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Monday, May 25, 2026

बरगद का प्राचीन पेड़


बरगद का प्राचीन पेड़


आज स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन पर हुबली-धारवाड़, कर्नाटक में छब्बीसवाँ ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ मनाया गया, प्रधान मंत्री भी वहाँ पहुँचे हैं। इस बार का विषय था, ‘विकसित युवा, विकसित भारत’। सुबह  वे घर से सवा नौ बजे निकले। एसबीआई में लॉकर का काम हो गया। कुछ देर नन्हे की सोसाइटी की लाइब्रेरी से लेकर धूप में बैठकर ओशो की एक किताब पढ़ी, अच्छी किताब है।आज डेंटिस्ट ने उसके दातों में लगाये इंप्लांट्स में स्क्रू भी लगा दिये हैं। अब एक हफ़्ते बाद जाना है।आज उनका मंगाया हिन्दी की एक अत्यंत प्रतिष्ठित, सांस्कृतिक, संग्रह पत्रिका ‘नवनीत’ का पहला अंक आ गया। भारतीय विद्या भवन से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका को इतने दिनों बाद फिर से पढ़ना एक सुंदर अनुभव होगा।उसे याद है, बचपन में पापाजी अपने दफ़्तर की लाइब्रेरी से हर महीने इसके अंक लाया करते थे। शाम को छोटी बहन का फ़ोन आया, बहनोई के जन्मदिन पर कविता की फ़रमाइश थी, उसने लिखकर भेज दी है। उनका रेस्तराँ अच्छा चल रहा है, पर हिस्सेदार भारत आ गये हैं। इस बार बैंगलुरु में भी ठंड पड़ रही है, कल सुबह तापमान चौदह डिग्री होने की संभावना है। पापा जी ने कहा, आज वह धूप में बैठे, सर्दियों की धूप कितनी कीमती होती है।जून लोहड़ी के लिए कुछ सामान लाए हैं, कल वे आग जलायेंगे।  


आज बहुत दिनों बाद उसके सिर में हल्का दर्द है। कारण दो हो सकते हैं, पहला सुबह-सुबह दूध पीना और दूसरा नाश्ते में हरे चने और बेसन का चीला, ऊपर से जून ने लंच में भी हरे चने का पुलाव बनाया, उनके अनुसार उन्हें अधिक समय तक रखा नहीं जा सकता था। किसी का भोजन ही उसके लिए रोग का कारण बन जाता है, औषधि भी वही है। गरिष्ठ भोजन का असर उसे तुरंत महसूस होने लगता है, दोपहर के ध्यान में नेत्र कैसे उनींदे हो रहे थे और शाम को टहलते समय शुरू में पैर कितने भारी लग रहे थे। सुबह ‘काव्यालय’ में एक पोस्ट प्रकाशित की, एक कवि/पाठक ने कहा है, उसकी कविता में अध्यात्म के लक्षण हैं, प्रणाम भेजा है। स्वयं को जानना यदि अध्यात्म है तो सचमुच ‘मन’ अब स्वयं की हक़ीक़त जान गया है। यह एक साधन है, विचार, भाव तथा स्मृति को संजोने का साधन, यह प्राण ऊर्जा से चलता है, प्राण अपनी ऊर्जा आत्मा से ग्रहण करते हैं, भोजन तथा नींद से से भी। भोजन सात्विक और हल्का हो तो शरीर, मन, प्राण,तीनों हल्के रहते हैं। आत्मा अर्थात ‘मैं’ इनकी साक्षी हूँ तथा इनका आश्रय भी। आत्मा की उपस्थिति में ही ये काम करते हैं।आत्मा के लिए ही ये कार्य करते हैं। आत्मा आनंद स्वरूप है। आत्मा स्वयं को सीमित तन, मन तथा प्राण भी मान सकती है तथा स्वयं को जानकर अनंत परमात्मा का अंश भी, अथवा ब्रह्म स्वरूप भी। आज लोहरी का उत्सव मनाया, शाम को बाज़ार गये, शकरकंदी, मूँगफली तथा पेड़े आदि लाये। छत पर आग जलायी, लकड़ियाँ घर पर ही पड़ी थीं, नैनी ने काट दीं।ऐसा माना जाता है कि आज से ठंड घटने लगती है।पौष समाप्त होकर माघ शुरू हो जाता है। परसों मकर संक्रांति है, वे नन्हे और सोनू के साथ मनायेंगे।दीदी के यहाँ भी अग्नि पूजन हुआ, उनके समधी लोग आ गये थे।उन्होंने छोटे भांजे से बात करवायी, उसने बताया दो महीने बाद उसकी विदेशी पत्नी भी भारत आयेगी।छोटी बहन के यहाँ लोहड़ी के साथ बहनोई के जन्मदिन का उत्सव चल रहा है। नवनीत की अनेक कहानियों में से पहली कहानी पढ़नी शुरू की है।


आज दृश्यम-२ देखी, अच्छी फ़िल्म है, सुना है दृश्यम-३ भी आएगी। मकर संक्रांति पर एक रचना का सृजन किया। धूप में बैठकर थोड़ी देर ‘इंटिमेसी’ पढ़ी, ओशो की बातें सीधे दिल पर असर करती हैं। आज एक माली उनका बगीचा देखने आया था, उसने गिनकर बताया, कुल तिरसठ पौधे लगाएगा।छोटे भाई ने आज पोरबंदर से समुद्र का दृश्य दिखाया, अब वह ओशोधाम में है।कल असमिया पड़ोसी के यहाँ बीहू का जलपान करने जाना है। 


सुबह तापमान १७ डिग्री था। माली समय पर आ गया था।उसके जाने के बाद मकर संक्रांति के भोज के लिए एक विशेष सब्ज़ी बनायी। नन्हा और सोनू नौ बजे आ गये थे, उन्होंने चाय पी और वे सब पड़ोसी के यहाँ गये। जिन्होंने बड़े प्रेम से नाश्ता कराया, दही, चिवड़ा, गुड़, क्रीम,  नारियल व तिल के लड्डू व पीठा, नमकीन आदि। वहाँ से वे बैंगलुरु का प्रसिद्ध ‘बैनयान ट्री’ अर्थात अति प्राचीन व विशाल बरगद का वृक्ष देखने गये। जिसे कन्नड़ भाषा में ‘डोड्डा अलाडा मारा’ कहते हैं। यह वृक्ष चार सौ साल पुराना है और तीन एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। इसका मुख्य तना नष्ट हो गया है, यह हज़ारों जटाओं कि सहारे टिका है। परिसर में पर्यटकों के लिए बेंचें हैं, अनेक बंदर वहाँ विचर रहे थे, जो किसी को नुक़सान नहीं पहुँचा रहे थे।  


वे घर लौटे तो सबने हरे चने का ‘बचका’, संक्रांति की विशेष आलू-गोभी की सब्ज़ी, जैसी जून बचपन से अपने घर में बनते देखा करते थे, और दही-चावल लंच में ग्रहण किए।उसके बाद मनायी पतंग उड़ाने की रस्म, नन्हे ने ड्रोन भी उड़ाया, रिमोट से चलने वाली कार चलायी, वापस आकर टेलिस्कोप से दूर के नज़ारे देखे। हल्का सा धुँधलका होने पर अग्नि देवता का आवाहन किया, उसके बाद जिग्सा पजल की शुरुआत की। इस तरह पूरा दिन ही कई गतिविधियों से भरा रहा। इसी बीच शाम को पापाजी से फ़ोन पर चर्चा भी की। 


आज सुबह नींद कुछ देर से खुली, शायद कल का असर था। प्रातः भ्रमण भी कम हुआ और आसन भी, शायद उम्र का तक़ाज़ा है या प्रमाद। ख़ैर, अब करके कुछ पाने का जज़्बा तो रहा नहीं, इसलिए जब जो होता है, उसे स्वीकार करके मन अपने आप में स्थित रहता है। उनका विरोध और उनकी चाह दोनों ही ऊर्जा को खोने का कारण हैं। अब न कुछ पाना है, न कुछ छोड़ना है ! इस अनंत जगत में कोई क्या तो पा सकता है और क्या छोड़ सकता है ?आत्मा को न कुछ चाहिए और न कुछ करना है, वह अपने आप में तृप्त है। जो भी चाहिए वह शरीर के लिए और जगत के लिए। आज एक नयी झील देखी, वदेराहल्ली नाम है उसका, सूर्यास्त के समय वे वहाँ गये थे, झील विशाल और सुंदर है, पर आसपास सफाई नहीं है, उसे देखभाल की ज़रूरत है। आज मिट्टी के दूसरे पात्र को भी रंग दिया, ‘नेटिव विलेज’ की एक स्मृति के रूप में ये उनके पास रहेंगे। 


जहाँ शांति है, वहाँ शब्द नहीं हैं। जहाँ शब्द हैं, वहाँ शांति हो सकती है और नहीं भी, यह उनके ऊपर है, पर अब उसे शांति के लिए बस एक हल्का सा स्मरण दिलाना पड़ता है मन को, इतना हल्का कि पलक झपकने से भी कम समय लगता है उसमें! आज भी दिन भर मौसम ठंडा रहा। आज सफ़ाई का काम पूरा हो गया, छत, गैराज, सिटआउट सभी जगह। जून ने आज घर बैठे ही बिगबास्केट से सब्ज़ियाँ व राशन मँगवा लिया। नन्हे का फ़ोन आया, कल उन्हें रजिस्ट्रार के दफ़्तर जाना है, मकान का लोन ख़त्म होने के बाद कुछ कार्यवाही होनी शेष है। 


Thursday, August 24, 2017

परशुराम कुंड की यात्रा


अभी तक जून को नये वर्ष की डायरी नहीं मिली है, वह पुराने साल की डायरी के पीछे के नोट्स के पन्नों पर लिख रही है. मौसम ठंडा है, जनवरी के महीने में बादल छाये हैं नभ पर. कल क्लब का वार्षिकोत्सव था, वे गये थे दोपहर के लंच में. हर साल की तरह शाकाहारी टेबल पर उसकी ड्यूटी भी थी. भोज आरम्भ हुआ ही था कि वर्षा आरम्भ हो गयी, फिर सुरक्षित स्थान पर सब कुछ ले जाना पड़ा. चार बजे घर लौटे. शाम को प्रेस गयी, उसके लेख के साथ पुराना फोटो दिया गया था, उसने बदलवा दिया, यानि अब भी निज लाभ ही दृष्टि में है. यह कितना स्वाभाविक है न, ‘सहज रहो’ यही तो साधना का लक्ष्य है. कल जून ने दो-तीन समूह बना दिए हैं व्हाट्सएप पर, सामाजिक आदान-प्रदान का कितना अच्छा साधन है यह “व्हाट्सएप”.

पिछला सप्ताह व्यस्तताओं से घिरा था. आज ‘मकर संक्रांति’ है, अगले दो दिन जून का दफ्तर बंद है. लेडीज क्लब का कार्यक्रम अच्छी तरह सम्पन्न हो गया. उस दिन दोपहर को जैसे किसी ने उसे कहा, क्लब जाना चाहिए, जहाँ कई सदस्याएं काम में व्यस्त थीं, लगा जैसे वे उसका इंतजार ही कर रही थीं. वे रात्रि को एक बजे वापस आये. अगले दिन विवाह की वर्षगांठ थी, शाम को बाहर खुले में अग्नि जलाकर दो मित्र परिवारों के साथ यह दिन मनाया. उसके अगले दिन तबियत नासाज थी, शायद ठंड लग गयी थी. दो दिन विश्राम किया, अगले दिन वे अरुणाचल प्रदेश स्थित ‘परशुराम कुंड’ नामक एक तीर्थस्थल देखने गये, यह यात्रा एक सुखद स्मृति बनकर उनके अंतर में अंकित हो गयी है. वापसी में एक रात सर्किट हाउस में रुककर घर लौटे, जिसके अगले दिन क्लब में उन सभी सदस्याओं के लिए आभार प्रदर्शन के लिए भोज का आयोजन किया गया था, जिन्होंने कार्यक्रम में किसी न किसी तरह का काम किया था. उसके बाद मृणाल ज्योति में ‘बीहू’ मनाया गया और आज फिर जून ने बाहर लोहड़ी की आग जलाने का प्रबंध किया है.

आज बीहू का प्रथम अवकाश बीत गया. सुबह दही+गुड़+चिवड़ा का नाश्ता किया, जून ने ब्रोकोली की विशेष सब्जी भी बनाई थी. दोपहर को लॉन में धूप में बैठकर देर तक किताबें पढ़ीं, तथा मोबाईल से कई तस्वीरें व वीडियोज हटा दिए, ज्यादा कुछ संग्रह करके रखना अब नहीं भाता, मन भी खाली रहे और फोन भी. शाम होने  से कुछ पहले बैडमिंटन खेला फिर एक मित्र परिवार से मिलने गये. आज डिनर में मटर की भरवा तंदूरी रोटी बनानी है. सप्ताहांत में पहले दिन राजगढ़ जाना है और इतवार को पिकनिक. निकट स्थित एक इलाके ‘राजगढ़’ में मृणाल ज्योति की एक शाखा खुल रही है. इस इलाके में दिव्यांगों के लिए कोई स्कूल नहीं है, सर्वे करने पर पता चला, लगभग पचास बच्चे आस-पास के गांवों में हैं जिन्हें कोई शिक्षा या इलाज नहीं मिला है. कल वे लोग जायेंगे, राजगढ़ के पुलिस अधिकारी व आर्मी के मेजर को भी बुलाया है. अगले महीने कोलकाता जाना है, जून की ट्रेनिंग है पूरे दस दिन की, सो ‘विपासना कोर्स’ करने का उसका बहुत दिनों का स्वप्न पूरा हो जायेगा.


दूसरा अवकाश भी बीत गया. सुबह की साधना अब सहज ही होती है, परमात्मा ही करा रहा हो जैसे. आज एकादशी है, कुट्टू की रोटी व सागू की खिचड़ी खाने का दिन. नन्हा आज पिलानी में है, कल रांची में था, उसे अपनी कम्पनी के लिए नये लोग चाहिए. कैम्पस इंटरव्यू के लिए गया है. 

Tuesday, April 25, 2017

कुम्भ का मेला


कल नहीं लिखा, सुबह स्कूल गयी, दोपहर को नेट और ट्यूशन, शाम को भ्रमण और सत्संग, फिर बालिका वधू और समाचार, दिन निकल गया. बीच-बीच में पिताजी से सम्मुख, जून और नन्हे से फोन से बातचीत. आज इस समय शाम के साढ़े सात बजे हैं, जून दोपहर बाद लौट आये हैं. सदा की तरह उसके लिए एक उपहार लाये हैं, सिल्क का सूट ..बहुत सुंदर है और बहुत महंगा भी ! नन्हे ने कहा, उन्हें किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, वह परिपक्व है, जल्दी हो गया है, हर आगे वाली पीढ़ी पहले से ज्यादा समझदार होती है. वह अपने जीवन पर नजर डालती है तो साफ लगता है, उसकी दृष्टि ही साफ नहीं थी, बुद्धि परिपक्व नहीं थी, परमात्मा ने उसे धीरे-धीरे अपनी ओर आकर्षित किया.
बाहर लॉन में झूले पर बैठकर गर्म जैकेट और कॉट्स वुल के वस्त्रों के बावजूद सुरमई शाम की ठन्डक को महसूस करते हुए लिखना एक अनोखा अनुभव है. सामने साईकस का विशाल पेड़ है, गमले में है पर पत्ते कितने बड़े हो गये हैं, जिनमें मकड़ी ने अपना घर बना लिया है. सुबह ओस के कारण श्वेत रुई से बना प्रतीत होता है. आकाश का रंग सलेटी है, बादल हैं या कोहरा, कुछ समझ में नहीं आता. लोहे के झूले का स्पर्श ठंडा लग रहा है पर गालों को छूती शीतलता भली लग रही है. अभी कुछ देर में वे सांध्य भ्रमण के लिए जायेंगे. सुबह ‘महादेव’ देखा, गणेश का चरित्र कितना अच्छा दिखाया है तभी वे प्रथम पूज्य हैं.
वर्षों पूर्व जो सफर आरम्भ हुआ था अनजाने ही, अब वह पूर्णता की और जाता प्रतीत होता है. हर सवाल का जवाब भीतर ही है, बाहर नहीं है, बाहर आते ही सब कुछ असत्य हो जाता है. पौने आठ बजे हैं, जून और पिताजी टीवी पर अपनी-अपनी पसंद के कार्यक्रम देख रहे हैं. उसे इस क्षण कुछ देखने की चाहत नहीं है. आज सुबह परमात्मा शब्दों के रूप में बरसा. महाकुम्भ पर लेख पूर्ण हो गया, भेज दिया है. परमात्मा परम प्रसाद है, रसपूर्ण है. सुबह के घने कोहरे के बाद अब धूप निकल आई है.
आज मकर संक्रांति है, सुबह से उत्सव का माहौल ! उन्होंने प्रातःराश में चिवड़ा, गुड़ व दही ग्रहण किया साथ में आलूगोभी की सब्जी. टीवी पर कुम्भ के मेले में लोगों द्वारा स्नान करने के चित्र देखे. भीतर से प्रेरणा उठी उन्हें भी एक बार कुम्भ जाना चाहिए. जून ने कहा यदि वे दिल्ली गये तो उसे ले जा सकते हैं. नाश्ते के बाद वह मृणाल ज्योति के बच्चों द्वारा बनाये नये वर्ष के कार्ड्स बांटने गयी. पहले एक उड़िया सखी के यहाँ, वह स्नान कर रही थी, पतिदेव आये, धोती पहने हुए पूजा के वस्त्रों में, फिर एक बिहारी सखी के यहाँ गयी, वह पूजा कर रही थी. उसके पतिदेव सिल्क का कुरता पहने हुए थे, तिल का लड्डू खिलाया. असमिया परिचिता के यहाँ तिल व मूंगफली का एक लड्डू मिला, उनके यहाँ भी बीहू का नाश्ता लॉन में सजा था. एक अन्य उड़िया परिचिता घंटी वाले मन्दिर के बाहर बैठे लोगों के लिए भोजन  ले जाने की तैयारी में लगी थी, उसका लॉन बहुत सुंदर था, कमल की कलियां भी थीं. उसके एक छात्र की माँ ने चावल की खीर परोसी, जो गुड़ डालकर बनाई थी. वह चने की दाल, पूरी व खीर का नाश्ता कई लोगों को करा चुकी थीं. उनके यहाँ तीन सर्वेंट परिवार हैं. सभी लोग इस दिन दान-पुन्य करते हैं. एक अन्य सखी के यहाँ भी कई बच्चे थे. वह अपने भाई के पुत्र को नहलाकर तैयार कर रही थी, वे लोग यात्रा पर जाने वाले थे. एक अन्य परिचिता ने अदरक व तेज पत्ता डालकर लाल चाय पिलाई. लोग कितने प्यार से मिलते हैं, स्वागत करते हैं, एक महिला घर पर नहीं मिलीं, उनके पतिदेव ने कहा, आइये आंटी जी, क्या वह इतनी बुजुर्ग लगने लगी है. एक अन्य परिचिता पूजा करके उठी थीं, उन्हें शाम को सत्संग में आने के लिए कहा. दो अन्य को संदेश भेजे हैं, दोनों क्लब गयी होंगी, आज के दिन क्लब में भी विशेष भोज होता है. जून दफ्तर गये हैं. कल शाम वे जून के बॉस के परिवार को पहली बार बुला रहे हैं, पहले बाहर आग जलाएंगे, फिर भीतर रात्रि भोज.

बीहू का अवकाश समाप्त हो गया. कल दोपहर वे नदी किनारे गये, पानी में लहरों के हिलने पर डूबते सूर्य का पतिबिम्ब अनोखी छटा प्रस्तुत कर रहा था. कल शाम का आयोजन अच्छा रहा. सुबह वह नर्सरी गयी थी. गेंदे, कैंडीटफ्ट व पिटुनिया के पौधे लाने. मार्च तक फूल आ जायेंगे उनमें.  

Friday, April 20, 2012

डाकिया डाक लाया


आज उसके नाम एक पत्र आया जिस पर पता जून के हाथ का लिखा हुआ था, एक पल को तो उसे लगा कि उसका ही पत्र होगा पर खोलकर मालूम हुआ कि लखनऊ से आया है, कोई फार्म मंगवाने के लिये स्वयं का पता लिखा लिफाफा उसी ने तो भेजा था. मकर संक्राति के कारण आज माँ ने उड़द दाल की खिचड़ी बनायी थी, और शाम को नूना ने सेंवई की खीर. देहरादून से बड़ी बहन का पत्र आया है. छोटे भाई के आने पर उसके साथ उसे एक बार वहाँ भी जाना है.
माँ के साथ रसोई की सफाई कर रही थी कि डाकिया वह खत लेकर आया जिसकी उसे प्रतीक्षा थी. शाम को भाई भी आ गया. पहाड़ी स्थान पर रहता है देर तक वहाँ की बातें बताता रहा. वह अपने साथ एक छोटा सा शेरू नामका पपी लाया है, बहुत सुंदर काला पहाड़ी कुत्ता है, उसे मेरठ में किसी के घर पहुंचाना है.