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Tuesday, January 15, 2013

हम दीवानों की क्या हस्ती



उल्फा लीडर भारत सरकार से बात करने के पक्ष में नहीं हैं, भगवान जाने असम का भविष्य क्या होगा. कल सूजी व नारियल के लड्डुओं के कारण वह कुछ ज्यादा नहीं लिख सकी, सो दिन भर बेचैनी सी रही, अजीब सी बेचैनी, जैसे हरारत हो गयी हो. दोपहर को जून अभी घर पर ही थे, वह सो गयी, नन्हे ने सब कुछ अपने आप किया, वह अब सचमुच बड़ा हो गया है, बहुत समझदार और बहुत प्यारी बातें करता है. अपने आप होमवर्क करके खाना खाकर सोने चला गया.
कल शाम जून एक फिल्म का कैसेट लाए थे, Hook  इंडिया टुडे में सुबह ही पढ़ा था उसके बारे में, कल्पना की उड़ान है पूरी फिल्म, अजीब-अजीब से दृश्य जादू लोक में ले जाते हैं. अभी पूरी नहीं देखी उन्होंने, नन्हे को बहुत अच्छी लग रही थी, पर सुबह स्कूल जाने से पहले बोला, उसे अंग्रेजी फिल्मों में या तो कॉमेडी अच्छी लगती है या जेम्स बॉण्ड की फिल्म. बच्चे पिता को अपना आदर्श मानते हैं, उसका अच्छा उदाहरण आजकल देखने को मिल रहा है, जून ने कुछ दिन पूर्व कहा कि वह हर सब्जी में आलू क्यों डालती है, उसे आलू अच्छे नहीं लगते, और दो दिन बाद नन्हा भी वही बात कह रहा है, जबकि आलू उसे बहुत पसंद थे. घर से पत्र आया है सासु माँ ने ननद के लिए तकिये के गिलाफ, टीवी कवर, और मेजपोश बनाने के लिए कहा है, कल वे तिनसुकिया जाकर कपड़ा लायेंगे, कल ही बाजार से  वह लक्ष्मी, उनकी नौकरानी के लिए ऊन लायी थी, पर पता नहीं उसे स्वेटर बनाना आता भी है या नहीं.

आज पूरा दिन व्यवस्तता में बीता. सुबह उसकी मित्र का फोन आया उनकी कार का छोटा सा एक्सीडेंट हो गया है, तिनसुकिया जाकर विंड स्क्रीन बदलवानी पड़ेगी. दोपहर के भोजन के बाद वे तिनसुकिया गए, लौट कर टीवी पर पहले बजट देखा, फिर शाम की फिल्म. डॉ मनमोहन सिंह ने कुशलता के साथ बजट पढ़ा बीच-बीच में हँसाते भी रहे, पीवी नरसिंहाराव को एक अच्छे वित्त मंत्री मिल गये हैं. उसने आज अपने केश भी कटवाए, जून को स्टाइल पसंद नहीं आया, चिढ़ाने लगे, कल फिर जाना होगा, टीवी देखते-देखते और दिन में जरा भी आराम न होने के कारण वह थकी हुई तो थी ही, उसे क्रोध  आ गया पर हमेशा की तरह उनका स्नेह, उनकी उदारता और मीठी-मीठी बातें..वह जल्दी ही हँसने लगी.
कल दोपहर उसकी असमिया सखी अपने बेटे को जो नन्हे का हमउम्र है, छोड़ गयी फिर शाम को वे लोग उसे लेने आये. दोनों बच्चों में बहुत दोस्ती है, मनोयोग से खेल खेलते हैं, कभी  कुछ योजनायें बनाते हैं. शाम को वे सब क्लब गए, टीटी खेला, पहले अभ्यास फिर दो गेम खेले.

आज भी आधा दिन टीवी के नाम, “चाणक्य” और विश्वकप श्रंखला में भारत और आस्ट्रेलिया के बीच मैच देखने में, भारत जीतते-जीतते... मात्र एक रन से हार गया. उसका मन उदासी से भर गया यह सोचकर कि पूरे भारत में कितने ही व्यक्ति जो मैच देख रहे होंगे बेहद उदास महसूस कर रहे होंगे. अब पाकिस्तान के साथ होगा अगला मैच उसे तो जीतना ही होगा. शाम को उन्हें पड़ोसी के बेटे के जन्मदिन की पार्टी में जाना था, वहाँ कई लोगो से मुलाकत हुई कुछ परिचित कुछ अपरिचित..रात को सोने की तैयारी करते-करते टीवी पर “मधुरिमा” देखा, भगवतीचरण वर्मा के गीत तो बहुत सुंदर थे पर छायांकन अच्छा नहीं लगा सिर्फ एक गीत छोड़कर...’वह एक छोटा सा विहग...अपनी उमंग में उमग’. ‘हम दीवानों की क्या हस्ती, मस्ती का आलम छोड़ चले’...भी बहुत अच्छा गीत है, बहुत पहले उनके स्वर्गवास पर धर्मयुग में पढा था उसने.
नन्हे का स्कूल शिवरात्रि के कारण बंद था, उसके साथ क्रिकेट खेला, पहले क्लब, फिर उसके मित्र के यहाँ ले गयी उसे. शाम को वे अपने एक परिचित परिवार में गए, शिवरात्रि का व्रत रखा था उन्होंने, छोटा सा आपरेशन होना है पेट का गृहणी का, वैसे तो जरा-जरा सी बात पर घबरा जाती है पर आज निर्भय लगी. घर आयी तो उसके पेट में हल्का दर्द हो रहा था, खाना बनाने का भी मन नहीं कर रहा था, खिचड़ी बना दी उसने जो नन्हे और जून दोनों को पसंद है. फिर चुपचाप बिस्तर में लेट कर ‘सरिता’ पढ़ती रही, सरिता के कुछ पुराने अंक पंजाबी दीदी ने दिए हैं.





Sunday, January 13, 2013

प्रोफेसर पूरण सिंह- पंजाब के शायर



वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा विश्वबैंक से बजट सम्बन्धी पत्राचार को लेकर आज लोकसभा में हंगामा हुआ. रेलवे बजट संतुलित है. टीवी पर पंजाब के कवि, दार्शनिक, चिंतक, शायर के बारे में प्रोग्राम आ रहा है..अमृता प्रीतम उनके बारे में कितनी अच्छी भाषा में बता रही हैं. ‘पूरन सिंह’ धरती के मानस पुत्र थे, उनकी कविता मजदूर चंगे ! कितनी मार्मिक है कितनी सच्ची, १९३१ में उनका देहांत हो गया. प्रोफेसर पूर्ण सिंह की और भी कितनी कवितायें होंगी.. ऐसे ही भारत की अन्य भाषाओँ के भी कितने ही कवि होंगे जो अनोखी बात सीधी-सादी भाषा में कह जाते हैं. पंजाब के कवि की यह नज्म भी कितनी अच्छी है-

उत्तर की हवाओं के चुम्मन पी पीकर ...ओ फाख्ता !

और.. तू हमें छोड़कर कौन सी राह पर चल दिया पंजाब ?
मैं तो एक गीत हूँ हवा में कांपता हुआ..

सुरजीत कुमार का छायांकन कितना सुंदर है..लाल, नीले, पीले, गुलाबी, सलेटी आकाश के ये चित्र और नीले, लाल पानी में पड़ती हुई सूरज की छाया......झील का काँपता हुआ पीला पानी और सलेटी पहाड़..सब कुछ आँखों को मुग्ध कर रहे हैं...और दिल में कैसी हूक सी उठती है आँखें नम होने को आतुर और सीने पर जैसे कोई भार सा है..कितना महान शायर था वह, जिसने उसे पहली बार में ही अपना प्रशंसक बना लिया है. उसने भी कुछ पंक्तियाँ लिखीं-

जैसा मन तूने मेरा बनाया है ओ खुदा !
वैसा उनका क्यों नहीं बनाया
जो छुरियाँ चलाते हैं दरख्तों के सीने पर
रूप बिगाड़ रहे हैं सलोनी धरती का
जो अमृत से पानियों में जहर घोलते हैं
ऊंचें पहाड़ों को बारूद से उड़ाते हैं
ये धरती, हवा, पानी, पहाड़ ही तो जीवन हैं..तेरा सच्चा रूप ओ खुदा !
फिर तू क्यों चुप है ?


कल वे क्लब गए थे पर सिर्फ आधे घंटे के लिए, जून ऑफिस से देर से आये थे और नन्हे ने टेबल्स में बहुत सी गलतियाँ की थीं. कल कोई खत नहीं आया, फोन भी नहीं मिला, शाम को जून ने कोशिश की थी.आज फिर कल की तरह मौसम खिला-खिला है, धूप अब तेज लगती है, बाहर देर तक बैठा नहीं जाता. आज उसने सूजी के लड्डू बनाये थे. कल रात उसने एक स्वप्न देखा-

कल रात स्वप्न में आकाश में उड़ता एक जहाज देखा
जिसमें पीछे-पीछे
आग की एक लपट भी थी
जाने वह जहाज की अपनी थी या
उसका पीछा कर रही थी
फिर आकाश की दसों दिशाओं में
रोशनियाँ प्रज्ज्वलित हो उठीं
युद्ध की दुन्दुभी बजने लगी
और पर कटे पंछी सा जहाज
धरती पर आ गिरा
वह उसके पास गयी
एक पुतला
झीने आवरण में लिपटा लेटा था
और पास ही एक छोटी बच्ची सिसक रही थी
रात्रि से सुबह, और सुबह से शाम हो गयी है और यह स्वप्न उसके पीछे-पीछे है, क्या स्वप्नों का कोई अर्थ होता है, यदि हाँ, तो क्या वह जहाज उसका तन था और बच्ची उसकी आत्मा ?