आज का इतवार भी काफ़ी अलग रहा, सोनू और नन्हे के साथ उसके तीन मित्र भी आये थे। उनमें से एक उबर में काम करता है, शेष दो उसी की कंपनी में। वे सब नन्हे के दफ़्तर में हो रही एक पूजा में भाग लेकर आये थे। लंच के बाद सब लोग निकट के एक गाँव में ख़ाली पड़े खेत व मैदान में गये, वहाँ ड्रोन उड़ाया, एक चील काफ़ी देर तक उसके साथ-साथ उड़ रही थी।दोपहर को एक हज़ार टुकड़ों वाली जिग्सा पज़ल आगे बढ़ायी। शाम के विशेष जलपान के बाद, रात होने से पूर्व वे सब चले गये।
आज घर की बाहरी दीवारों पर रंगाई का काम समाप्त हो गया। अब किचन के बाहर की लॉबी के ऊपर छज्जा लगाना शेष है। घर किराये का न हो तो उसमें कोई न कोई काम निकलता ही रहता है।सुबह उन्होंने फूलों के पेड़ों की तस्वीरें उतारीं, आजकल सोसाइटी में चेरी ब्लॉज़म के गुलाबी-श्वेत फूलों की बहार है। कल शाम की आँधी के बाद कुछ आम भी गिरे हुए थे। जिनसे मीठी व खट्टी दोनों तरह की चटनी बनायी। आज भी उसने देवी की कथा सुनी, असुरों का विनाश करने वाली देवी उनकी प्रार्थना सुनकर विकार रूपी असुरों को हराने के लिए शक्ति प्रदान करती हैं। आज एमआई का ट्रक पूरा बन गया, नन्हे ने कहा, उन्होंने बहुत जल्दी बना लिया।
आज आश्रम में सत्संग हुआ। गुरुजी ने कहा, पूजा में भाव सबसे ज़्यादा आवश्यक हैं। दुख साधक के मन को गहराई देता है, सुख मन को विस्तार देता है। लेकिन कोई कब तक सुख-दुख के फेर में पड़ा रहेगा, ज्ञान में वह सुख-दुख के परे चला जाता है। साधक को अपना कर्त्तव्य निभाना है और स्वयं को ठीक से अभिव्यक्त करना है। त्याग ही रिश्तों को दृढ़ बनाता है। अहंकार को इतना बड़ा बनाना है कि उसमें सब समा जायें।कुछ सीमा तक उन्हें अपने कर्मों को समाप्त करना है। ध्यान होश का दूसरा नाम है, ऐसा होश जो विश्राम दिलाता है। जैसे कार पहले रिज़र्व में आती है, फिर उसमें ईंधन भरते हैं। उन्हें कभी भी इस बात के लिए स्वयं को कम नहीं आंकना चाहिए कि उन्होंने कुछ बड़ा नहीं किया। पुण्यों का हिसाब नहीं रखना चाहिए। शुभ काम करना उनका स्वभाव ही है, यह कोई बड़ी बात नहीं है।कोई भक्ति करता है तो यह उसका स्वभाव ही है। यही अध्यात्म है, दो के परे जाना ही अध्यात्म है। गुरुवाणी का मनन करने से निदिध्यासन अपने आप हो जाता है।
आज सुबह भी वे टहलने गये, छत पर साधना करते समय हवा ठंडी थी और सूर्योदय का सुंदर दृश्य दिखाई दे रहा था। कई लोगों से फ़ोन पर बात की, कइयों को संदेश भेजे। दो को छोड़कर शेष सभी ने जवाब दिये। शाम को इस्कॉन मंदिर गये। बहुत विशाल और भव्य मंदिर है। आरती में सम्मिलित हुए, कृष्ण की उपस्थिति का अहसास भी हुआ। बहुत सुंदर व्यवस्था है वहाँ हर चीज की। वहाँ की ऊर्जा अति सकारात्मक थी। वापसी में उन्हें महामंत्र का जप करने के लिए भी कहा गया। प्रसाद भी मिला। नन्हे ने कहा है, हो सका तो वह शनिवार को आएगा, पापा को जीसी रोड ले जाएगा।
आज गुरुजी ने कितने सुंदर वचन कहे, धरती में बीज बोते हैं तो अन्न की फसल उगती है। आकाश में मंत्र के रूप में बीज बोते हैं तो ख़ुशी की फसल उगती है। जैसे धरा अन्न का, वैसे ही आकाश ख़ुशी का स्रोत है। कल से उनके बगीचे में लैंड स्केपिंग का कार्य शुरू होगा। आज एक नयी पुस्तक पढ़नी आरंभ की, जो हिंदू धर्म के प्रतीकों के अर्थ के बारे में है। पहला अध्याय पढ़ा, एक देवता व उनकी पत्नियों के नाम पहली बार पढ़ने को मिले। अर्धनारीश्वर व शिव के प्रतीक के बारे में पढ़ते-पढ़ते ही मन कैसा स्थिर हो गया था।नेट पर मिली एक कवयित्री के कहने से उसकी पुस्तक “मात्र मात्राओं का खेल है” मँगवायी है, उसकी समीक्षा लिखनी है।
आज रामनवमी का उत्सव है। सुबह प्रसाद बनाया। नापा का एकमात्र मंदिर सजाया गया है, सुबह वे गये थे। उठने से पूर्व कोई कह रहा था, मन को ख़ाली करो, कोई स्वप्न चल रहा था शायद उसके पूर्व ! अब स्वप्न याद नहीं रहते पहले की तरह, अब ज़्यादा नहीं आते। मन कृतज्ञता का अनुभव कर रहा था। परमात्मा की कृपा ही तो है जो वे इस सुंदर सृष्टि का आनंद ले रहे हैं। बल्कि वही उनके द्वारा ले रहा है। उसने उन्हें अपना साथी बनाया है, सहयोगी बनाया है। कल उन्हें व्हाइट फील्ड में स्वदेश दीपक का लिखा नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ देखने जाना है।
कल उन्होंने ‘कोर्ट मार्शल’ देखा।पात्रों का अभिनय शानदार था, कथा भी प्रभावशाली थी। भारतीय समाज में दलितों के प्रति जो असमानता व अन्याय सदियों से व्याप्त है, उस पर प्रहार किया गया है। भारतीय सेना की पृष्ठभूमि पर आधारित यह नाटक एक दलित सिपाही पर चल रहे कोर्ट मार्शल के इर्द-गिर्द घूमता है। उस पर अपने दो अधिकारियों की हत्या करने का आरोप है। जैसे -जैसे मुक़दमे की कार्यवाही आगे बढ़ती है, पता चलता है दलित सिपाही को किस प्रकार उन अधिकारियों द्वारा मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। उसे आश्चर्य होता है आज भी समाज में दलितों के प्रति बराबरी का व्यवहार नहीं किया जाता।आज का इतवार भी अनोखा था। वे पहली बार फ़ोरम मॉल गये। कुछ ख़रीदारी की, कुछ जलपान किया। उससे पहले ख़ाली पड़े फ़्लैट और नर्सरी भी गये, जहाँ उनके गमलों में पौधे लगाये जा रहे थे। शायद चार दिनों में कार्य पूरा हो जाएगा। नर्सरी के मालिक से भी बात हुई, उसे पौधों को समय-समय पर दी जाने वाली खाद, दवा आदि का बहुत ज्ञान है।वह बाग़वानी के नये-नये प्रोजेक्ट्स लेता रहता है। उसने बताया गर्मी के मौसम में पौधों को एक दिन छोड़कर पानी डालना चाहिए। जिन पौधों की पत्तियाँ मोटी हैं, उन्हें दो दिन बाद पानी देना चाहिए। बोगनवेलिया का पेड़ जो उन्हें कटवाना पड़ा था, उसमें अभी तक एक भी हरी पत्ती नहीं आयी है।
आज का दिन भी ख़राम-ख़रामा बीत गया। कल रात देर तक वे दोनों बातें करते रहे। जून ने बताया बरसों पहले वह उसके बनारस शहर से जाने के बाद बहुत दुखी हुए थे।परीक्षा परिणाम देने के बहाने एक दिन मिर्ज़ापुर मिलने आये थे।उसे जून को जानते हुए चार दशकों से ज़्यादा समय हो गया है, पर अभी भी लगता है, मन के किसी न किसी स्तर पर उनकी दुनियाएँ अलग-अलग हैं। एक साथ होते हुए भी हरेक का जीवन उसका निजी होता है। दुनिया में हर किसी का, राम व सीता का भी, शिव व पार्वती का भी ! परमात्मा मौलिक है, इसलिए वह हर किसी को बस उसके जैसा ही बनाता है।शाम को वे दूर तक टहलने गये, एक टर्की दिखा, अनोखा पक्षी है, सुंदर रूप है उसका! उसने पुस्तक की समीक्षा लिखनी शुरू की है, कुछ कविताएँ दिल को छू जाती हैं। जून के पूर्व सहकर्मी ने अपने पुत्र के पचासवें जन्मदिन पर एक कविता लिखने के लिए कहा है।एओएल का अनुवाद कार्य भी बीच-बीच में आता रहता है।
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