Saturday, December 8, 2018

मणिकर्णिका घाट



आज अचानक उसे चार वर्ष पहले बनारस में बिताये दिनों की याद हो आई है, कोई न कोई कारण अवश्य होगा इसके पीछे, हो सकता है इसलिए कि एक और यात्रा पर अगले माह उन्हें जाना था, वह शायद सम्भव नहीं हो पायेगी. वे कोलकाता तक फ्लाइट से गये थे और उसके आगे कालका मेल से. सुबह उठे तो बिहार आ गया था, खेतों में सुनहरी फसल खड़ी थी, कहीं कट रही थी, कहीं कटने के इंतजार में. मीलों तक फैले खेत कहीं खाली पड़े थे. खेतों में नर-नारी दोनों काम कर रहे थे. मुगलसराय स्टेशन पर उतरे तो एक टैक्सी वाला सामने आ गया, उसके पास अम्बेसडर थी, कहने लगा एक-दो वर्षों में ये कारें दिखनी बंद हो जाएँगी, अब पार्ट्स नहीं मिलते. अगले दिन वे गंगा घाट गये. होटल बिलकुल घाट पर था, मीर घाट पर जो अपेक्षाकृत साफ-सुथरा था. कमरे में सामान रखकर दशाश्वमेध घाट पर शीतला माता के मन्दिर गये, आस-पास बहुत गंदगी थी, पर लोगों की कतार लगी हुई थी. गंदगी से जैसे उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था. मणिकर्णिका घाट का दृश्य विचित्र था. दस-बारह शव जल रहे थे, जैसे ही एक शव जलता, चिता पर पानी डालकर उसे ठंडा कर दिया जाता व फूल चुनकर वे लोग गंगा में बहा देते थे. सीढ़ियों पर लोग बैठे थे जिनके प्रियजन जल रहे थे, पर कोई रोना-धोना नहीं था. माहौल उत्सव सा ही लग रहा था, मृत्यु का उत्सव ! लकड़ियों के ढेर लगे थे और तेज हवा में चिताएं धू-धू कर जल रही थीं. पुआल में एक अंगारा रखकर चिता जलाने के लिए लाया जाता था. देखते-देखते ही नई-नई लाशें चिता पर रखी जा रही थीं. यह कर्म चौबीस घंटे चलता रहता है. कहते हैं काशी में मरने वालों को मोक्ष मिल जाता है. गंगा की धारा हजारों वर्षों से यहाँ बह रही है, मृतकों को अपने आश्रय में लेती आ रही है, लोग इसे पावनी गंगा मानते हैं. कुछ देर बाद उन्होंने भी एक दूसरे घाट से गंगा पार जाकर इसकी धारा में स्नान किया. अपने अंदर के कल्मष को दूर करने में यह अवश्य ही सहायक होगा इस भावना के साथ. पानी पहले तो ठंडा लगा फिर देह अभ्यस्त हो गयी. गंगा के पावन जल का स्पर्श अत्यंत सुखद था, पैरों के नीचे लोगों द्वारा छोड़े गये वस्त्र छूने में आ रहे थे. सफाई की बहुत आवश्यकता है यहाँ, पर लोगों की भीड़ अनवरत आती रहती है की सफाई के लिए अलग से समय निकलना कठिन होता होगा. वापसी में उन्होंने आरती का भी आनंद लिया. आरती भव्य थी, अद्भुत क्षण थे वे, परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव हो रहा था. उसके बाद विश्वनाथ मंदिर भी गये थे वे, जहाँ पुलिस का सख्त इंतजाम था. देवी अन्नपूर्णा के दर्शन किये शनिदेव के और बड़े हनुमान के भी. विशालाक्षी मन्दिर तथा अन्य भी कई मन्दिर मार्ग में देखे. होटल लौटे तो चाँद आकाश में चमक रहा था और शीतल हवा बह रही थी. अगले दिन सुबह घाट पर ही होने वाले योगाभ्यास में भाग लिया. उसके बाद घर लौटते समय वारही देवी के दर्शन किये. एक गली में था मन्दिर. मूर्ति दर्शन भी विचित्र था. ऊपर से एक चौकोर छिद्र में से झांककर देखने होता था, नीचे जिस कक्ष में मूर्ति थी वहाँ जाना सम्भव नहीं था. बनारस की हर गली में कोई न कोई छोटा बड़ा मन्दिर है, अद्भुत नगरी है यह. कुछ देर एक चबूतरे पर बैठकर गंगा की लहरों से आती ठंडक तथा सूर्य की नव रश्मियों का स्पर्श करते हुए ध्यान भी किया. शाम को नगर में स्थित आयुर्वैदिक केंद्र में पहली बार शिरोधारा का अनुभव लिया. पडोस के घर में विवाह था, उसमें भी सम्मिलित हुए थे. बनारस से वे वापस कोलकता आये थे और बंगाली सखी की बिटिया के विवाह में सम्मिलित हुए थे.

रात्रि भोजन हो चुका है. नन्हा अभी तक नहीं आया है, शायद मार्ग में हो, लगभग बारह घंटे की उसकी ड्यूटी है. अपने काम के अलावा आजकल उसका कोई दूसरा शौक नहीं रह गया है. शाम को वे टहलने गये. दुकान से इडली के लिए सूजी खरीदी. आज अपेक्षाकृत ठंड ज्यादा है. सुबह छह बजे से थोड़ा पहले उठे. फूलवाली ने तब तक अपनी दुकान नहीं लगाई थी, जब वह प्रातः भ्रमण के लिए गयी, न ही सूर्य देवता ने दर्शन दिए जब छत पर गयी. हर दिन अन्य दिनों से कितना भिन्न होता है. उनकी भावनाएं भी भिन्न हों तो क्या बड़ी बात है. मन बदलता है, आत्मा सदा एक सी रहती है, द्रष्टा है, साक्षी है. जून ने कहा वह बहुत धीरे-धीरे खाती है. उसने इस बात को गम्भीरता से ले लिया, पल भर के लिए ही सही अपनी मूल स्थिति से डिग गयी, पर आत्मा को मंजूर नहीं है. वह एक बार अपने सिंहासन पर बैठ गयी है तो उसे अपनी गद्दी से उतरना मंजूर कैसे होगा.


2 comments:

  1. उपासना स्थलों के निकट फैली गंदगी मन में जुगुप्सा जगा जाती है,और गंगाजी में कपड़े छोड़ना -स्नान करनेवालों को कैसा लगता होगा!ऐसे स्थान स्वच्छ मिलें तो तो पूज्य-भाव की निर्मलता बनी रहती है.

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    1. सही कह रही हैं आप, जो लोग ऐसे स्थानों पर गंदगी फ़ैलाने से भी नहीं चूकते उनकी भक्ति अधूरी ही रह जाती होगी शायद..स्वागत व आभार !

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