Showing posts with label प्रारब्ध. Show all posts
Showing posts with label प्रारब्ध. Show all posts

Friday, March 16, 2018

स्वेटर का मौसम



कल वे घर लौट आये, पिछले आठ-दस दिन यात्रा में बीते, बंगलूरु की यात्रा, जहाँ वे नन्हे के घर पर रहे और अब तो वहाँ उनका खुद का घर भी बनने वाला है. साइनिंग अमाउंट दे दिया गया है. मकान के मालिक काफी सुलझे हुए व्यक्ति हैं. उनकी पत्नी और वे खुद ईशा फाउंडेशन के सद्गुरू को मानते हैं. उनका व्यवसाय भी गाँव के लोगों की मदद से जुड़ा है. वह सोसाइटी भी काफी साफ-सुथरी है. वे वहाँ  के फूलों और बगीचों को निहारते हुए दिन में कई बार टहलते थे. अगले चार वर्षों में उनके कई चक्कर बंगलूरू के लगने वाले हैं. इस बार आश्रम नहीं जा पाई, गुरूजी भी बाहर गये हुए हैं, आश्रम में नहीं थे. स्कूल में पता चला मृणाल ज्योति के एक कर्मचारी को खेलते समय फेफड़े में चोट लग गयी है, वह अस्पताल में हैं. शाम को वे उनसे मिलने जायेंगे. ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य प्रदान करें.


पौने ग्यारह बजे हैं सुबह के. पिछले दो दिनों में बहुत कुछ घट गया. मंगल को जून ने दांत निकलवाया था, दोपहर को वे आकर लेटे थे. उसके सिर में हल्का दर्द था, सो कुछ देर खुली हवा में टहलने बाहर चली गयी. जून का फोन बजा जो डाइनिंग टेबल पर रखा था. आवाज सुनकर उसने शीघ्रता से क्यारी को छलांग कर आना चाहा पर पता ही नहीं चला, अगले ही क्षण वह धरा पर थी. फोन की स्क्रीन भी टूट गयी और दायें पैर का घुटना छिल गया. यह सब कुछ क्षणों में ही हुआ. गनीमत है ज्यादा चोट नहीं लगी. मन फिर भी शांत रहा. शाम को योग कक्षा भी ली और जून को भी शाम को बताया जब फोन ने काम करना ही बंद कर दिया. कल सुबह वह बाजार से सामान लेकर आये थे, तभी थैला लेकर सामान लेने रसोईघर से बाहर निकली और अगले ही क्षण जमीन पर थी. कुछ भी समझ में नहीं आया कि क्या हुआ. जून को यही कहा, चक्कर आ गया था. नैनी के घर से सभी हाल-चाल पूछने आ गये. नैनी की सास तो रोने ही लगी. कितने भोले दिल हैं इनके. जितना आपस में लड़ते-झगड़ते हैं उतना ही प्रेम भी करते हैं. मन में कुछ छिपाकर नहीं रखते. उसे लगता है, कोई प्रारब्ध कर्म उदय हुआ है, अथवा तो परमात्मा उसे कह रहे हैं, हर क्षण सावधान रहे, एक पल के लिए भी उसे न भूले. सजगता न खोये. जून का दांत दर्द अब ठीक है पहले से, अभी दवा ले रहे हैं. नन्हा कल रात घर वापस गया दो दिन होटल में रहने के बाद. मौसम अब ठंडा हो गया है, दिन भर स्वेटर पहनने का मौसम..कल छोटी बहन से बात हुई, उसे संबंधियों से निराशा हाथ लगी है, पर वह ज्ञान के पथ पर है सो इसे अपने मोक्ष के लिए अच्छा ही मान रही है. मतभेदों को भुलाकर उन्हें एक होना है, एकता में ही शक्ति है !

कल कुछ नहीं लिखा, सुबह मृणाल ज्योति गयी. नन्हा भी अब इसका सदस्य बन गया है. विश्व विकलांग दिवस के कार्यक्रम के निमंत्रण कार्ड्स भी लेने थे. फिजियोथेरेपी सेंटर में नई मशीनें आई हैं, लडकियों के लिए छात्रावास भी बन रहा है. बाहर ही ऑफिस भी बन रहा है, उनका इरादा है कि अगले दो-तीन वर्षों में एक दुकान तथा एक गेस्टहाउस भी खोल दें. मृणाल ज्योति एक लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है. बुआ जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उसने फोन किया पर घंटी बजती रही, शायद वह सो रही हों. उस दिन चचेरी बहन को फोन किया तो उसने भाई की बिगड़ती मानसिक हालत के बारे में बताया. वे उसका इलाज करने को तैयार हैं, पर वह खुद नहीं करवाना चाहता. इन्सान की बुद्धि ही जब उसका साथ छोड़ देती है, तब उसे कौन बचा सकता है ? दोपहर के बारह बजने को हैं, जून अभी तक नहीं आये हैं, उसे भूख का अहसास हो रहा है, फ्राइड राइस बनाये हैं आज. सुबह घर की साप्ताहिक सफाई करवायी और साप्ताहिक स्नान किया. मन का स्नान संतों की वाणी सुनकर हुआ. परमात्मा की असीम कृपा उन पर बरस रही है, बस उसे महसूस भर करना है.       


Saturday, November 7, 2015

आजादी की पहली लड़ाई


कल एक नन्ही बालिका से मिली, एक सखी की नन्ही सी बेटी, अभी तीन महीने की भी नहीं हुई, कल होगी. बहुत अच्छा लगा, वे सभी बहुत खुश थे, एक परिवार पूरा हुआ, बच्चे के होने पर ही परिवार पूर्ण होता है. नूना का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, गला खराब है, सर में दर्द है, लेकिन ये सब वास्तव में उसमें नहीं हो रहा है, वह शरीर से परे है, शरीर को ऐसा अनुभव पहले भी कई बार हुआ हैं. प्रारब्ध का कोई कर्म होगा जो अब सामने आया है. वैसे पिछले दो-तीन दिनों में भी कई ऐसे कर्म किये उसने जो ठीक नहीं थे. बालों में खराब हो गई मेंहदी को लगाना और ढक कर रखना पूरे तीन घंटों तक, सुबह-सुबह ठंडे पानी से स्नान, मैदे का आहार तथा बाहर का खाना, ये सारी बातें निमित्त बनीं उसके प्रारब्ध को प्रकट होने के लिए. दीदी का फोन कुछ देर पहले आया, कुछ देर को सब भूल गयी. बहुत दिनों बाद छोटी चाची से भी बात की, वह कई दिनों से उन्हें फोन करने की बात सोच रही थी. उन्होंने अपने काम की परेशानियों के बारे में बताया, कढ़ाई का कम अब पहले सा नहीं रहा. कम्प्यूटर वाली मशीनें आ गयी हैं. वह चाहती थीं कि नूना छोटी बहन से बात करे कि उनके बड़े पुत्र को विदेश आने के लिए कहे, पर उसे लगता है इन पारिवारिक मामलों में न पड़ना ही ठीक है, वैसे भी छोटी बहन दो महीने बाद आ रही है वह स्वयं ही बात कर लेंगी.

आजादी की पहली लड़ाई १८५७ में लड़ी गई थी आज उसको डेढ़ सौ वर्ष हो गये हैं. टीवी पर सोनिया गाँधी इस अवसर पर लाल किले से ओजस्वी भाषण दे रही हैं. उनका भाषण तो किसी अन्य ने लिखा होगा लेकिन उनके बोलने का तरीका तथा उच्चारण काफी अच्छा हो गया है. उसने पिछले दिनों इंदिरा, नेहरु तथा आजादी की लड़ाई के वक्त की घटनाओं के बारे में पढ़ा. गाँधी फिल्म भी देखी, उनके देश की कहानी अद्भुत है और अनोखा है सेनानियों का बलिदान !

कल उन्होंने बच्चों के कार्यक्रम के द्वारा गुरूजी का जन्मदिन मनाया. उनका उत्साह देखते ही बनता था. इसी महीने मृणाल ज्योति भी जाना है. इसी महीने उसका जन्मदिन भी है, ऐसे ही कुछ और जन्मदिन आयेंगे और फिर आएगा निर्वाण का दिन, जीते जी जिसने आत्मा का अनुभव कर लिया उसका निर्वाण तो निश्चित है. उसके बाद उनका मन है कि वे इस धरा पर कहाँ जन्म लें. अभी तक तो वे अपने कर्मों के द्वारा भटकाए जाते रहे हैं, पर अब सद्गुरु के द्वार पर आकर यह भटकन खत्म हो गई है, वह उनकी आत्मा है, उनके रूप में मानो अपनी आत्मा को ही पा लिया है. उन्हें अपने भीतर भी वैसी ही पवित्रता, मस्ती और आनन्द का खजाना मिल गया है, जैसे वे जगत में बांटते फिरते हैं. वे पूर्ण तृप्त हो गये हैं. पूर्ण काम और पूर्ण निश्चिन्त !

जब ध्यान स्वयं घटित होने लगे तो अलग से उसके लिए बैठने की बहुत आवश्यकता महसूस नहीं होती, आज यह उसके ध्यान का समय है पर वह लिख रही है, कितनी बातें भीतर है जो उससे कहनी हैं जो सब जानता है. लिखना भी अब अति आवश्यक नहीं रहा, मन पूरी तरह खाली होना चाहता है, कोई अपेक्षा नहीं, कोई बंधन नहीं. आज वर्षा की रिमझिम जारी है. पिछले तीन-चार दिनों से ऐसा ही हो रहा है, उनके सतनाम-ध्यानकक्ष की सभी पाँचों खिड़कियाँ खुली हैं, ठंडी हवा रह-रह कर आ रही है. सामने की दीवार पर गुरूजी तस्वीर में मुस्कुरा रहे हैं, उनकी मुद्रा मोहक है. मुस्कान चित्ताकर्षक है. उसके पीछे राधाकृष्ण की मूर्ति है तथा दीपदान जो वे वाराणसी से लाये थे. इस कमरे को जून ने कितनी लगन से उसके साथ मिलकर सजाया है पर अफ़सोस कि उनके हृदय में संतों के प्रति कोई आदर नहीं है, ईश्वर के प्रति प्रेम भी नहीं, आर्ट ऑफ़ लिविंग की टीचर कहती है यह जरूरी तो नहीं कि सब उनके जैसे हों, उसे यह प्रतीक्षा धैर्यपूर्वक करनी होगी तथा प्रार्थना भी कि उनके आसपास के लोग भी उस आनन्द को चखें जो उन्हें मिला है !    



Monday, August 3, 2015

खून की होली


उसे इस बात का पता तो चल गया है कि कर्मों की गठरी जितनी छोटी होगी मुक्ति उतनी ही जल्दी मिलेगी और जितनी बड़ी होगी, उतनी ही देर लगेगी. यह तो तय है कि साधक की गठरी बढ़ती नहीं है, धीरे-धीरे खाली हो जाती है, तब अहंकार जो पहले सजीव था, निर्जीव हो जाता है. उसके बाद ही वास्तविक पुरुषार्थ आरम्भ होता है. मुक्ति के बिना भक्ति भी नहीं होती, जब मन क्षुद्र बातों से मुक्त होगा तभी न अनंत की ओर जायेगा.

कल रात स्वप्न में अपने हाथों पर, बाँहों पर खून लगा देखा. बनारस में कुछ दरिंदों ने बम विस्फोट किये भीड़ भरी जगहों पर, उनसे तो समाचार भी देखे नहीं जा रहे थे, जो लोग शिकार हुए होंगे, उनकी हालत का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है. वर्तमान समाज को कितने हमले झेलने पड़ रहे हैं, पहले बाहर से आक्रमण होते थे तो लोग उसके लिए तैयार रहते थे लेकिन आज के युग में हिंसा कितनी घिनौनी हो गयी है, हिंसा सदा से ही घृणित है लेकिन उसका यह रूप वीभत्स है. निर्दोष लोग, बेखबर अपने कामों में लगे लोग इस बेरहमी से उड़ा दिए जाते हैं मानो कोई खिलौना हों. यह एक बड़ी साजिश है, या नियति का चक्र, यह प्रारब्ध है अथवा मानव की हैवानियत. मानव के भीतर का पशु जागता है तो वह खून का प्यासा हो उठता है. उसके भीतर उन आतताइयों के प्रति भी सहानुभूति जगती है, उन्हें किस कदर अंधकार ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है. वे अनजान हैं इसके परिणाम से. कर्मों के खेल में क्या वे बचे रह पाएंगे ? एक साधक ऐसी स्थिति में क्या करे, क्या वह हाथ पर हाथ धर कर बैठा रहे अथवा तो सब कुछ परमात्मा पर छोड़ दे. आए दिन देश में कहीं न कहीं बम फटते रहते हैं, काश्मीर, असम था अब बनारस भी नहीं बचा. उसके भीतर भी एक विषैला कारखाना है जहाँ कटु शब्दों के बम बनते हैं. विपासना करते-करते उसका उसका पता चला है. उन कारखानों को ही उड़ाना है, ताकि उसकी भाषा संयत हो, मधुर हो, उसके लायक हो तथा प्रेम से भरी हो !


आज का दिन और दिनों से कुछ अलग है. सुबह नाश्ता भी नहीं किया था, अभी व्यायाम ही करके उठी थी कि मिस्त्री/ मजदूर आ गये, नये कमरे के लिए द्वार तो भीतर से ही बनेगा, कमरे को फटाफट खाली किया. शोर में ही पाठ किया और नाश्ता. तब तक हेयर ड्रेसर आ गयी. जून की पसंद के बाल काटे हैं हैं उसने, छोटे-छोटे कर दिए हैं, अब तीन-चार महीनों तक कटवाने की जरूरत नहीं, शायद साल भर तक ही. घर कैसा फैला-फैला लग रहा है, मौसम भी गर्म हो गया है, बाहर बगीचा भी बिखरा-बिखरा सा पड़ा है, माली कई दिनों से नहीं आया. बाहर जो तीसरा कमरा बन रहा है उसके कारण भी लॉन गंदा हो गया है. कल शाम जून ने कहा कि मई में वह मलेशिया जा सकते हैं, दो हफ्ते लगेंगे, चाहे तो वह घर जा सकती है, पर उसका बैरागी मन इसके लिए तत्पर नहीं है, बल्कि इन दिनों का उपयोग वह साधना के लिए कर सकती है. एडवांस कोर्स या विपश्यना का दस दिनों का कोर्स, यही उन दिनों का सबसे अच्छा होगा. इस समय दोपहर के तीन बजे हैं, वह अभी दायें तरफ की पड़ोसिन से बात करके आई है उसके माली के लिए जो फ़िलहाल तो बुखार में पड़ा है.  

Tuesday, March 3, 2015

बुल्लेशाह की काफी


ज्ञान वहीं टिकता है, जहाँ वैराग्य है ! ‘मैं’ मेरी है या तेरी है ? यदि यह ‘मैं’ मेरी नहीं तेरी है तो कैसा बंधन और कैसी मुक्ति ? अहंकार शून्य गुरू के सम्मुख जो स्वयं भी ऐसा हो जाता है वही उसको पा सकता है. अभी कुछ देर पूर्व गुरुमाँ का सुंदर प्रवचन आ रहा था पर अब केबल नहीं आ रहा है. मन जो उच्च स्तर पर पहुंच गया था फिर रोजमर्रा के कार्यों की सूची बनाने में व्यस्त हो गया है, मन को कितना समय लगता है एक स्तर से दूसरे स्तर तक जाने में. पलक झपकने से भी कम समय लगता है. सुबह ‘क्रिया’ के दौरान भी कई बार इधर-उधर की सोचने लगता है. अज सुबह ही चाय पीते समय किसी की खबर सुनकर आलोचना पर उतर आया जबकि वह इस दुनिया में नहीं रही थी. जो इस दुनिया से चला गया उसके लिए कुछ बाकी नहीं रह गया. सद् प्रार्थना  ही चाहिए उसे. पल-पल मन को सचेत रखना है अन्यथा परमात्मा दुर्लभ ही रह जायेगा. बस अब और नहीं, बहुत डोल लिए हिंडोलों में, बहुत पचड़ों में पड़ लिए. अब मुक्त होना है, अपने मन की गांठों को एक-एक कर खोलते जाना है और पुनः न बंधे इसके लिए भी सतर्क रहना है. मन की सौम्यता को नष्ट होने से बचाना है. धर्म की रक्षा करनी है और सत्य का दामन जोरों से पकड़ना है. मन जितना सरल होगा जीवन उतना ही सहज होगा और सहज प्राप्य ईश्वर तब उन्हें उसी तरह मिलेंगे जैसे हवा और धूप !

कल शाम को bang on the door पुनः पढ़ी और समझी भी. जैसे-जैसे वे ज्ञान के सागर में नीचे उतरते जाते हैं मोती और सुंदर होते जाते हैं. गुरू ज्ञान का सागर है और उसके वचन सुनहले मोती हैं जिन्हें उन्हें धारण देना है. जिनकी चमक से उन्हें अपनी आत्मा को चमकाना है फिर वह उनसे छुप नहीं सकेगी, प्रकाशित होगी ही. गुरुमाँ ने बुल्लेशाह की एक काफी पढ़ी, जिसका भाव था कि ‘ध्यान में इतना मग्न हूँ कि मुझे समय का भान नहीं है और न ही कोई मुझे समय का भान कराए अपने हृदय में मैं उस प्रिय का दर्शन करने में मस्त हूँ कि संसारी प्रवृत्ति में लगने की मेरी कोई इच्छा ही नहीं रह गयी है’. परसों गुरूजी का जन्मदिन है, वह बेहद खुश है. शाम को वे उत्सव में जायेंगे, जून लेकिन नहीं रुकेंगे, गुरूजी ने उसे इतना कुछ दिया है कि कृतज्ञता के सिवा उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है पर वह उनकी आभारी है, बहुत बहुत आभारी !  

आज श्री श्री का जन्मदिन है, आज ही के दिन पैंतालीस साल पूर्व वह तमिलनाडु के पापनासम नामक स्थान पर वेंकटरमण तथा विशालाक्षी के यहाँ जन्मे थे. बचपन से ही भगवद् प्रेम का उनमें उदय हो चुका था. ईश्वर की उसपर अनुकम्पा है कि ऐसे गुरू के दर्शनों का उसे लाभ हुआ है. उनकी ज्ञान गर्भित, सार युक्त प्रेरणा प्रद सत्य वचन हृदय को उच्च केंद्र तक ले जाते हैं. उनके कर्म अकर्म बन जाएँ सदा ईश्वर की सेवा में जुड़े रहें, पुराने कर्मों को काटते चलें, उनके द्वारा मिले प्रारब्ध को वे भोगते चले जा रहे हैं. नया कुछ कर नहीं रहे हैं तो नया जन्म लेने की क्या आवश्यकता है, मन निर्वासनिक हो गया है, मात्र कर्त्तव्य शेष है पर कोई वासना नहीं, कोई भौतिक वस्तु उन्हें  नहीं चाहिए. मानव देह उन्हें इसलिए ही मिली है कि अपने प्रारब्ध को समभाव से भोगते रहें तथा आगे के लिए कोई बंधन न बांधें !