शिवरात्रि का उत्सव उन्होंने आज आश्रम में मनाया। प्रकाशन विभाग के एक स्वयंसेवक ने अतिथि क्षेत्र में काफ़ी आगे जगह दिला दी थी। गुरुजी के दर्शन भी हो गये। सुबह एओएल का अनुवाद कार्य किया, जिसे करते समय उसे समय का भान ही नहीं रहता। दोपहर को मिट्टी के प्यालों पर रंग भरने का कार्य किया।शाम को पापाजी से बात हुई, दस दिनों के बाद वे उनसे मिलने जा रहे हैं। उन्होंने फ़ेसबुक पर उसकी कविता पढ़कर कमेंट भी किया।
आज वे एक नयी झील पर गये, नीलगुली झील, यह सोमानहल्ली झील से थोड़ा आगे है। वे एक घर के आगे से गुजरकर कच्चे रास्ते से होते हुए झील के किनारे-किनारे चलते रहे। कुछ देर पानी में पैर डालकर बैठे, शायद बैंगलोर में पहली बार ऐसा अवसर मिला। नन्हा-सोनू और उसका भाई भी आये थे। पहले कुछ देर जिग्सा पज़ल हाल की, एक बोर्ड गेम खेला और सबने मिलकर लंच बनाया। नन्हे ने उसे एक लाइफ़ कैलेंडर लाकर दिया है, उसमें हर इतवार को मार्क करना है। एक जन्मदिन से अगले जन्मदिन तक के सारे इतवार! आज जे कृष्णामूर्ति के बारे में एक पुस्तक सुननी शुरू की है।
आज वे डेंटिस्ट के पास गये थे, ट्रायल हो गया, अब दो दिन बाद दांत लग जाएगा सुबह सुहानी थी, एक घंटा वे प्रकृति के सान्निध्य में टहलते रहे। पीछे इतवार को नैनी ने बिना कहे अवकाश ले लिए था, जून ने थोड़ा क्रोध दिखाया, तो वह बहुत उदास हो गई, वह सदा ही उससे अच्छी तरह से बात करते आये हैं। वह बहुत भावुक है, जहाँ प्रेम होता है, वहाँ थोड़ी सी भी उपेक्षा सहन नहीं होती। दोपहर को कोरियन धारावाहिक, ‘व्हेन द वेदर इज फाइन’ का अगला भाग देखा, नायक व नायिका दोनों का जीवन एक सा रहा है, बचपन से ही वे एक-दूसरे से मिलते रहे हैं। नायिका सियोल में अपनी नौकरी छोड़ कर आयी है, नायक किताबों की दुकान चलाता है।साहित्य के प्रति उनका लगाव उन्हें एक बुक क्लब में ले जाता है।
आज पाँच महीने बाद दाँत लग गया। हिन्दी कक्षा में आज पहली बार ठाकुर कुंवर सिंह के बारे में पढ़ा, व पढ़ाया। वह आज़ादी के पहले संग्राम में भाग लेने वाले एक देशभक्त थे, जिन्होंने अस्सी वर्ष की आयु में अंग्रेजों के विरुद्ध संग्राम का नेतृत्व किया। ब्रिटिश सेना को हराने का दम भरने वाले ठाकुर कुंवर सिंह को भारत के इतिहास में सदा याद किया जाएगा।
आज सुबह एक मित्र दंपत्ति के साथ वे ३०० एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैली विशाल येलाहांका झील देखने गये।यहाँ कई प्रजातियों के पक्षी रहते हैं।पंछियों के साथ कुछ समय वहाँ बिताने के बाद एक अन्य झील, पुत्तनहल्ली के दर्शन भी किए। नाश्ते के लिए निकट स्थित पूर्ण ब्रह्म महाराष्ट्रीयन रेस्तराँ गये, जहाँ स्वादिष्ट नाश्ता मिला, जिसकी मात्रा इतनी अधिक थी कि शेष भोजन पैक कराकर ले आये, जो दोपहर के भोजन में काम आया।उनका अगला पड़ाव था, पैलेस ग्राउंड, तब तक धूप तेज हो गई थी, पर जल्दी ही बैंगलूर पैलेस में प्रवेश किया और वहाँ के शीतल विशाल कमरों में गर्मी का अहसास जाता रहा।मैसूर के महाराजा के लिए बने, उन्नीसवीं शताब्दी के इस महल के अनेक कमरों में लगी तस्वीरें देखीं, कुछ कमरे बंद भी पड़े थे। यह महल लंदन के विंडसर कैसल पर आधारित है।बाहरी दीवारों के कुछ हिस्से पौधों से ढके हैं। इस महल की शानोशौकत का ज़िक्र उस समय के लंदन के अख़बारों में भी होता था। उन दिनों राजा और उनके अंग्रेज मेहमान शिकार करते थे और हाथियों को पालतू बनाते थे। पैलेस ग्राउंड में संगीत समारोह, शादियाँ और प्रदर्शनी आदि लगायी जाती हैं। कल उन्हें यात्रा पर निकलना है।
दस दिनों की सुखमय यात्रा के बाद वे घर लौट आये हैं। कल सोसाइटी में ही होली का उत्सव मनाया जाएगा। आज होलिका दहन है, भारत की अनोखी सांस्कृतिक परंपरा का एक अनोखा उत्सव ! कुछ देर पहले ही वे क्लब के सामने बने ऐम्पिथियेटर में होलिका दहन देखकर आये। अनेक लोग आय थे, आकाश पर पूर्णिमा का चन्द्र बादलों के पीछे से झांक रहा था। आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक परिचित मिलीं, अन्य कई महिलाएँ भी, एक दूसरे को रंग लगाकर उल्लास मनाया। कितना अनोखा पर्व है होली, उमंग में भरे जन रंग लगाकर एक सूत्र में बँध जाते हैं, सभी के चेहरे एक जैसे हो जाते हैं। कल सुबह संगीत का कार्यक्रम भी है, नाश्ते का इंतज़ाम भी और उसके बाद रंग खेलने की बारी। आज सुबह नींद खुली उसके पहले बच्चों को देखा, भोले-मासूम बच्चे, मन जब बच्चों की तरह निर्दोष हो जाता है, तब भीतर शांति की धारा बहने लगती है।आज होली पर लिखी एक पुरानी रचना को संवारा। अगले इतवार को होली की पार्टी रखी है। शाम को नवनीत पढ़ा, पापाजी से चर्चा भी हुई, उन्हें नवनीत का ‘वृद्ध विशेषांक’ देकर आयी थी।
आज होली है और महिला दिवस भी। सुबह रोज़ की तरह वे चार बजे उठे, साढ़े पाँच बजे तक प्रातः भ्रमण से लौट आये। डेंटिस्ट के पास जाना था, लौटते समय उत्सव का मान रखते हुए दोपहर का भोजन बाहर ही खाया ! शाम को छात्राएँ हिन्दी पढ़ने आयी थीं, इसी महीने उनकी वार्षिक परीक्षाएँ हैं। मौसम बदल रहा है पर हवा अभी भी ठंडी है। अभी-अभी नन्हे-सोनू का फ़ोन आया, दोनों सुबह से अपने काम में व्यस्त थे। जैसे होली की उन्हें ख़बर ही न हो।
पिछले दो दिनों से रात को एक बार नींद खुल जाती है, कल कुछ देर बैठकर ध्यान किया। सुबह क्रिया के बाद अनोखा नीला रंग दिखा, जैसा बाहर कहीं नहीं दिखता। एक नयी कविता लिखी, निज के अनुभव से उपजी, पापाजी ने पढ़ी और कहा बहुत ज़ोरदार है, वह बहुत गहराई से पढ़ते हैं, उन्हें नवनीत भी अच्छा लग रहा है। आज बहुत दिनों बाद दोपहर को भी लेखन कार्य आगे बढ़ाया, कर्म करते हुए हाथ ही शोभते हैं। समय का पहिया तेज़ी से घूमता जा रहा है, कब ये आँखें मुँद जायेंगी, पता नहीं, विदेह होकर वे क्या कर पायेंगे ! वे रहेंगे, यह तो पूर्ण विश्वास है। जून आजकल शाम का ध्यान नहीं करते पर उनमें एक स्थिरता और गंभीरता तो बढ़ रही है। कुछ दिनों से सुबह टहलते समय वे ‘विज्ञान भैरव’ सुनते हैं, उसका प्रभाव भी पड़ता होगा।वक्ता ने बहुत ही स्पष्टता से शिव के वचनों को समझाया है, जो उन्होंने पार्वती से कहे हैं। आज शाम छोटी भांजी का फ़ोन आया, उसकी सासुमाँ की माँ के लिए कविता लिखने को कहा है, जो अठहत्तर वर्ष की हैं, उनके पति नहीं हैं, पाँच पुत्रियों और एक पुत्र की माँ हैं।
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