Wednesday, April 10, 2013

गुलाबी मच्छरदानी




आज सुबह वे वक्त पर पहुंच गए, ट्रेन ढाई घंटा लेट थी, पर इतना तो एक्सपेक्टेड था. घर आकर बहुत अच्छा लग रहा है उन्हें. मन जैसे किसी विश्रांत स्थान में जाकर शांत हो गया है. जून भी होते तो...उस दिन की ही तो बात है जब वह यह सोच रही थी कुछ दिनों के लिए उससे दूर रहना शायद उन दोनों के लिए अच्छा होगा, शायद ऐसा हो शायद न भी हो. पर इतना तो अवश्य है कि उसे यहाँ आराम ही आराम है जबकि जून वहाँ अकेले होंगे.

आज बढ़ई ने काम शुरू किया, जब वह रिक्शा पर दरवाजे व खिड़कियों के पल्ले आदि ला रहा था तब पिताजी ने उसे दिखाए. घर में अभी काफी काम शेष है. बिजली भी अभी घर तक नहीं पहुंची है. वकील साहब (जिन्होंने यह कालोनी बनाई थी), ने कहा है इतवार तक बिजली आ जायेगी.
 
कल उनकी यहाँ पहली रात थी, तिरालिस रातों में से. यहाँ इतने मच्छर होंगे उसे पता नहीं था. वे लोग रात को पंखा तेज करके किसी तरह सो तो गए क्योंकि पिछली तीन रातें सफर में गुजरी थीं, पर सुबह सवा चार बजे बिजली गुल हो जाने के बाद मच्छरों के कारण सो नहीं सके. माँ ने कहा है एक मच्छरदानी है, आज से उसी को लगाकर सोयेंगे.

 कल वे लोग बाजार गए, माँ और नूना. उसने नई पायलें खरीदीं, उसकी एक पायल खो गयी थी पहले जोड़े में से. सिंधी कढ़ाई के लिए एक डबल बेड की चादर तथा पेंटिंग के लिए काला कपड़ा खरीदा, जिस पर छोटी भाभी से डिजाइन छपवाना है. जून के लिए कुर्ते-पजामे का कपड़ा लिया, उसे जरूर पसंद आयेगा. आज भी घर में थोड़ा बहुत काम हुआ. रात को नेट के कारण नींद ठीक आयी पर गर्मी बेहद थी. जून वहाँ एसी में सोते होंगे या वहाँ वर्षा के कारण वैसे ही मौसम ठंडा होगा.

  नन्हे की ऑंखें लाल थीं, परसों से ही, सोचा ठीक हो जाएँगी, मगर लालिमा बढ़ती ही गयी फिर कल उसे डॉ के पास ले गयी छोटा भाई अस्पताल तक छोड़ आया था. दवा डालते ही काफी आराम लग रहा है, कल उसे फिर ले जाना है चेकअप के लिए, कल उन्हें पुश्तैनी घर में भी जाना है जहाँ  चाची का परिवार रहता है. उसी इलाके में माँ की चचेरी बहन के छोटे बेटे की शादी है परसों. कल दोपहर भोजन के लिए बुलाया है. आज बढ़ई काम पर नहीं आया है, न ही बिजली का कोई पता है. जून का खत जाने कब मिलेगा, फोन पर उन्होंने कहा था कि एक खत लिखा है. मंगल को उनके यहाँ आने पर ही पहला फोन आया था, एक बार फिर किया और अब दो तारीख को करेंगे जब नन्हे का रिजल्ट आयेगा. दीदी का पत्र आया है, उसने सोचा, माँ जब लिखेंगी, वह भी उसी में लिख देगी.

तुम नजरों से दूर सही
दिल के मेरे आस-पास हो
इसी धरा के इक कोने में
इस नीले अम्बर के नीचे
पहुंच रही है जिनकी खुशबू
इसी हवा में लेते श्वास हो

तुमने फैलायीं जो बाहें
गर्माहट महसूस हो रही
तुम हो...मेरे हो..याद किया करते हो मुझको
यह क्या कम है
यह संतोष कहाँ से आया
मैं क्या जानूँ
तुमसे स्वयं को दूर कर सकूं
भाव कभी न मन में आया

तन की यह दूरी इक भ्रम है
मन तो दोनों आस-पास हैं
दूर से तुम मुझको तक सकते
झांक सकी मैं वहीं तुम्हारे मन के अंदर
जहाँ छुपा है स्रोत प्यार का
जहाँ न पीड़ा, दुःख की छाया
जहाँ मिले थे प्रथम बार हम
तुम वही पुराने, जाने-पहचाने
मीत हो मेरे
तुम ही तो सदियों से गुंजित मन आंगन में
वही सुरीले गीत हो मेरे
दूर सही पर आस-पास हो
यहीं कहीं हो...
यहीं कहीं हो...






2 comments:

  1. बहुत मनोरंजक....डायरी आपकी ....!!
    सुंदर विरह-गीत....!

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  2. अदिति जी, स्वागत है आपका, आभार !

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