Sunday, May 31, 2026

नंदी मंदिर के दर्शन

नंदी मंदिर के दर्शन


आज माँ की बाईसवीं पुण्यतिथि है, बड़े भाई ने कई तस्वीरें व्हाट्सएप ग्रुप में पोस्ट की हैं।     सुबह सामान्य थी, ध्यान, भ्रमण, प्राणायाम। प्रातः राश में शकरकंदी की खीर और अजवाइन का पराँठा खाकर वे आधा घंटा ड्राइव करके जून के पूर्व अधिकारी के घर राजराजेश्वरी पहुँचे। गृह स्वामिनी ने अदरक वाली चाय पिलायी, इसके बाद वे सब ‘शृंगगिरी श्री शनमुख स्वामी  मन्दिर’ जाने के लिए निकले।एक पहाड़ी पर स्थित यह विशाल मंदिर उन लोगों के घर से अधिक दूर नहीं है। इसके छह मुखों वाला गोपुरम न जाने कितनी बार वे चलती हुई कार से देखा करते थे। गोपुरम के ऊपर एक क्रिस्टल गुंबद है जो दिन में सूर्य के प्रकाश से तथा रात्रि में बिजली के प्रकाश से चमकता है।ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ नहीं चढ़नी पड़ीं, एक वैन वाला ऊपर ले गया। एक सौ तेइस फ़ीट ऊँचे मंदिर का प्रांगण ख़ाली था, अभी मुख्य कक्ष भी पर्दे से ढका था, आधे घंटे बाद खुलने वाला था। एक पुजारी ने बताया, कार्तिकेय भगवान का अलंकार हो रहा है, अर्थात शृंगार ! प्रतीक्षा करते हुए उन्होंने नीचे एक बड़े कक्ष में गणेश भगवान की मूर्तियों के विशाल संग्रह के दर्शन किए। पट खुलने के बाद आरती आरंभ हो गयी, भगवान मुरूगन के बहुत ही भव्य दर्शन हुए। तब तक और कई लोग आ चुके थे, वे पंक्ति में लगे थे।सबने स्वादिष्ट पोंगल या खिचड़ी का प्रसाद भी ग्रहण किया।वहाँ से वे सोलहवीं शताब्दी में निर्मित ‘बुल टेम्पल’ देखने गये, यह मंदिर भी बहुत  विशाल है। इसे बासवगुड़ी या नंदी मंदिर भी कहते हैं। यहाँ स्थापित नंदी की मूर्ति लगभग पंद्रह फीट ऊँची और बीस फीट लंबी है। गणेश मन्दिर भी इसी से सटा हुआ एक प्रसिद्ध मंदिर है। यहाँ गणेश की अठारह फीट ऊँची और सोलह फीट चौड़ी विशाल मूर्ति है, जिसे डोड्डा गणेश कहते हैं।यहाँ का बेन्ने अलंकार, मक्खन से शृंगार बहुत प्रसिद्ध है। तीन मंदिरों में दर्शन के बाद वे घर वापस आये। दोपहर के भोजन में ज्वार की स्वादिष्ट रोटी, बैंगन की सब्ज़ी, दाल व सलाद परोसा गया। दोपहर बाद वे अपने घर लौटे। मेजबान दीदी ने दही में डालकर सुखाई गयी मिर्चें, लहसुन की चटनी, अंकुरित सलाद और मीठी रोटी घर ले जाकर बाद में खाने के लिए दी।अपने बड़े पुत्र के परिवार के चित्र दिखाये। 


आज दोपहर बहुत दिनों के बाद उसे बहुत गहरी नींद आयी, घोड़े बेचकर सोने जैसी नींद। जब मन में कोई चाह न हो, कुछ जानने की इच्छा भी न हो, तब इच्छा शक्ति, क्रिया और ज्ञान शक्ति में मिलकर तीनों एक हो जाती हैं। वे अपने क्रेंद्र में आ जाते हैं। सत, रज, तम का ही तो खेल है सारा, सत अर्थात ज्ञान, रज अर्थात क्रिया और तम अर्थात इच्छा ! ज्ञान का अर्थ है, वे स्वयं को जान लें, तब आनंद वहीं बरस रहा है, कुछ पाना नहीं नहीं है, कुछ करना भी नहीं है, ऐसा करना जो किसी चाह से प्रेरित होकर किया जाये। ऐसे में सभी के भीतर वही एक परमात्मा दिखाई देता है तो किसी से कोई शिकायत भी नहीं रहती।अपने भीतर भी चैतन्य के दर्शन होते हैं तो अपनी कमियाँ भी सतह पर ही नज़र आती हैं, जो एक हवा के झोंके से उड़ जायें, बस इतनी ही। प्रकृति में निरंतर परिवर्तन हो रहा है, पर उसे देखने वाला अबदल है, अच्युत है, वही वे हैं और वही सामने वाला भी है। जैसे उनसे भूलें होती हैं, वैसे ही औरों से भी होती हैं, वे करते नहीं हैं। आज दोपहर बाद एओएल का अनुवाद कार्य किया। शाम को पापाजी से बात हुई, उन्हें अब सुनने में थोड़ी तकलीफ़ होने लगी है। सुबहें अब भी ठंडी होती हैं, पर दोपहर को तेज धूप निकली थी। 


आज का इतवार मज़े-मज़े से बीता। सुबह की शांत शीतल फ़िज़ाँ में टहलना, खिड़की खोलकर ठंडी पर सुवासित हवा में धीमे-धीमे किसी अदृश्य लय पर श्वासों का अभ्यास और विज्ञान भैरव का श्रवण ! जून के हाथ की बनी अदरक वाली चाय, फिर बगिया से फूल चुनना, फूलों की तस्वीरें फ़ेसबुक पर पोस्ट करना और इत्मीनान से मानव कौल की किताब की पढ़ना। दोपहर बाद ओशो  की किताब पढ़ते-पढ़ते नींद की ऐसी झपकी लेना, जिसमें पूरा होश बना हुआ था।ऑडिबल पर देवदत्त पटनायक की आवाज़ में शिव-पुराण सुनना। महावीरी, हनुमान चालीसा की व्याख्या पढ़ना। टीवी पर एक लघु फ़िल्म देखना। नाश्ते में आलू पराँठा और लंच में ब्रोकोली राइस, दोनों जून के सौजन्य से, और सबसे अच्छी बात बीटिंग रीट्रिट देखना, वर्षा के बावजूद कार्यक्रम चलता रहा। 


आज नींद तीन बजे से पहले ही खुल गई थी। ऑडिबल पर शिव परिवार के बारे में सुना। मन कैसा ठहर गया है। उठकर ध्यान में बैठी तो पता ही नहीं चला चालीस मिनट से ज़्यादा पलक झपकते बीत गये। उनकी चेतना कितनी भव्य है, दिव्य और शांत, सुंदर भी, उस भाव का असर देर तक बना रहा। बाद में वे आश्रम गये, वहाँ के शिव मंदिर में पहली बार जल चढ़ाया, ध्यान के लिए बैठे, सब कुछ दैवीय प्रतीत हो रहा था। गुरुजी की आवाज़ में ॐ नम: शिवाय मंत्र ऐसे लग रहा था जैसे चेतना स्वयं ही स्वयं का नाम ले रही हो। गुरुजी इस धरा पर जीते जी ईश्वर स्वरूप हैं, उन्होंने अपने भीतर मन के पार जाकर उस अनंत के साथ एकत्व स्थापित कर लिया है। वह पूर्ण ज्ञान, पूर्ण क्रिया तथा पूर्ण भक्ति के साथ संयुक्त हैं। पूर्णता की अनुभूति करने की चाह भी भीतर पूर्ण ही जगाता है, इसलिए वह भिन्न-भिन्न अनुभवों से गुजरकर उसे अपने और निकट ला रहा है। नवनीत का नया अंक आज आ गया है। कुछ लेख पढ़े। डाइनिंग टेबल की कुर्सियों का कपड़ा आज बदल दिया गया, तथा गैराज में ग्राउटिंग का काम भी हुआ।एसी की सर्विसिंग भी हो गयी, तीनों एसी अब गर्मियों का सामना करने के लिए तैयार हैं।जून के रहते घर में कुछ भी काम पेंडिंग नहीं रह सकता। महीनों बाद आज उसने साइकिल चलायी। नन्हा और सोनू वापस आ गये हैं, वे कोलकाता में घूम घूमे। सोनू ने पोर्टर से उसके लिए सूट, एक बहुत सुंदर भगवदगीता, नेलोर गुड़ और संदेश भिजवाए हैं। पापाजी से बात हुई, कह रहे थे, अच्छी किताबें पढ़ते रहना चाहिए।  



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