Friday, May 22, 2026

कुम्हार का चाक


कुम्हार का चाक 

वर्ष का अंतिम दिन एक सुनहरी याद बनाकर उनके मनों में अंकित हो गया है। सुबह-सुबह नन्हा उन दोनों को लेकर एयरपोर्ट के लिए रवाना हुआ। सोनू की फ़्लाइट आने में समय था, पहले उसने कुछ देर गोकार्टिंग में समय बिताया। उसके बाद वे सभी रिज़ौर्ट गये। जहां का हरियाली से भरा वातावरण, बड़ा सा तरणताल, पारंपरिक आकृतियों से सजे झोपड़ी नुमा कमरे। एक जगह कुम्हार मिट्टी के बर्तन बना रहा था।सामान आदि रखकर वे उसी स्थान पर आ गये।जीवन में पहली बार मिट्टी के दो छोटे पात्र अपने हाथों से बनाये, लकड़ी से चाक घुमाता हुआ कुम्हार पूरी दक्षता से गिलास, कुल्हड़ बना रहा था। कुछ अन्य लोग भी उन्हें बर्तन बनाते देखकर वहाँ आ गये। इसके बाद कई पुराने बचपन के खेल खेले, जैसे लट्टू चलाना, गुलेल से निशाना लगाना। कुछ बच्चे बैडमिंटन आदि अन्य आधुनिक खेल खेल रहे थे। एक बड़ी सी मीनार थी, जिस पर चढ़कर सूर्यास्त का दृश्य देखा। रात को नये वर्ष स्वागत करने के लिए विशेष संगीत और भोज तो था ही। भोजन के बाद वे कुछ देर आकाश में चाँद-तारों को निहारते रहे। शहर से दूर अप्राकृतिक रोशनियों के न होने से तारे कुछ अधिक चमकदार प्रतीत हो रहे थे। लगभग साढ़े दस बजे वे अपने कमरों में आ गये। अवश्य ही कुछ लोग बारह बजे तक रुके रहे होंगे, जाने वाले को विदा और आने वाले का स्वागत करने की रस्म निभायी होगी।  


नये साल की पहली सुबह भी सुहानी थी।कच्चे रास्तों पर और बगीचों में चारों ओर घना कोहरा छाया हुआ था, पर ज़्यादा ठंड नहीं थी, सो वे दोनों रिज़ौर्ट से बाहर आकर सड़क पर टहलते हुए सूर्योदय की प्रतीक्षा करते रहे। कोहरे को भेदता हुआ सूरज पहले मद्धिम फिर शोख़ नारंगी रंग का हो गया।नन्हा व सोनू उठे तो वे सब इनडोर गेम्स वाले कमरे में आ गये, जहाँ कैरम का बोर्ड और शतरंज की बिसात बिछी थी।दिन में उन्हें अवतार-२ फ़िल्म देखनी थी। जो अपने आप में एक सुंदर अनुभव था।इस बार कहानी जैक और नियतिरी के बच्चों के इर्दगिर्द घूमती है।मानव सेना के आक्रमण से बचने के लिए वे लोग जंगलों को छोड़कर समुद्र तट पर स्थित एक कबीले मेटकायिना में शरण लेते हैं। पानी के अंदर के दृश्यों और आपसी रिश्तों को बहुत ही ख़ूबसूरती से फ़िल्माया गया है।शाम हो गई थी जब नन्हे ने उन्हें घर छोड़ा।


सुबह उठी तो मन में विचार आया, सुख=सु+ख, सु का अर्थ है शुभ, ख अर्थात आकाश, अपने आसपास का वातावरण जब सकारात्मक तरंगें लिए हो, उसमें कोई विकार न हो, तब जो अनुभव होता है, उसे सुख कहते हैं। लेकिन जहां शुभ है वहाँ अशुभ है, चाहे उस समय प्रकट न हो रहा हो।जहाँ सकारात्मकता है नकारात्मकता भी है। इसलिए सुख की कामना का त्याग ही ‘मुक्ति’ है। इस वर्ष उनका मूल मन्त्र सुख की जगह ‘मुक्ति’ होना चाहिए। मुक्ति का अर्थ है पूर्ण स्वतंत्रता, दो के द्वन्द्व से पूर्ण आज़ादी ! अब न सुख की तलाश है, न सुख-दुख का भय ! मुक्ति का अर्थ है, मन के पूर्वाग्रहों, धारणाओं, कल्पनाओं, आशंकाओं से मुक्ति ! एक ऐसे स्थान में रहने की कला, जहाँ पूर्ण रिक्तता है, जो इस जगत का स्रोत है। 


आज नूना को यह नई डायरी मिली है। एसबीआई की कगलीपुरा शाखा के अधिकारी घर आकर कैलंडर व डायरी दे गये। पिछले वर्ष भी वह आये थे। आज ही आर्ट ऑफ़ लिविंग की डायरी भी मिली कैलेंडर के साथ। शाम को बायीं तरफ़ की पड़ोसन से बात हुई, पीछे हफ़्ते उनकी सर्जरी हुई थी, स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं। निराश लग रही थीं, उन्हें आशा भरे शब्द कहे, गुरुजी से सुने हुए, ऐसे ही शब्द दोपहर को जून के बचपन के मित्र की धर्मपत्नी से कहे, जब वह पति की बीमारी की बात से परेशान हो रही थीं। ईश्वर ही सद्प्रेरणा देता है। ईश्वर की कृपा ही तो थी टैगोर और गांधी पर, जो देश के लिए इतना काम कर पाये। आज भवन जर्नल में ‘चरखे’ के बारे में  उनके विचार पढ़कर आनंद आया। जहाँ गांधी जी के लिए चरखा आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता का प्रतीक था, वही टैगोर का कहना था कि यांत्रिक और अनिवार्य श्रम से रचनात्मकता और बौद्धिक विकास बाधित होता है। गांधी जी के लिए चरखा करोड़ों लोगों को जोड़ने के लिए एक साधन और अहिंसक विरोध का प्रतीक था। टैगोर की दृष्टि में मनुष्य के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता से बढ़कर मानसिक व आध्यात्मिक स्वतंत्रता का महत्व है। इस मतभेद के बावजूद दोनों में आपसी प्रेम और सम्मान आजीवन बना रहा। 


आज भी ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित की, अब ब्लॉग पढ़ने वाले पाठक बहुत घट गये हैं, फिर भी उसे लिखने का काम जारी रखना है, स्वांत: सुखाय ही सही ! राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में कई लोग जुड़ रहे हैं, कांग्रेस के दिन पलट रहे हैं, ऐसा लगता है। रुस-यूक्रेन युद्ध अभी भी चल रहा है, एक वर्ष होने को आया। झारखंड के गिरिडीह ज़िले में पार्श्वनाथ सम्मेद तीर्थस्थल को पर्यटन स्थल बनाने की योजना को वापस ले लिया गया है, जैन समाज ने इसके ख़िलाफ़ आंदोलन किया था। उसे लगता है, यही भावना अन्य तीर्थ स्थानों के लिए भी होनी  चाहिए, वरना ऐसे स्थानों की पवित्रता बनी हुई नहीं रह सकती। 


सुबह से ही ठंडी हवा बह रही है, पर उतनी ठंडी नहीं जिसे शीत लहर कहा जाता है और जो उत्तर भारत में क़हर बरपा रही है।पापाजी ने बताया, कल दिल्ली का तापमान तीन डिग्री तक पहुँच गया था। सुबह भी चंद्रमा के दर्शन हुए थे और रात्रि भ्रमणके समय भी, कल पौष पूर्णिमा है।परसों से माघ का महीना शुरू हो रहा है। इतनी ठंड में भी लोग पूरे महीने संगम तट पर रहते हैं।आस्था के आगे कोई बाधा टिक नहीं सकती। आज समाचारों में सुना पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू यदि चाहें तो अस्थियाँ बहाने भारत आ सकते हैं, उन्हें दस दिनों के लिए वीज़ा दिया जाएगा। नाश्ते के बाद वे घड़ी साज के पास गये, दो हाथ घड़ियाँ बंद पड़ी थीं, स्मार्ट वॉच आ जाने के बाद वे घड़ियाँ कभी-कभी पहनी जाती हैं, पर कुछ महीनों बाद बैटरी बदलवानी पड़ती है। इसके बाद बंद पड़े फ़्लैट को देखने गये, एक कमरे में कुछ सीलन की समस्या दिखी, शायद पानी ऊपर से आ रहा था।ऊपर वाले घर में जाकर पता किया, प्रांजल व सेवंती किराए पर रहते हैं वहाँ, दोनों घर से ही काम करते हैं, बहुत अच्छी से तरह रखा था घर, उन्होंने कहा, मकान मालिक से सीपेज की बात कहकर ठीक करवायेंगे। कल उनके विवाह की सालगिरह है, नन्हा व सोनू आयेंगे, शायद रात को रुक जायें। आज स्वामी विवकानंद जी का राजयोग पर दिया गया प्रवचन सुना, उनकी शैली अद्भुत है और उनका ज्ञान अपरिमित ! भारत के इतिहास में वह हज़ारों साल तक जीवित रहेंगे।  


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