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Saturday, August 30, 2014

टेलीविजन - इडियट बॉक्स


पवित्र संग की आध्यात्मिक तरंगे हृदय को प्रभावित करती हैं और साधक को लोकातीत परमसुख का आकर्षण होता है”. आज बाबाजी ने संग की महत्ता को बताया. संग का बड़ा रंग लगता है. उसने चिन्तन किया यदि कामनाएं सीमित हों तो मन सुखी रहता है. ईश्वर का वरदान स्वरूप यह जीवन उन्हें समय की धारा के साथ-साथ बढ़ने के लिए मिला है. मन पर नियन्त्रण एक मर्यादा को जन्म देता है. सामान्य सुखों के पीछे अपने हृदय के अलौकिक सुख को जो तज दे, वह दुखों को आमन्त्रण दे रहा है. अंतर्दृष्टि रखते हुए इस जीवन रूपी चादर को स्वच्छ रखा जा सकता है, बुद्धि स्थिर होने से ही सही निर्णय की शक्ति प्राप्त होती है.

आज बाबाजी ने बड़ी मजेदार बात कही, कुल डेढ़ पाप होता है और कुल डेढ़ ही पुण्य होता है. एक पाप देह को ‘मैं’ मानकर उसमें आसक्त रहना और आधा सारे अन्य पापों को मिलाकर होगा. इसी तरह एक पुण्य आत्मा को ‘मैं’ मानने से व शेष आधा अन्य सभी अच्छे कर्मों को मिलाकर होगा. उस दिन मीटिंग अच्छी रही. उसका कविता पाठ सबसे पहले हुआ, कुछ लोगों ने तारीफ भी की. एक सखी का pearl set पहन कर अच्छा लगा, ड्रेस कोड के हिसाब से उसे वह पहनना था.  वक्त पड़ने पर उसने सहायता की, इसी का नाम तो मित्रता है. आज धूप तेज है, सूरज की तरफ पीठ करके बैठने पर भी चेहरे पर तपन महसूस हो रही है. सो अंदर जाना ही ठीक है. बगीचे में फूल ही फूल दिखाई दे रहे हैं, क्रिसेंथमम व गुलाब के फूल तथा जीनिय के, जो बड़े शोख रंगों में हैं.

आज बाबाजी का प्रवचन सुनकर मन भावविभोर हो उठा. कितनी गूढ़ बातें वह कितनी सहजता से कह जाते हैं. ईश्वर के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं. न जाने कितने उदाहरण, कितने उपाय बताते हैं. हर कोई अपने स्वभाव व रूचि के अनुसार तरीका पसंद करे और चल दे उस सच्चे मार्ग पर, जिससे अपना भी कल्याण है और लोक कल्याण भी . वह कहते हैं किसी भी बाहरी आकृति या रूप की नकल कोई न करे. अच्छा बनने का प्रयास भी नहीं बल्कि वह जो है, उसे सहज होकर जाने. यह जानना ही उसे सच्चा ज्ञान देगा. किसी को कुछ बनने की, किसी के जैसे होने की लालसा को प्रश्रय नहीं देना है, बल्कि अपने भीतर छुपी उस अनंत शक्ति का बोध पाना है, अपने अंतर के ईश्वर को भजना है. मन्दिरों और तीर्थों के भगवान किसी का कुछ भी भला नहीं करेंगे यदि मन में उसके दर्शन नहीं किये. कबीरदास ने ठीक ही कहा है – माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि, मनवा तो चहूँ दिसी फिरै....इस चहूँ दिसी फिरने वाले मानस को राह दिखानी है. राह जो उस परम सत्य तक ले जाती है. मनसा, वाचा, कर्मणा उसे ही समर्पित होना है. मन व्यर्थ का चिन्तन न करे, वाणी का दुरूपयोग न हो, कर्म ईश्वर को अर्पण हों तो जीवन स्वयंमेव तीर्थ बन जायेगा !

TV viewing is harmful for children, in fact it should be excess TV viewing is harmful for children. Nanha has to speak on this topic tomorrow. So she thought to brush up her mind also to get some points.Violence is increasing in  today’s youngsters even toddlers these days. Mothers are complaining the aggressiveness and restlessness among kids who are exposed to all kinds of programmes on TV.Children are more demanding these days, they get attracted to all the beautiful things, dresses and other products on TV and they want same things, they do not understand the difference between reality and virtual.They are exposed to harmful radiations, in cities houses are small so they watch TV from a short distance which affects their eyes also.They are distracted, while preparing for test and exams, if their favourite programme is being telecast ed they rush to watch it. They waste their valuable time, which can make or mar their future.They disobey their parents, who want to limit their TV hours. Children do not play outdoor games, they are less social than their parents when they were young. They live in fantasy which keeps them away from real life realities. They are exposed to all kind of adult program which can leave harmful impression on their young mind.  They mostly watch film based programmes or cartoon shows, both give only light entertainment but no education. She thought if Nanha asks her help she can give now.



Thursday, August 8, 2013

ईद का अवकाश


अपने आप को जानो’ आचार्य गोयनका जी का प्रवचन आज सुबह फिर सुना. ध्यान लगाने बैठी तो मन को मुश्किल से दस मिनट के लिए ही स्थिर रख पायी. उन्होंने कितना सहज उपाय बताया है कि मात्र सांस का आना-जाना ही अनुभव करो. मन को उस बिंदु पर केन्द्रित करो जहाँ से साँस आती व जाती है पर मन है कि एक क्षण में कुछ का कुछ सोचने लगता है. अभ्यास से वह अवश्य ही केन्द्रित कर पाएगी. कल शाम उसने कुछ शेर लिखे, ग़ालिब की पुण्य तिथि थी, शायद उसी का असर था. जून आज जल्दी घर आ गये हैं,  कल शाम वे साइकिल से क्लब गये थे, शायद वापसी में सर्द-गर्म हो गया. कल शाम को उसने ‘मारियो पूजो’ की पुस्तक The Dark arena पढ़नी शुरू की है, रोचक है और भाषा भी सरल है.

शनिवार को पीटीवी पर एक पाकिस्तानी शायरा के ‘आजादी’ के पैगाम को सुनकर और वह  खूबसूरत नज्म “सफर जारी रहना चाहिए”....’इसी शहर में सुबह से शाम तक बस एक थैला और एक रोटी....बड़ा मजा आता है’ सुनकर उसके मन में भी घर से निकलने का जोश तारी हो गया. और पड़ोसिन के यहाँ गयी. उसे तो बड़ा मजा आया पर उसकी आजादी की कीमत जून को चुकानी पड़ी. उस शायरा ने यह भी तो कहा था कि एक की आजादी की हद वहीं तक होनी चाहिए जहाँ से दूसरे की आजादी शुरू होती है. पर यह बात उसकी समझ में नहीं आई. दोपहरी थोड़ी सी उदास होकर ठीक हो गयी, शाम क्लब में ‘फ्लावर शो’ देखने गये, फिर एक मित्र के यहाँ, पर वे व्यस्त थे, अनचाहे मेहमान की तरह कुछ देर रुक कर वे वापस आये. आकर कुछ देर साइकलिंग की. इतवार शाम वे क्लब गये टीटी खेलने, जून के साथ घर आकर क्रिकेट मैच देखा, भारत अपना पहला मैच जीत गया. आज फिर खत लिखने हैं, बहुत दिनों बाद बड़ी भाभी का पत्र आया है, वर्षों बाद पाए मातृत्व से वे अभिभूत हैं. मंझले भाई का पत्र भी आया है, लिखता है, उसके पत्र का इंतजार रहता है, आखिर भाई किसका है. अपने आप से किये वायदे को निभाना ज्यादा जरूरी है न कि दूसरों से किये वादों को.

...और आज धूप फिर से निकल आई है, कल दोपहर को फोन पर उस सखी से बात करके दोस्ती का सूरज फिर से निकल आया था, शायद वे खुद भी नहीं जानतीं कि इस मित्रता की जड़ें कहीं गहरे जा चुकी हैं. कल दोपहर पत्र तो नहीं ही लिख पायी, अख़बार पढ़ती रही, और फिर स्वेटर बनाया, शाम को क्लब. आज सुबह गोयनका जी को देर से सुना, कह रहे थे ‘धर्म सार्वजनीन है, प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक जीवन व्यतीत करके अपने जीवन को शांत, सरस व सुखमय बना सकता है’.


आज इदुलफितर है, जून और नन्हे दोनों का अवकाश, और उसका काम तो रोज की तरह ही है. गृहणियों की छुट्टी कभी नहीं होती, लेकिन उसे अपनी यह दिनचर्या भाती है. जून मार्च में उनकी यात्रा के लिए टिकट बुक कराने तिनसुकिया गये हैं. नन्हा आराम से स्नान कर रहा है. छुट्टी के दिन वह स्टीम बाथ लेता है. आज भी बदली छाई है. कल लेडीज क्लब की मीटिंग थी उसने वही आसमानी सिल्क की साड़ी पहनी जो जून लाये थे. उस साड़ी की तारीफ़ भी हुई, सचमुच जून की पसंद बेहद अच्छी है. जीप की आवाज आ रही है, लगता है वह आ गये हैं और वहीं से इशारा भी किया है, टिकट मिल गयी है.