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Wednesday, June 17, 2015

श्रावणी पूर्णिमा


बाहर कौए बहुत शोर मचा रहे हैं. घर में सासू माँ कि तबियत ठीक नहीं है. रोज वह नहा-धोकर नाश्ता आदि करके टहलने निकल जाती हैं, आज अस्वस्थ होकर लेटी हैं. एक सखी ने कल रात को खाने पर बुलाया है, एक दूसरी सखी को वह बुलाना चाहती थी. तीसरी सखी ने शाम को सत्संग पर बुलाया है, पर अब सम्भवतः कुछ भी सम्भव नहीं हो पायेगा. ससुराल से फोन आया तो उन्होंने पिताजी को नहीं बताया, शरीर है तो सुख-दुःख लगा ही रहता है. उन्हें यहाँ आये पूरा एक वर्ष हो गया है. नन्हे को गये एक महीने से ऊपर, समय अपनी रफ्तार से चलता रहता है.

आज बहुत दिनों के बाद खुली आँखों से उसे दर्शन हुए. क्रिया के वक्त भी आज अतिरिक्त उत्साह था. जीवन जैसे एक मधुर स्वप्न के समान बीत रहा है. ईश्वर प्रेम स्वरूप है, सद्गुरु का यह वचन कितना सच्चा प्रतीत होता है. यह जगत अब बंधन रूप नहीं लगता. आज पूर्णिमा है, श्रावण की पूर्णिमा अर्थात रक्षाबन्धन का पावन दिवस ! उसने कान्हा को राखी बाधी, वही उसका रक्षक है और जगत के सभी प्राणियों का भी.

उसके दाहिने कान से मधुर ध्वनि सुनाई पड़ रही है, ऐसी ध्वनि जो भीतर से उपजती है, अनहद नाद. बहुत पहले, जब वह साधना नहीं करती थी, उसने एक लेख में लिखा था कि योगियों को अनहद नाद सुनाई देता है, शायद वह उसका पूर्वाभास था. सद्गुरु की क्रिया से ऐसे-ऐसे अनुभव हुए हैं जिन्हें शब्दों में बताना अत्यंत कठिन है. ऐसे परमात्मा, जो सुख स्वरूप है, को छोड़कर वे व्यर्थ ही अपना सुख संसार में खोजते हैं. आज उसने सुंदर ज्ञान सुना- वे पांच इन्द्रियों के गुलाम हैं, खाना, देखना, सुनना, सूँघना और स्पर्श करना इन कृत्यों को करते हुए वे मूलाधार चक्र में ही रहते हैं. अहम् का जब विकास होता है, तो परिवार आदि का पोषण करते हैं स्वाधिष्ठान चक्र में. स्वयं को मन का राजा मानकर मणिपुर में, अनहत तक आते-आते अहंकार बढ़ जाता है. विशुद्धि में देहाभिमान कुछ कम होता है, आज्ञा चक्र में वह पूरी तरह चला जाता है. सभी के साथ एकात्मकता का अनुभव होता है. तब जीवन में सच्चे प्रेम का उदय होता है, ऐसा प्रेम जो सभी का हित चाहता है, बिना शर्त है.      

Saturday, June 6, 2015

नागलीला का रहस्य


उसे लगता है प्रेम कितने रूपों में उनके सम्मुख आता है, कई बार उन्हें स्वयं भी ज्ञात नहीं होता कि किसी के प्रति इतना प्रेम अंतर में छिपा है, पर वह अपना मार्ग स्वयं ही ढूँढ़ लेता है. जिस क्षण कोई ऐसा विशुद्ध प्रेम पाता है, वह क्षण भी दैवीय होता है और वह क्षण  एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया की परिणति होता है. ईश्वर के प्रति प्रेम भी ऐसे धीरे-धीरे मन में एकत्र होता जाता है. ईश्वर से जो प्रेम उसे मिलता है वह उसे सहेजती जाती है अनजाने ही, फिर वही प्रेम कभी आँखों से बह निकलता है तो कभी कोई गीत बनकर. प्रेम कचोटता भी है सहलाता भी है यह उदात्त बनाता है. सद्गुरु इसी प्रेम को भक्ति का नाम देते हैं, प्रेम के लिए प्रेम ! एक अनवरत धारा जो प्रिय के प्रति मन में बहती है, चाहे वह उसे जने अथवा न जाने, इसकी परवाह किये बिना, पर प्रेम अपना मार्ग खोज ही लेता है !

उसका नाम अंतर को पवित्र करता है, उसे जप में कभी आलस्य नहीं होता, अच्छा लगता है और नाम सुमिरन के अतिरिक्त बात करना भी बोझ मालूम पड़ता है. सद्गुरु का सत्संग मिलता रहे तो वह चौबीस घंटे वहीं बैठी रहे, सचमुच अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले निराले होते हैं, जगत से उल्टा होता है उनका व्यवहार. वह सांसारिक बातों में दक्ष न भी हो पर अपने चिर सखा कान्हा के सम्मुख वह सत्य में स्थित होती है, ईश्वर के सम्मुख वह अपने पूर्ण होश हवास के साथ प्रस्तुत होती है और तभी तत्क्षण उसकी उपस्थिति का भास भी होता है, वह इतना प्रिय है, प्रियतर और प्रियतम है कि उसके सिवा सभी कुछ फीका लगता है. लेकिन यह जगत भी तो उसी का प्रतिबिंब है. आज सद्गुरु ने कहा कि लोग उन्हें अन्तर्यामी कहते हैं पर उन्हें अपनी चप्पल का भी पता नहीं है, ईश्वर ही उनक द्वारा अनेकों कार्य कराते हैं.

आज पुनः उपवास का दिन आया है, साधना का विशेष दिन, यूँ तो उसके लिए हर घड़ी, हर क्षण साधना का ही क्षण है. अनुभव् हुआ कि अपने कर्त्तव्यों में, भौतिक कार्यों में थोड़ी असावधानी बरती तो तुरंत मन स्वयं को फटकारने लगा, वह कौन है जो भीतर से सचेत करता है, सुबह जगाता है, जो एक प्यास जगाये रखता है, भीतर जो सुह्रद बैठा है, जो अकारण दयालु है, कोई उसके प्रेम का पात्र है या नहीं वह इसकी भी परवाह नहीं करता.

आज प्रतिपदा है, नवरात्रि का शुभारम्भ, कल पितरों को जल अर्पण करने का दिन था. भारतीय संस्कृति में मृतकों के प्रति सम्मान दिखने के लिए भी कितना आयोजन है, पर आज वे अपनी संस्कृति भूलते जा रहे हैं. आज सद्गुरु ने कितने सुंदर शब्दों में कृष्ण की नागलीला का वास्तविक अर्थ बताया, कालियानाग के फन विभिन्न वासनाओं के प्रतीक हैं जो सताते हैं, उनपर पैर रखकर कृष्ण जब नृत्य करते हैं अर्थात आत्मा जब वासनाओं पर विजय पा लेती है तो कालियानाग से मुक्त हो जाती है. आदिगुरू शंकराचार्य कृत ‘विवेक चूड़ामणि’ दीदी ने भेजी है, अद्भुत ग्रन्थ है. अनुपम है और महान है ! गुरू और शिष्य के बीच हुए अद्भुत संवाद के द्वारा वेदांत की शिक्षा प्रदान करने का अनूठा प्रयोग ! षट् सम्पत्ति से युक्त सदाचारी शिष्य ही ब्रह्म ज्ञान पाने का अधिकारी है. जीवन में शम, दम, नियम, सदाचार, अहिंसा आदि गुण हों तभी कोई प्रभु का ज्ञान पाने के योग्य है. अंतर में भक्ति और श्रद्धा भी अनिवार्य है.


Friday, August 8, 2014

कान्हा का जन्मदिन


“एहिक विद्या, योगविद्या और आत्मिक विद्या ये तीन प्रकार की विद्याएँ होती हैं. जिनमें से पहली विद्या आजीविका के लिए है, दूसरी मानसिक उन्नति के लिए, तीसरी पर ध्यान कम ही दिया जाता है. इसी का परिणाम है की छात्र जीवन समाप्त होते ही अधिक से अधिक आमदनी वाली नौकरी की तलाश शुरू हो जाती है”. आज बाबा जी बच्चों को सम्बोधित कर रहे थे. आज अपेक्षाकृत उसका सात्विक भाव जागृत है, कल की उहापोह से मुक्ति मिल गयी है, जैसे पौधा जल के बिना मुरझा जाता है वैसे ही इन्सान प्रेम के बिना सूख जाता है, धन-दौलत से भी ज्यादा जरूरी है प्रेम, अहैतुक एकान्तिक प्रेम ! ऐसा प्रेम जो दुराव नहीं करता, क्षमा करना जानता है और जो जीवन को जीवन बनाता है. जून आजकल व्यस्त हैं, कल शाम देर से घर आये बाद में वे एक मित्र के यहाँ गये, उनका घर भी एक अजीब सा मंजर लिए होता है, पर वे वहाँ बिना किसी लागलपेट के, बिना किसी संकोच के बातें करते हैं, हंसते हैं, पुरानी मित्रता है ऐसे ही असमिया सखी के यहाँ जाने पर होता है. आज सुबह छोटे भाई को जन्मदिन की शुभकामनायें दीं, माँ ने दवा लेना अपने आप बंद कर दिया था सो अस्वस्थ हो गयीं थीं, अब ठीक रही हैं पर उनसे बहुत कम देर बात हो पाई, पिता भी घूमने गये थे. उसने सोचा कल सुबह फिर फोन करेगी. कल जन्माष्टमी है उसने व्रत रखने का निश्चय किया है, कल का दिन कृष्ण को अर्पण, कृष्ण जो कितने नामों और रूपों में जग में आते रहे हैं. जिनकी वंशी की मोहक धुन ने सारे ब्रज को ही नहीं सारे विश्व को मोह लिया था, मोह लिया है और मोहती रहेगी. जो अर्जुन के सारथी भी हैं और गुरु भी, वही उसके जीवन के सारथी बन गये हैं.

आज जन्माष्टमी है. जून को आज अवकाश के दिन भी दफ्तर जाना पड़ा है. नन्हा घर पर ही है उसे उसका छोटा सा मन्दिर जिसे आज फूलों से सजाया है अच्छा लगा, वैसे तो कृष्ण उसके मन में हैं उसने उन्हें मानसिक पुष्पों को अर्पण किया है. गीता में सत्व, रज और तम से भी ऊपर उठने का पाठ पढ़ा, स्थितप्रज्ञ होने के वचन को दोहराया. सुख-दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ, ग्रीष्म-शीत आदि में सम भाव बनाये रखना है यह भी पुनः पढ़ा.

ईश्वरीय प्रसाद के रूप में वर्षा आज भी बरस रही है, बाहर शीतलता है और भीतर भी. कल दिन भर मन पर सद्विचारों का प्रभाव रहा पर रात को सोते समय कुछ ही पलों में मन कहाँ पहुंच गया. मन की शक्ति अपार है, आवश्यकता है इसका सदुपयोग करने की. काश जितनी तेजी से विचार पनपते हैं उतनी ही शीघ्रता से वे कहीं अंकित भी होते जाते, हजारों मन कागज खप जाता एक मन के विचारों को अंकित करने के लिए. कल रात छोटी ननद का फोन आया, वह नया मकान खरीद रही है, दशहरे में सम्भवतः गृहप्रवेश करेंगे. वे लोग इसी वर्ष उनके पास जायेंगे. उसके घर में माँ पिछले दिनों फिर अस्वस्थ हो गयी थीं. आजकल माँ-पिता दोनों मृत्यु के विषय में अवश्य सोचते होंगे, Tibetan book..पढकर वह भी सोचने लगी है. मरना जीने की शर्त है, उन सभी को एक न एक दिन तो मरना ही है, फिर क्यों न पहले से ही इसके लिए स्वयं को तैयार करें. यह बात जितनी अटपटी लगती है उतनी है नहीं, इन्सान हमेशा तो जिए चला नहीं जा सकता, कहीं न कहीं तो फुल स्टॉप लगाना ही होगा, किसी के जीवन में यह प्रक्रिया सहज भाव से होती है तथा किसी को बहुत दर्द व पीड़ा सहनी होती है. उसकी तो ईश्वर से प्रार्थना है कि मृत्यु लम्बी अस्वस्थता के बाद न हो, उतनी ही प्रिय हो जितना जीवन है. मृत्यु वैसे जीवन का अंत नहीं है पर यदि हो भी तब भी इसमें दुखी होने की क्या बात है, वे हों या न हों यह दुनिया तो वैसी ही रहेगी !