टैगोर की आत्मकथा
आज ही नूना को कत्थई रंग की यह डायरी मिली है।स्टेट बैंक के ब्रांच मैनेजर तथा एक मुख्य अधिकारी आये थे, उन्होंने जून को नयी डायरी तथा कैलेंडर दिये। सुबह सात बजे केक व उपहार लेकर नन्हा और सोनू भी आ गये। सभी के फ़ोन भी आये।आज वर्षों बाद गुरुजी के भक्तों के साथ गुरुपूजा का आयोजन किया। बहुत आनंद आया। गुरुजी आजकल अमेरिका में हैं, पर वह हर उस जगह हैं जहाँ लोग उन्हें याद करते हैं। ‘सौदमिनी’ सोसाइटी से एक वरिष्ठ शिक्षक आये थे, उनकी आवाज़ बहुत अच्छी है। उन्होंने पूजा करने के बाद अनेक सुंदर भजन गाये।जून ने प्रसाद में खिचड़ी, हलुआ तथा रायता बना दिया था। कुल मिलाकर उनके विवाह की सैंतीसवीं वर्षगाँठ बहुत अच्छी तरह से मनायी । छोटी बहन ने बताया, उनके यहाँ एओएल की संगीत की महफ़िल जमती है और फ़ॉलो अप भी होता है। जीवन एक उपहार है, गुरुजी की यह बात आज कितनी सत्य प्रतीत हो रही है। भीतर जो भी महसूस होता है, उसे कोई शब्दों में कह पाये तो काव्य का जन्म होता है। कविता पहले भीतर जन्मती है फिर बाहर प्रकटती है।नूना को एक कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर मिला।
आज सुबह वह उठी तो मन गुरुजी के लिए कृतज्ञता से भरा था, एक कविता सहज ही मूर्त हो गयी। शाम को एक बार फिर उसे अहसास हुआ, कितना समय मोबाइल पर चला जाता है, इसका उसे भान ही नहीं रहता।मोबाइल किनारे कर आज उसने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा पढ़ने के लिए उठायी है। टैगोर एक भक्त कवि थे। वे कलाकार, समाजसेवी, शिक्षाविद् और भी न जाने क्या-क्या थे, पर सबसे पहले वह अपने को कवि मानते हैं। कवि होने का अर्थ है चीजों के पार जाकर कुछ ऐसा देख लेना जो सामान्य लोग नहीं देख पाते।आर्यसमाज के स्वामी परमानंद जी का एक व्याख्यान भी सुना, वह भी बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातें समझाते हैं।
आज जून को जल्दी जाना था, उनकी कमेटी आज वृक्षारोपण कर रही है। बाद में नूना भी उसमें सम्मिलित हुई, उन्होंने हरसिंगार, अमलतास, प्लूमेरिया और भी कई तरह के फूलों के पेड़ लगाये।वहाँ एक सरदारनी से मुलाक़ात हुई, जो मैराथन दौड़ चुकी हैं। शाम को पापाजी से बात हुई, वह आजकल जे कृष्णामूर्ति की पुस्तक पढ़ रहे हैं।यह भी कहा, उन्हें संस्कृत पढ़ने में दिक्क्त होती है, क्योंकि कभी स्कूल में संस्कृत नहीं पढ़ी। नन्हा और सोनू असम गये हैं। कल वे लोग पासीघाट जाएँगे,जो सियांग नदी के किनारे बसा अरुणाचल प्रदेश का सबसे पुराना शहर है। नूना को वहाँ के हरे-भरे पहाड़, झूलते पुल और पहाड़ी नदियाँ याद आ गयीं, कुछ वर्ष पहले वे दो दिन के लिए वहाँ गये थे।
सुबह वे दोनों गुलकमाले झील पर गये।आकाश पर बादल थे, हल्का धुँधलका था। वातावरण बहुत शांत था। उन्होंने देखा, दूर पानी में तैरती एक गोल नाव पर टॉर्च की रोशनी हो रही है, शायद नाविक मछली पकड़ रहे थे। लगभग सात बजे सूर्यदेव के दर्शन हुए। पंछी भी आकाश में उड़ान भरने लगे। दो नावें और आ गयीं और झील के उस पार मछली ख़रीदारों की भीड़ बढ़ने लगी। वे घर लौटे तो माली आ चुका था, नूना के अगले ढाई घंटे बगीचे में काम करवाते बीते। तब तक जून ने नाश्ता बना दिया। बोगनवेलिया के फूल अपने शबाब पर हैं और गुलाब का एक पौधा भी। रात की रानी फूलों से एक बार फिर भर गई है। दोपहर को गुरुनानक देव पर एक फ़िल्म देखी, उन्होंने अपने जीवन में २५ हज़ार मील की यात्रा पैदल की थी। उनके दो शिष्य थे, पर फ़िल्म में मरदाना को ही दिखाया गया है। आज गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती है, उनके बारे में भी वे अधिक नहीं जानते।स्वामी रामकृष्ण और माँ शारदा के कुछ अनोखे वचन पढ़े, श्री श्री तथा ओशो के कुछ वाक्य भी। भगवद् गीता के चंद श्लोकों के साथ टैगोर की पुस्तक का एक पन्ना भी ! कितना अच्छा गद्य भी लिखते हैं वह, कविता उनकी श्वास-श्वास में बसी हुई थी। उनके लिखे ‘गोरा’ उपन्यास पर आधारित डी डी -१ का धारावाहिक देखना शुरू किया है मोबाइल पर। आज बहनोई के जन्मदिन पर शुभकामना के लिए एक कविता लिखी।अगले दो महीनों में वह एक रेस्तराँ खोलने जा रहे हैं।
आज सुबह का ध्यान गहरा था। बाद में पार्क-१ गयी, सफ़ाई चल रही थी। शाम को वे निकट के गाँव तक टहलने गये, भुट्टे और टमाटर के खेत देखे।इस बार मकर संक्रांति पर 'आजादी का अमृत महोत्सव' के अन्तर्गत आयुष मंत्रालय, ७५ लाख से अधिक लोगों के लिए सूर्य नमस्कार का वर्चुअल आयोजन करने वाला है। भारत का उनके लिए क्या अर्थ है, वे इसके लिए क्या कर रहे हैं और क्या कर सकते हैं ? इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए उसे गणतंत्र दिवस के लिए एक कविता लिखनी है। नापा की पहली इ-पत्रिका कल या परसों प्रकाशित होने के लिए तैयार है। जून ने भी काफ़ी काम किया है इसके लिए, उनका विचार अब साकार होने जा रहा है।

No comments:
Post a Comment