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Wednesday, February 19, 2020

एनआरसी का भय


दोपहर का समय है, आज कई दिनों बाद ब्लॉग पर लिखा. जब से कार चलाना सीखना आरम्भ किया है, लेखन का समय घट गया है पर आजकल जून टूर पर गए हैं सो थोड़ा सा उलटफेर दिनचर्या में किया जा सकता है. आज सुबह एक सखी के साथ कोऑपरेटिव गयी, परसों मृणाल ज्योति में टीचर्स की कार्यशाला है. कुछ देर में डिब्रूगढ़ जाना है, फोन चार्ज हो रहा है, हाथ खाली हैं, सो कलम को कुछ देर हाथ में रहने का अवसर प्राप्त हो गया है. धूप आज बहुत तेज है, ड्राइवर का फोन आया वह आ गया है. सो अब शेष लेखन कार्य शाम को डिब्रूगढ़ से वापस आकर ही होगा. कुछ दिनों का अंतराल, आज से नए महीने का आरम्भ है, अगस्त का महीना यानि आजादी दिवस का महीना, वर्षा का मौसम बदस्तूर जारी है. इसी महीने रक्षाबंधन का त्योहार भी है, सभी भाइयों को राखी भेजनी है, उसके पहले पत्र लिखने हैंऔर एक कविता भी. इस महीने ईद भी है और नाग पंचमी है, छोटी भतीजी का जन्मदिन है, बड़े भांजे का भी. इसी महीने रुद्राभिषेक भी होने वाला है, उन्हें उसमें सहयोग देने को कहा गया है. कल जून के एक सहकर्मी का जन्मदिन है, जिनके घर वे पहले सदा ही जाया करते थे, वक्त बदलता है, मित्र भी वक्त का ही हिस्सा है, सो वे भी बदल जाएँ तो इसमें कैसा आश्चर्य ? जून का जन्मदिन भी इसी महीने पड़ता है. आज व कल भी अमेरिका में रहने वाले दो भारतीय बच्चों के बारे में पढ़ा, सुना, जो छोटी सी उम्र में इतना बड़ा काम कर रहे हैं, उनका तन छोटा है पर ज्ञान वृद्धों का है, वैज्ञानिकों का है. कल टीवी पर एनआरसी पर अमित शाह की प्रेसवार्ता सुनी. असम में ऐसी अफवाह है कि चालीस लाख लोगों को भारत से कभी न कभी जाना पड़ सकता है, जो अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं. भविष्य ही बताएगा, कल क्या होने वाला है. धोबी ने पूछा, एनआरसी में उनका नाम है या नहीं, नैनी भी एनआरसी को लेकर परेशान थी, अधूरी जानकारी के कारण लोग कितना कष्ट पाते हैं, उनका भी सारा कष्ट अधूरी जानकारी के कारण ही है. क्लब की प्रेसीडेंट ने स्कूल का संविधान भेजा है, देखने के लिए, काफी संशोधन उन्होंने स्वयं ही कर दिए हैं. सुबह उठे तो पिछले कुछ दिनों की तरह फुहार पड़ रही थी और मंद पवन भी बह रही थी, यानि घूमने के लिए आदर्श मौसम ! लौटकर प्राणायाम किया. सुबह के साढ़े नौ बजे हैं, आज से नैनी के बच्चों का स्कूल गर्मियों के अवकाश के बाद खुल गया है. वह घर काम आधा करके ही उन्हें स्कूल छोड़ने गयी है. आज कई दिनों बाद अपने पुराने समय पर ध्यान किया, परमात्मा से लगन लगी रहे तो भीतर कैसी शांति रहती है. अनावश्यक कार्यों को करते हुए वे बेहद आवश्यक कार्यों को भुला देते हैं. मौसम आज भी बादलों भरा है. अभी-अभी बगीचे में जाकर फोन से फूलों की तस्वीरें उतारीं, एक फेसबुक पर पोस्ट की, धीरे-धीरे फेसबुक पर बीतने वाले समय को कम करना है. आज शाम क्लब में मीटिंग है.

Thursday, January 19, 2017

अगस्त का महीना


दो दिनों का अन्तराल ! जून कल शाम वापस आ गये. आज सुबह गर्मी के कारण या अन्य किसी कारण से साधना करने का उत्साह नहीं था. कल दोपहर बच्चों को सिखाते समय खुद की आवाज भी बदली हुई सी लग रही थी, बच्चे ज्यादा थे, नियन्त्रण में नहीं आ रहे थे. आज अगस्त का महीना भी शुरू हो गया. स्वतन्त्रता दिवस, जून का जन्मदिन और कृष्ण जन्माष्टमी भी सम्भवतः इसी महीने में होगी.

बड़ी ननद की बेटी की बात पक्की हो गयी है. वे सभी बहुत खुश हैं. हर साधक के जीवन में कभी न कभी वह पल तो आता होगा जब वह कहे कि, आज वह साधना से भी मुक्त हो गया है. जो पाना था इस साधना से वह पा लिया है. देह अलग और आत्मा अलग भास होने लगी है. अब साधना में पहले की सी रूचि नहीं रह गयी है. समाधि का अनुभव हो गया है. अब कोई संशय नहीं रहा. उसे लगता है वह दिन आने ही वाला है.

जून आज पुनः कोलकाता गये हैं. सुबह ध्यान में सिर के ऊपरी भाग में तीव्र संवेदना हुई, एक बार ट्रैक दिखा जिस पर धावक दौड़ रहे थे. ध्यान में बंद आँख के बावजूद वस्तुएं कितनी स्पष्ट दिखाई देती हैं, आज खुली आँख से एक मूरत के दर्शन किये जो आज्ञा चक्र पर रोज उसे दिखती है. अद्भुत है भीतर की दुनिया और अद्भुत है परमात्मा !


आज सुबह क्रिया के बाद भीतर से कोई बोल रहा था. उसका अवचेतन ही होगा कि वे समाधि भी अहंकार की पुष्टि के लिए पाना चाहते हैं. एक सांसारिक व्यक्ति जैसे सम्मान चाहता है, वह कोई कला सीखता है या कुछ करके दिखाता है. रूप का अभिमान होता है उसे, अपने पद का, प्रतिभा का गुरुर होता है और जब कुछ लोग उसकी तारीफ करते हैं तो उसे एक सुख की प्राप्ति होती है, वैसा ही सुख यदि एक तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्ति भी पाना चाहे.. उसे लगता है यह भेद ही गलत है क्योंकि दोनों के पास शरीर, मन व आत्मा है. आध्यात्मिक के पास आत्मा का अनुभव भी है, वह स्वयं को अजन्मा, अनादि, अनंत जान चुका है, वह सुख-दुःख में सम रह सकता है. ग्रीष्म, शीत भी उसे नहीं छूते लेकिन मन अभी भी उसके पास है, जिसमें पुराने संस्कार भी हैं. देह की देखभाल करना व उसे स्वस्थ व सुंदर रखना उसका सहज कर्म है. जो कुछ भी कर्म उससे होते हैं, उनके कारण हुई प्रशंसा को पचा पाना उसे भी सीखना होता है वरना पुरानी आदत पीछा नहीं छोड़ती. उसे यह तो ज्ञात है कि आत्मा की शक्ति से ही सब कुछ हो रहा है, मन, बुद्धि, व देह स्वयं जड़ हैं, यदि आत्मा न हो तो ये कुछ भी नहीं कर सकते. स्वयं को आत्मा मानने का अर्थ है परमात्मा का अंश मानना, करने वाला परमात्मा ही हुआ, अभिमान करे भी तो कौन..जड़ को गर्व करना शोभा नहीं देता और चेतन को कैसा अभिमान..वही तो एक तत्व है..जो एक ही है अभिमान करे भी किससे, दूसरा कोई हुआ ही नहीं ! समाधि का अनुभव इसलिये करना है कि जन्मों के जो अशुभ संस्कार भीतर पड़े हैं, जल जाएँ..अंतर पावन हो जाये जो परमात्मा के चरणों में समर्पित किया जा सके..जून ने सुबह फोन किया, बत्तीस राखियाँ ख्ररीदी हैं उन्होंने. आज सद्गुरू के साथ ध्यान किया आधे घंटे का ऑन लाइन मेडिटेशन !  

Saturday, September 3, 2016

हर्मन हेस की किताब - सिद्धार्थ


आज जून का जन्मदिन है. सुबह उन्हें कहा कि जितने वर्ष के हो गये अपने भीतर उतने गुणों की तलाश करें. वह करें या न करें, उसने सोचा वह ही कर लेती है- सहनशीलता, धैर्य, वात्सल्य, स्नेह, ममता, आदर, अनुशासन, अध्ययन, अनुशासन, संयम, सजगता, प्रेम, निर्भयता, अभय, क्षमा, दया, करुणा, सहानुभूति, दान, सहयोग, उदारता, ईमानदारी, सत्यता, स्वच्छता, पारदर्शिता, प्रसन्नता, उत्साह, आनंद, मिलनसारिता, दूरदर्शिता, मेधा, बुद्धि, वाकपटुता, व्याख्यान करने की कला, व्यायाम, नई भाषा सीखना, हास्य, अनुकरण, स्मृति, परोपकार, विश्वास, आत्मसम्मान, आस्था, भक्ति, साधना, समर्पण, कुशल क्रेता, शीघ्रता, मैत्री....

आज कई हफ्तों के बाद झूले पर बैठ कर लिख रही है. सामने गुलमोहर पर लाल फूल उग आये हैं, लॉन की घास कटी है, गुड़हल में एक लाल चटख फूल खिला है. आकाश में पीले, सलेटी, नीले बादल छाये हैं. अस्त होते हुए सूर्य की रोशनी उन पर पड़ रही है. मौसम बेहद सुहावना है. अगस्त माह की शीतल शाम बस ढलने को है. पिताजी गमलों में पानी डाल रहे हैं. माँ कुर्सी पर रोज की तरह बैठी हैं, वह चुप ही रहती हैं ज्यादातर, भोजन में भी रूचि घटती जा रही है. जून भीतर बैठे डायरी लिख रहे हैं, उनके मध्य संबंध पूर्ववत् हो गये हैं, सहज स्नेह भरे. आज गुरूजी के अष्टावक्र गीता पर दिए गये प्रवचन के बारे में कुछ मेल पढ़े, शेष कल पढ़ेगी, उन दिनों जब वे यह प्रवचन दे रहे थे नहीं पढ़ पायी थी. आज एक लेखिका का ब्लॅाग देखा, कितना सजाते हैं लोग, लेकिन बात पर उतना ध्यान नहीं देते. कुछ लोग उससे भी और अच्छा लिखने की उम्मीद रखते हैं. अभी-अभी बिजली चली गयी है, अच्छा हुआ कि वह पहले से ही बाहर है, अभी दिन थोड़ा शेष है. आज मृणाल ज्योति से कोई जीवन सदस्यता के फार्म दे गया.


अगस्त माह भी बीतने ही बीतने को है. समय का रथ अविराम चलता जा रहा है. वे रुक कर देखते भी नहीं कि कहाँ जा रहे हैं, किधर जा रहे हैं, कहाँ जाने के लिए निकले थे, कहाँ उन्हें पहुंचना था, रास्ता ठीक है या नहीं, राह दिखने वाला साथ है या नहीं ? जून के साथ बैठकर उसने अगले पांच वर्षों की एक योजना बनायी. संभव हुआ तो तो वे ये बारह कार्य करेंगे. बंगलूरू में एक घर खरीदना है, पुरानी कार बेचकर नई खरीदनी है. नन्हे के विवाह की तैयारी करनी है. बंगलूरू आश्रम में एडवांस कोर्स करना है और इगतपुरी में विपासना कोर्स. छोटी बहन की किताब पूरी करवानी है. कविताओं को  नई किताब में संकलित करना है. फोटोग्राफी की कला विकसित करनी है. सेवा का कार्यक्षेत्र बढ़ाना है. लेख लिखने हैं. ब्लॉग पर लिखना है. यूरोप की यात्रा करनी है. 


पिछले कई दिनों से डायरी नहीं खोली. आज समय मिला है. शाम के सात बजे हैं. जून आज दोपहर  एक सप्ताह के लिए बाहर गये हैं. सुबह वे जल्दी उठे, प्रातः भ्रमण को गये, रविवार की सफाई का कार्यक्रम स्थगित किया कल तक के लिए. दोपहर को संडे स्कूल के बच्चों के साथ राखी का उत्सव मनाया. पिछले दिनों हर्मन हेस का उपन्यास सिद्धार्थ पढ़ा, अच्छा है, एक बार फिर पढ़ना होगा, नदी की बातें समझने के लिए ! संसार और परमात्मा एक ही हैं, दो नहीं हैं, यही अद्वैत इसका सार है और यह अनुभव में जब भी उतरता है तो भीतर प्रेम भी पनपता है, सहज प्रेम जो सारी सृष्टि के लिए होता है, ऐसा प्रेम पाना ही उनमें से हरेक का लक्ष्य है और उन्हें उसी की तलाश भी है. 

Thursday, March 7, 2013

गुलदाउदी के फूल



अगस्त की शुरुआत..यानि कल का इतवार अच्छा रहा, धीमे-धीमे से गूंजती स्वर लहरी सा, शांत धारा पर तैरती नौका सा, सोचा था शाम को पड़ोसी के यहाँ जायेंगे, पर किसी कारण से गृहस्वामी को कहीं जाना पड़ा. आज सुबह वे उठे तो तेज धूप थी, नौ बजते-बजते इतनी ठंडी हवा बहने लगी और फिर वर्षा आने में भी ज्यादा देर नहीं हुई. कल शाम जून के साथ मद्धिम रौशनी में नन्हा और वह बातें करते रहे, वह अगले महीने सोलह-सत्रह दिनों के लिए बाहर जायेंगे, वे दोनों अकेले रहेंगे, उस दिन उसकी एक सखी, जो आजकल अकेले रह रही है, कह रही थी, बहुत मुश्किल होती है शाम व रात गुजारना, वही अनदेखे, अनजाने डर, लेकिन उनसे उन्हें मुक्ति पानी ही होगी. कल रात स्वप्नों में बीती, दोपहर को दो घंटे सो गयी थी शायद उसी का परिणाम था, अजीब-अजीब सपने, कुछ दिन पूर्व पाकिस्तान गयी थी सपने में, उसका आकर्षण खींचता है अपनी ओर, शायद पूर्वजों की जन्मभूमि है इसलिए या इसलिए कि उसका पिछला जन्म वहीं हुआ होगा.

  आज भी मौसम अच्छा है, बदली भरा, सुबह नन्हे को बस में छोड़ने गयी तो वर्षा काफी तेज हो रही थी. सुबह देर से उठी तो व्यायाम का समय नहीं मिला, पीछे आंगन में उसने स्किपिंग की, बचपन में सहेलियों के साथ रस्सी कूदना कितना मजेदार खेल हुआ करता था. रात को बिस्तर पर लेटे कितने विचार आते हैं पर उस वक्त कागज-कलम पास नहीं होता, और जब पेन हाथ में है तो मन खाली है, अभी ठंडी हवा का एक हल्का सा झोंका आया, अच्छा लगा जैसे कल की फिल्म में एक गाना. कल की फिल्म ‘बुलंदी’ को देखकर ‘सर’ की याद आ गयी, शिक्षक का असर काफी पड़ता है विद्यार्थियों पर, अगर शिक्षक वैसा हो जैसा फिल्म में दिखाया गया था, दोनों ही फिल्मों में शिक्षक मृत्यु से नहीं डरता, और जो मरने से नहीं डरता उसे दुनिया की किस बात से बात से डर लग सकता है? कल शाम वह अपनी बंगाली सखी के यहाँ गयी, उससे बातें करना अच्छा लगता है. पड़ोसी के यहाँ एक कुत्ता अजीब सी आवाज निकाल रहा है, उनके यहाँ नई नैनी रहने आयी है, उसका सात-आठ साल का बेटा एक कुत्ते के साथ ऐसे खेलता है जैसे उसका सगा भाई हो, उसने जून से उन दोनों की एक फोटो खींचने को कहा है.

 कल सुबह क्रोध ने उसके मन पर आक्रमण किया और आज सुबह भी, कल पानी खोल कर  छोड़ देने के कारण स्वीपर उसका शिकार हुआ और आज नन्हा जो नाश्ता ठीक से न खाने पर उसे बोध दिलाने का कारण बना. दोनों ही दिन उसे क्रोध का असर भुगतना पड़ा है मन की अस्थिरता के रूप में, कल लिख नहीं पायी, आज भी प्रयास ही कर रही है. कल विवेकानंद की दूसरी पुस्तक लायी है, कुछ देर पूर्व पढ़ रही थी, पढ़ने में बहुत अच्छी लगती हैं अच्छी बातें, पर व्यवहार में लाना...असम्भव तो नहीं पर उसके जैसे अज्ञानी के लिए कठिन अवश्य है. बेवजह ही क्रोधित हो जाना चाहे कुछ क्षणों के लिए ही क्यों न हो, जून से बहस करना, यह ठीक तो नहीं और बेजरूरत ही असत्य भाषण करना. कल उसने माली से फिर असत्य कहा कि लॉन मोअर ठीक होने के लिए वर्कशॉप में गया है. पता नहीं क्यों ?

  उन्होंने गुलदाउदी के लिए नए गमले तैयार किये हैं. उसमें लगाने के लिए कटिंग्स देने की बात उसकी सखी ने कही थी, सुबह से वह चिंता कर रही थी यह सोचकर कि उससे कैसे मांगे, पर आखिर फोन पर कह ही दिया, उसने कहा, पौध अभी तैयार हो रही है, दस-बारह दिनों में दे देगी. उसे राहत मिली, अनुभव इतना खराब नहीं था. आज उसके मन में जून के प्रति प्रेम के साथ कृतज्ञता का भाव उपज रहा है. ट्रांजिस्टर पर एक मधुर गीत बज रहा है, नन्हे को सुबह का नाश्ता फिर पसंद नहीं आया, शाम को उसकी पसंद का नाश्ता यानि नूडल्स बनाएगी, उसे याद आया कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गए कैरम खेला बहुत दिनों बाद. उसके हाथ में एक बार कम्पन था, शायद यह उसकी घबराहट की निशानी है, क्योंकि कभी-कभी यह बिलकुल नहीं होता, पर जब भी होता है उन दिनों की याद दिला देता है.






Wednesday, October 10, 2012

पड़ोस का सैलून



अगस्त का पहला दिन..मन अजीब दुविधा में पड़ा है, बनारस से उस फोन के अलावा और कोई सूचना भी तो नहीं मिली है. उसका एडमिशन यदि नहीं हो पाया तो..बनारस जाना तो था पर इतनी जल्दी जाना पडेगा यह नहीं सोचा था. गर्म पानी के सिस्टम की पाइप की वेल्डिंग करने के लिए कर्मचारी आए हैं, कितना शोर करती है वेल्डिंग मशीन. नन्हा होता तो शौक से देखता, स्कूल गया है उसे लेने भी जाना होगा स्कूल से, जून को फील्ड से आने में देर हो जायेगी. मौसम आज स्वच्छ है यानि खूब गर्मी पड़ेगी. लगातार वर्षा से रेलें भी तो नहीं चल रही हैं. कल बहुत दिनों बाद मंझले भाई का पत्र आया है. इसी महीने रक्षा बंधन भी है. जून को समय मिले तो बाजार जाकर राखी लायें. उसे दो रेसिपीज और मिली हैं, वह अच्छा खेल था, जब कुछ महिलाओं ने मिलकर आपस में रेसिपीज साझा करने का तरीका निकाला था.

कल बेहद गर्मी थी, दोपहर भर बेचैनी थी. आज सुबह के सवा नौ बजे धूप थोड़ी कम है बादल के एक टुकड़े ने सूरज को ढक लिया है मगर कब तक ? नन्हे को कल सुबह ठंडे पानी से नहला दिया, उसे हल्का सी ठंड लग गयी है, जानबूझ कर हम मुसीबतों को निमंत्रण देते हैं नब्बे प्रतिशत मामलों में. उसे स्कूल लेने आज भी जाना है. जून व्यस्त हैं, कल रात आठ बजे आये. आज उन्होंने किन्हीं परिचित को चाय पर बुलाया है, दोपहर को ही नाश्ता बनाना है और बैठक ठीक-ठाक करनी है.

अभी-अभी जून डिब्रूगढ़ गए हैं अपने एक सहकर्मी के साथ. उनके कान का संक्रमण जो ठीक हो गया सा लगता था अब फिर से हो गया है. बांया कान कभी बंद हो जाता है कभी खुल जाता है. सभी रिपोर्ट लेकर गए हैं. दोपहर बाद तीन-चार बजे तक आयंगे. नन्हे की तबियत आज सुबह भी पूरी तरह ठीक नहीं थी, पता नहीं कैसा होगा, हिम्मती लड़का है मैनेज कर  ही लेगा. आज ट्रांजिस्टर पर कितने मधुर-मधुर गीत आ रहे हैं, प्रेम की चाशनी में पगे हुए, कल रात वे भी ऐसे ही भावों में भर रहे थे. शाम को नाश्ते का आयोजन ठीक रहा, हमारा रात्रि भोजन भी वही नाश्ता ही हो गया. नन्हे को लेने आज भी उसे ही जाना होगा, किसी से लिफ्ट मिल गयी तो ठीक नहीं तो रिक्शा ले लेंगे. बनारस से खत की प्रतीक्षा है पर ट्रेन न चलने की वजह से डाक भी तो समय पर नहीं आ रही है. पूरे देश में बाढ़ ने तबाही मचाई है. हर वर्ष यही होता है, करोड़ों रुपयों का नुकसान, कब हमारा देश सक्षम होगा, इन आपदाओं से निपटने में.

सोनू की खांसी बढ़ गयी है और हल्का बुखार भी है. कल शाम को वह बहुत खुश था, खूब बातें कर रहा था. पर रात वह बेचैन था, साँस तेज चल रही थी. वह उसे गुमसुम देखकर व्यग्र हो गयी, उसका उदास चेहरा देखकर वह भी उदास हो गयी, सुबह वे उसे अस्पताल ले गए थे. छह-सात बोतलें दी हैं डा. ने. बेनाड्रिल दी उसने, पीते ही सो गया, अभी तक उठा नहीं है कि कुछ खाने को दे. उन्हीं की लापरवाही का नतीजा भुगत रहा है यह नन्हा बच्चा. जून कल पांच बजे लौटे, उनका कान ठीक हो गया है, वैक्स जम गया था और कुछ नहीं.

नन्हा आज ठीक है, सुबह स्कूल नहीं गया. कल से भेजेगी. तीन दिन पढ़ाई-लिखाई बंद रही अब उसका गृहकार्य करने में मन ही नहीं लग रहा था. इस समय पापा के साथ अपने मित्र के यहाँ गया है, वही उनके घर के पीछे रहने वाले पड़ोसी. उसे यहाँ आये एक महीना होने को है वे लोग उनके यहाँ नहीं आये, न ही वह गयी. सुबह वह सोनू को यहीं पास में एक पार्लर में ले गयी थी बाल कटवाने के लिए, एक सरदारनी ने खोला है, जो बाल तो अच्छे काटती हैं पर समय बहुत लगाती हैं.

Tuesday, June 19, 2012

विवाह का एल्बम


अगस्त माह का पहला सोमवार ! सुबह पांच बजे ही कमरा कितना रोशन हो गया है, चमचमाती धूप से. आज तीज है, मेहँदी और झूला याद आ रहा है, इस समय बाप-बेटा दोनों सो रहे हैं, वह पिछले दिनों नियमित नहीं लिख पायी, जून से कहा पर उसकी अपनी विवशता है, वह हर काम में नूना की सहायता करना चाहता हैं, उसकी सुविधा, उसके आराम का उसे हर क्षण ध्यान रहता है और इन्हीं सब कामों में वह थक जाता है. रात को दोनों को ही नन्हें के कारण कई बार जागना पड़ता है, दिन में कभी-कभी मन व शरीर दोनों थकान से बोझिल लगते हैं, बस चुपचाप सो जाने का मन होता है. कितना बड़ा हो गया है वह, उसे पहचानने लगा है अच्छी तरह से. उसकी आवाज भी वह पहचानने लगा है. रो रहा हो तो कुछ कहते ही चुप हो जाता है. सुबह उसकी मालिश करके जब स्पंज करती है तो दूध पीते-पीते ही वह सो जाता है.
आज सुबह जून की नींद देर से खुली, कहने लगा आज देर हो गयी है आधी छुट्टी ले लेते हैं, रात्रि जागरण का असर उसकी आँखों में साफ दिखाई दे रहा था. उसने कोई जवाब नहीं दिया, जैसे उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं था, पर बाद में उसी के कहने पर वह जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस गया. कल शाम को वह पहली बार क्लब गया था नन्हे के जन्म के बाद. लौटकर चुप-चुप ही रहा, उसे समझ नहीं आया, क्या यह नन्हें के कारण है, शायद यह स्वाभाविक ही है, सब कुछ बदल रहा है. कल उन्होंने अपने विवाह का एल्बम देखा, लगा ही नहीं कि यह उनका अतीत है, लगा जैसे किसी और का एल्बम देख रहे हैं. कितने सजे संवरे लग रहे थे उसमें और अब दिन भर कितना असत-व्यस्त सा रहता है सब कुछ. 

Sunday, June 17, 2012

हँसता शिशु


सुबह के साढ़े सात बजे हैं, नन्हे को अभी कुछ देर पूर्व ही सुलाया था पर दादी ने उसे उठा दिया है. बस अब दो ही दिन तो रह गए हैं उन्हें वापस जाने में, चाहते हैं कि वह अधिक से अधिक जगता रहे.  रात से ही वर्षा हो रही है. कल रात सोने से पूर्व उसने जून से कहा था कि रात को वह न जगा करे, शिशु के उठने पर वह खुद ही सम्भाल लेगी, उसकी नींद पूरी नहीं हो पाती, वह तो दिन में किसी भी समय सो जाती है. कल बड़ी बुआ का एक अच्छा सा पत्र मिला. यह पेन जिससे वह लिख रही है जून ने उसे उपहार में दिया था उनके विवाह के अवसर पर, कुछ दिन खराब रहकर यह पुनः लिखने लगा है अपने आप.
कल सुबह से ही उसकी मनःस्थिति ठीक नहीं थी जिसका असर शायद अब तक है, अक्तूबर से ही उन्होंने पैसे इकठ्ठे करने आरम्भ किये थे, वह चाहती थी कि उसके खुद के नाम से एक पासबुक हो, माना कि वह अभी तक सब आवश्यक वस्तुएं ले आया है पर उसे स्वयं के आत्मनिर्भर न होने का दंश तो चुभ ही रहा है. पिछले कई महीनों से वह जून को नए कपड़े लेने के लिये कह रही है पर वह उसे टाल जाता है. उसे आश्चर्य भी होता है कि धन के बारे में उसके विचार ऐसे थे उसे खुद भी पता नहीं था.
सब लोग चले गए हैं, घर पर वे तीनों रह गए हैं. नन्हें को ठंड लग गयी लगती है, उसके गले से खर-खर आवाज आ रही थी, और उसके पेट से भी आवाज आ रही थी, छोटा सा तो है वह और इतनी सारी मुसीबतें. हँसता है तो बहुत प्यारा लगता है. अगस्त के दूसरे हफ्ते में जून के इम्तहान  हैं, ऑफिस से आकर उसका ज्यादातर समय बच्चे के साथ ही बीतता है. आज से उसे पढ़ाई में ज्यादा समय देना है, वह तो सम्भाल ही सकती है उनके बेटे को.