Wednesday, March 3, 2021

एस्टोनिया के फूल

 इस समय वे पहली मंजिल पर बैठक में बैठे हैं। राजस्थान पत्रिका में पढ़ा, दिल्ली में प्रदूषण के कारण स्कूल पाँच तारीख तक बंद कर दिए गए हैं। एक सप्ताह बाद उन्हें भी यात्रा पर निकलना है, तीसरे सप्ताह में दिल्ली पहुंचेंगे। तब तक संभवत: हालात सुधर जाएं। शाम को जून साइकिल से गैस सिलिन्डर की बुकिंग के लिए गए और उसने यहाँ आने का बाद पहली बार ध्यान किया, मन कितना शांत लग रहा है। सुबह सूर्योदय की तस्वीरें उतारीं, मोबाइल से प्राकृतिक दृश्यों की तस्वीरें उतारना कितना सहज है और अब तो यह  उसके जीवन का एक भाग ही बन गया है। आजकल सुबह-शाम दोनों समय टहलते समय फूलों की गंध आती है, एस्टोनिया के फूलों की गंध ! कल शाम नन्हा व सोनू आ गए थे, सुबह उनके साथ पहले डेन्टिस्ट के पास गए फिर कपड़े सिलने देने के लिए दर्जी के पास। मार्च तक उन्हें तीन शादियों में सम्मिलित होना है। 


तुलसी का पौधा लगाने के लिए पत्थर का एक विशेष गमला कल खरीदा था, कल उसमें पौधा लगाना है।  आज सुबह बुरादा, खाद मिलकर मिट्टी तैयार की। तुलसी व अजवाइन के पौधे लगाए, शेष गमलों में खाद डाली। ग्लेडियोली के बल्ब से पौधे निकलने लगे हैं। जून को बालकनी में पिटूनिया लगाने का मन है।  वे निकट स्थित एक नर्सरी में गए, पर वहाँ पौधे नहीं मिले, आश्रम की नर्सरी से दो फूल के पौधे लिए। आज मौसम अपेक्षाकृत गरम है, यहाँ ठंड का मौसम आता ही नहीं शायद। पिताजी को फोन किया तो उन्हें यहाँ आने का निमंत्रण दिया।आज टाटा स्काई लगाने के लिए लोग आए थे, शायद कल से वे कुछ देर टीवी भी देख सकें।


मन दर्पण है, परमात्मा बिम्ब है, जीव प्रतिबिंब है, यदि दर्पण साफ नहीं हो तो उसमें प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं पड़ेगा। संसार भी तब तक निर्दोष नहीं दिखेगा जब तक मन निर्मल नहीं होगा। हम अपने मन के मैल को जगत पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही जगत को दोषी मानते हैं। जब कभी हमने किसी को दोषी माना, उस पर अपना ही मत थोपा है। हर कोई जैसा है वैसा है। आत्मा सभी के भीतर बीज रूप में विद्यमान है। उसमें फूल खिलाना जिसने सीख लिया, सुगंध उसे ही मिलती है, उसे वृक्ष बनाना जिसने सीख लिया, छाया उसे ही मिलती है। उसे जाने बिना जो रह गया, उसके लिए आत्मा का होना या न होना क्या अर्थ रखता होगा ? 


दिन खरामा-खरामा बीत रहे हैं, किसी नदी की शांत धारा की तरह। मौसम आज भी गरम है। सुबह ठंडी थी, उन्हें जैकेट पहनकर निकलना पड़ा। फूलों से लदे वृक्षों की तस्वीरें उतारीं। कुछ देर प्राणायाम किया पर आसन नहीं किए, जून के अनुसार ‘समय नहीं था’ उन्हें हर काम को जल्दी करने की आदत है। कल शाम उन्होंने पिताजी की पुरानी तस्वीरें खोजीं, जिन्हें स्कैन करके एक वीडियो बनाना है। उनके जन्मदिन पर यह उपहार होगा उस कविता के साथ जो उनके लिए उसने लिखी है।  बर्तन डिशवाशर में लगाकर वे ऊपर शयन कक्ष में आ गए हैं। आज इतने दिनों बाद टीवी पर तेनालीरामा देखा, कहानी जैसे आगे बढ़ी ही नहीं है। दोपहर को वे फोर्टिस अस्पताल गए, उसके हाथ के नाखूनों में सफेदी आ रही थी और जून को भी त्वचा विशेषज्ञ को दिखाना था। डाक्टर ने खाने व लगाने  की दवा दी है। दोपहर को सीढ़ी चढ़ने में दाहिने घुटने में कुछ दिक्कत महसूस हुई, बर्फ का सेक करने का सुझाव दिया है नेट पर, जून ने तिल के तेल से मालिश करने को कहा। दिन में कई बार सीढ़ियाँ चढ़नी व उतरनी पड़ती हैं, नया-नया अभ्यास है अभी। अभी छोटे भाई से बात हुई, वह नन्हे की ससुराल गया था, वहाँ बहुत खातिरदारी हुई उसकी। नन्हे ने  शाम को बिग बास्केट से कुछ नए प्रकार के फल भेजे, उनमें एक ड्रैगन फ्रूट भी है। 


आज उन्हें असम छोड़े हुए तीन सप्ताह हो गए हैं। यहाँ घर  की दिनचर्या लगभग निश्चित हो गई है।  सुबह वे साढ़े चार बजे उठते हैं, टहलने जाते हैं जब हल्का अंधेरा होता है। वापस आकर योग साधना। हॉर्लिक्स पीने के बाद बगीचे में कुछ देर काम और हरसिंगार के फूल चुनना। उसके बाद स्नान और नाश्ता बनाना। जिसमें सब्जी काटने से आरंभ करना होता है। उसके बाद अखबार पढ़ना, व्हाट्सएप व फ़ेसबुक पर पोस्ट डालना।  जून ने दीवाली की लाइट उतारने के लिए इलेक्ट्रिशियन को बुलाया है। कल की सेवा के बाद दायाँ घुटना ठीक है, अब बाएं में कुछ दर्द हो रहा है, उसकी भी सेवा-सुश्रुषा हो जाएगी। एक सब्जी वाली घर बैठे पालक व पुदीना दे गई है, निकट ही एक गाँव है, वहीं से आयी होगी। शाम को वे टहलने गए तो काफी रौनक दिखी, एक पार्क में महिलाओं की थ्रो बॉल प्रैक्टिस चल रही थी। एक जगह बच्चे स्केटिंग कर रहे थे।  


वर्षों पुरानी उस पुरानी डायरी में पढ़ा - 


सत्य यही है कि संसार में दो नियम हैं जन्म और मृत्यु ! 

नाश का ज्ञान रखने वाला क्या कभी पाप करेगा ? वह तो जितने दिन रहेगा, स्नेह और समता से ही इस संसार में रहेगा। आदमी जब तृष्णा, अहंकार और ईर्ष्या से शीघ्र ही कुछ प्राप्त कर लेने के लिए काम करता है, तब वह अपने भीतर ही असहिष्णु हो जाता है। अहंकार उसकी नींवों को ठोस भूमि पर खड़ा नहीं रहने देता। 


सबकी आत्मा की शक्ति समान है कुछ की शक्ति प्रकट हो गई, कुछ की प्रकट होनी बाकी है, बस इतना ही अंतर है ! 


बापू की एक सूक्ति भी उसने लिखी थी - क्षण भर भी काम के बिना रहना ईश्वर की चोरी समझो। काम के सिवा भीतरी और बाहरी आनंद का और कोई रास्ता मैं नहीं जानता। 


18 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 04.03.2021 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
    धन्यवाद

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    1. बहुत बहुत आभार !

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  2. प्रेरक पोस्ट।

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    1. स्वागत व आभार मीना जी !

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" ( 2057..."क्या रेड़ मारी है आपने शेर की।" ) पर गुरुवार 04 मार्च 2021 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!



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    1. बहुत बहुत आभार !

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  5. बहुत सुंदर प्रेरणादाई रचना।

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  6. संसारिक गतिविधियों से जुड़े हुए भी आध्यात्म को उनमुख सुंदर पोस्ट।
    बहुत सुंदर।

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  7. वाह , जीने की कला है ये . बहुत बढ़िया

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  8. वाह!अनीता जी ,सुंदर आलेख ।

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  9. मन दर्पण है, परमात्मा बिम्ब है, जीव प्रतिबिंब है, यदि दर्पण साफ नहीं हो तो उसमें प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं पड़ेगा। संसार भी तब तक निर्दोष नहीं दिखेगा जब तक मन निर्मल नहीं होगा। हम अपने मन के मैल को जगत पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही जगत को दोषी मानते हैं। जब कभी हमने किसी को दोषी माना, उस पर अपना ही मत थोपा है। हर कोई जैसा है वैसा है। आत्मा सभी के भीतर बीज रूप में विद्यमान है। उसमें फूल खिलाना जिसने सीख लिया, सुगंध उसे ही मिलती है, उसे वृक्ष बनाना जिसने सीख लिया, छाया उसे ही मिलती है। उसे जाने बिना जो रह गया, उसके लिए आत्मा का होना या न होना क्या अर्थ रखता होगा ?...वाह!बहुत ही प्रभावित करती हैं आपकी बातें।
    सादर

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  10. बहुत सुंदर और रॉचक आलेख

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  11. ज्योति जी, संगीता जी, शास्त्री जी, अनीता जी, शुभा जी, खरे जी व मन की वीणा जी आप सभी का हृदय से स्वागत व आभार !

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