभी वह फिर आयेगी. सुबह से लगातार होती वर्षा के कारण मौसम बहुत ठंडा हो गया है. जून कह कर गए हैं कि वह दोनों घरों पर पत्र लिख दे. नन्हा अभी सो रहा है, कितना शरारती है, मगर कितना प्यारा है, डांट खाकर भी उसके निकट आ कर सो जाता है. अभी कुछ देर पहले एक मराठी फिल्म देखी, अच्छी थी. आज इतवार है, टीवी देखने में ही समय गुजर जाता है, पढ़ाई कुछ विशेष नहीं हो पा रही है. जून कल दो किताबें लाए थे, हिंदी उपन्यास- चन्द्रकान्ता और गोरा. पढ़ना शुरू करेगी तो समाप्त किये बिना मन नहीं मानेगा. कितने दिन हो गए हिंदी की कोई पुस्तक पढ़े हुए. उसने सोचा यदि जून इंटरव्यू में सफल हो जाते हैं तो...भविष्य सुंदर दिखाई देता है, अपना घर अपना सब कुछ पांच-छह वर्षों में ही...नहीं तो जाने कितने बरस कम्पनी के मकान में कटेंगे बीस-तीस बरस, सोनू को भी तब अच्छे स्कूल में पढ़ा सकेंगे, स्वप्न कितने सुंदर होते हैं न, देखे सब्जी कहीं जल न जाये, उसे ध्यान आया..यह यथार्थ है.

कल दिन भर व्यस्त रही, शाम को उसकी दो सखियाँ आयीं थीं सबने एक साथ खाना खाया, उसे अच्छा लगा पता नहीं उन्हें कैसा लगा हो, दस बजे हैं, जून का इंटरव्यू होने ही वाला होगा. अभी चार-पांच दिन और लगेंगे उसको आने में, आज चौथा दिन है उसे गए. ‘गोरा’ उसने पूरी पढ़ ली, और किसी काम के लिये वक्त ही नहीं मिला. कल दिन भर वर्षा हुई, ओले भी गिरे, ऐसा लगा. आज आकाश बिल्कुल स्वच्छ है.

आज सुबह से उसमें सात्विक प्रवृत्ति का उदय हुआ है तभी तो सब कुछ भला-भला लग रहा है. दीदी को उस दिन पत्र में निराशा भरी बातें लिख दीं थीं, उसने सोचा एक पत्र और लिख दे. मौसम भी आज मन की तरह है साफ, स्वच्छ और शीतल. जून आज बनारस में होंगे. कल शाम उस भी खाना खाने के लिये बुलाया था, मगर सबके पहुँच जाने के बाद उसकी सखी ने बनाना आरम्भ किया, उसे बहुत भूख लग आयी थी, सफेद चने, पूरी और रोटी खाकर बहुत अच्छा लगा. कल रात उसने ‘चन्द्रकान्ता’ भी समाप्त कर दी, अब आज से अपनी पढ़ाई शुरू करेगी.



   










   








Tuesday, September 4, 2012

उड़द डाल की बड़ियां



नन्हें को सुलाने में उसे एक घंटा लग गया, गोदी में लेकर सुलाने से उसका सूट कितना क्रश हो गया है, कभी-कभी इतनी कहानियाँ सुनने पर भी उसका मन नहीं भरता. जून के सहकर्मी जिनका पुत्र उनके साथ रह रहा था, वापस लौट आये हैं, एक रबर प्लांट लाए हैं उनके लिये, अच्छा लगेगा जब बड़ा हो जायेगा. सोनू के लिये भी खिलौना लाए थे, प्लास्टिक का एक हवाई जहाज और मोम के रंग..पाकर बहुत खुश था, बातें बहुत करता है प्यार और गुस्सा दोनों को खूब समझता है. आज सुबह ठंड जरा भी नहीं थी, इस समय भी रोज से कम है. कल शाम उसने पोस्तदाना डालकर पपीते का हलवा बनाया. वे मार्च में फिर बनारस जा रहे हैं और यदि उसका एडमिशन हो जाता है तो वह और नन्हा वहीं रहेंगे, जून पुनः जुलाई में आएँगे. उसका पेट भारीपन की शिकायत कर रहा है, शायद गरिष्ठ भोजन करते हैं वे लोग आजकल, सर्दियों में वैसे भी पराठों पर ज्यादा जोर रहता है. कल से दोपहर को भी टीवी के कार्यक्रम दिखाए जायेंगे. कल गणतन्त्र दिवस है, परेड देखेंगे वे लोग, यदि रंगीन में देख सकें तो कितना अच्छा हो, उसने सोचा अपनी उड़िया मित्र से बात करेगी.

छब्बीस जनवरी की सुबह जो वह अस्वस्थ हुई तो लिख नहीं सकी. ज्वर था, गला भी खराब हुआ. फिर शनि व इतवार को वक्त ही नहीं मिला. आज पहली बार उसने दोपहर का कार्यक्रम देखा, लैम्प शेड बनाने का तरीका कितना अच्छा है. कल सभी को पत्र लिखे, जून लिखते-लिखते भावुक हो गए और अपने को रोक नहीं सके. आँसू बहाना भी तो कमजोरी की निशानी है. यहाँ आकर भी उसने दो-तीन बार उसे स्वप्न में देखा है, स्वप्न में ही वे उसे देख सकते हैं, वास्तव में तो कभी देख नहीं पाएंगे. उस दिन माँ का लम्बा सा पत्र पढ़ मन भर आया. अगर वह उनके पास रहकर आगे पढ़ाई कर सके तो ज्यादा अच्छा रहेगा, वैसे कहीं भी रही ज्यादा अंतर नहीं पड़ेगा. उसे गणित की पढ़ाई भी शुरू करनी है, उसने सोचा, लिखने के बाद किताब निकलेगी या जून की सहायता लेनी होगी, पता नहीं किताबें कहाँ रखी हैं. इतवार को जून तिनसुकिया गए थे उसने सुबह के टीवी कार्यक्रम देखे, ‘भारत एक खोज’ सबसे अच्छा लगा. लिखना शुरू करने से पूर्व वह अखबार पढ़ रही थी, यह सोचकर  पुनः वही उठा लिया, कि पढ़ने के वक्त कोई लिख कैसे सकता है.

फिर तीन दिन का अंतराल, आज जून को विभाग से नयी डायरी मिल गयी, जिसका इंतजार करने को वह उसे कह रहे थे, बहुत अच्छी है इससे तो कहीं ज्यादा जिस पर वह लिख रही है, पर अब वही उसमें लिखेंगे. कल वह दिल्ली जा रहे हैं, पूरे एक हफ्ते के लिये. यहाँ ज्वाइन करने के बाद पहली बार कहीं और इंटरव्यू देने. उसकी आँखें पता नहीं क्यों दुःख रही हैं, चश्मा लगाना ही पड़ेगा क्या ? यह जिंदगी भी बस इसी हिसाब-किताब में बीतती जाती है. सोचती है जब पूरी तरह स्वस्थ रहेगी तब कितना अच्छा रहेगा खूब काम करेगी, पर तब आराम ही तो करती है. नन्हा आज फिर खूब जिद करके सोया है, किस तरह सो रहा है अब, मासूम चेहरा लिये, जैसे कभी तंग करना जानता ही न हो. उसकी एक मित्र बड़ी देकर गयी है उड़द डाल की बड़ियाँ. मौसम आज डल है, धूप खिली हुई नहीं निकली. कल शायद जून उसकी रिपोर्ट ले आयें, वैसे अब उसकी आँखों में उतना दर्द नहीं है. ननद की चिट्ठी आयी है, पच्चीस को वे लोग बहुत उदास थे, छब्बीस को वह भी तो दिन भर बेड पर थी, जून बहुत ख्याल रखते हैं ऐसे में, इस समय सीएमडी का भाषण सुनने क्लब गए हैं.


Monday, September 3, 2012

मफलर वाली सर्दी



नया वर्ष शुरू हो गया है. इस वर्ष में पहली बार लिखते समय उसके अंदर मिश्रित भावनाएँ हैं. जून से बार-बार कहकर उसने यह डायरी मंगवाई है, जब नहीं मिली थी तो उसे दुःख भी हुआ था और सोचा कि अब यदि मिली भी, तो भी नहीं लिखेगी, पर उसने इस पर दो बोल (वह भी लिखवाये) लिख दिए हैं तो लगता है कि अब वह लिख सकती है. रही वर्ष के आरम्भ की बात तो वे उसी दिन यानि पहली तारीख को असम पहुँचे थे. वह लगभग दो महीने बाद घर वापस आयी थी. अभी कुछ देर पूर्व दोपहर के भोजन के बाद कुछ देर के लिये सोते समय देखे स्वप्न में वहीं की बातें माँ-पिता, भाई-भाभी से बता रही थी.  दो-एक दिन पूर्व फिर ‘उसे’ स्वप्न में देखा था, अब सत्य कहाँ रह गया है वह, तन त्याग कर स्वप्न ही तो बन गया है. जून ने उसके लिये सेंट्रल स्कूल की सर्विस का फार्म ला दिया है. बनारस से वे लोग रोजगार दफ्तर से रजिस्ट्रेशन नम्बर स्थानांतरित करा के लाए थे, यहाँ के ब्यूरो ने स्वीकार नहीं किया. पीआरसी की बाधा खड़ी कर दी है. उनके पारिवारिक मित्र का नौ-दस साल का पुत्र दस दिनों के लिये उनके घर पर रह रहा है, उसकी माँ को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा है. नन्हें को एक साथी पाकर बहुत अच्छा लग रहा है.
आज भी कल का समय है, लेकिन वातावरण में सिहरन अभी से आ गयी है, शाम होते-होते ठंड और बढ़ जायेगी. आज उसने अपनी लेन की श्रीमती दासगुप्ता से मफलर की बुनाई सीखी, वह पहले से बना रही थी, अब उसे खोल कर नए सिरे से बनाएगी. जून के दफ्तर में बाहर से किसी व्यक्ति का एक्सीडेंट हो गया है, वह अस्पताल गया था, कह रहा था, शायद उसे छोड़ने उसके घर जाना पड़े. जून में दूसरों का दर्द महसूस करने की अद्भुत क्षमता है. आजकल उसका ऑफिस नई इमारत में शिफ्ट हो रहा है. इन दिनों उसका सुबह का समय किचन में ही बीत जाता है, उस बच्चे के जाने के बाद अपनी पुरानी दिनचर्या पर आ जायेगी. कल अपनी एक बंगाली मित्र के यहाँ गयी थी उसका बगीचा बहुत सुंदर है. उनके घर की छत से पक्षियों के कारण या धूप के कारण कैसी आवाजें होती रहती हैं, अब तो आदत पड़ गयी है फिर भी इस वक्त बहुत खल रही हैं. उसने सोचा वहाँ बनारस में सभी कुछ ठीक होगा...यहाँ इतनी दूर बैठकर तो ऐसा ही लगता है पर कितने उदास होते होंगे कभी कभी वे लोग. लेकिन ये उदासी उन्हें कहाँ ले जायेगी, कहीं भी तो नहीं. जून आजकल स्थिर हैं. उसके ही कारण एक दिन वह भटक गया था पर उन दोनों को तो हर हाल में अब साथ-साथ जीना है, वे दो कहाँ हैं. वह एक दिन भी उससे नाराज नहीं रह सका और वह तो नाराज थी ही नहीं. जीवन के इस मोड़ पर आकर लगता है अभी तो सही मायनों में उसका जीवन शुरू ही नहीं हुआ...अभी तक आराम ही कर रही थी और जाने कब तक करती रहेगी. मन के सब दरवाजे जैसे भड़भड़ा कर बंद हुए तो खुले ही नहीं, सड़ी हुई बासी हवा के बाद ताजी हवा का झोंका आये तो कितना भला लगता है !