Tuesday, September 8, 2026

तुम्हारे बारे में


तुम्हारे बारे में

आज सुबह एक बार फिर वे दूर तक टहलने गये, एक घंटे से भी अधिक चले होंगे।भोर की स्वच्छ हवा में पंछियों की आवाज़ें और फूलों की सुगंध वातावरण में तैर रही थीं। दोपहर को उसने गणेशजी का चित्र पूर्ण किया और निर्णय लिया अब कुछ चित्र स्वयं भी बनाने चाहिए।एओएल के एक अनुवाद कार्य को छोड़कर कोई लेखन कार्य नहीं हुआ, पापाजी से बात हुई तो जून ने अख़बार में पढ़ी कुछ रोचक ख़बरें उन्हें बतायीं। सांध्य भ्रमण के लिए वे निर्माणाधीन सोसाइटी बोटेनिका गये तो इंद्रधनुष की सुंदर तस्वीरें उतारीं। घर से निकले थे तो वर्षा के आसार नहीं थे। सुबह से धूप खिली थी, पर चार कदम चलते ही बूँदाबाँदी शुरू हो गई। लौटकर छाता लिया फिर चंद कदम चले थे कि सूरज चमकने लगा। बूँदें  भी पड़ रही थीं, सोचा, ऐसे में ही तो इंद्रधनुष बनता है, वाक़ई एक पूर्ण इंद्रधनुष एक कोने में शुरू होकर अर्धवृत्त बनाता हुआ दूसरी तरफ़ समाप्त हो रहा था। 

आज का दिन शेष दिनों से काफ़ी अलग रहा। सुबह टहलने गई तो मनोमय कोष की साधना के बारे में सुंदर विचार सुने। वापस आकर साधना फिर साप्ताहिक सफ़ाई। दस बजे वे ओबीए के सदस्यों के लिए वरिष्ठ महिला द्वारा आयोजित प्रीतिभोज के लिए पड़ोसी दंपत्ति को साथ लेकर  उनके घर जाने के लिए निकले।दो परिवार वहाँ पहले पहुँच चुके थे। पाकशाला पहुँचे तो दोपहर के एक बजने वाले थे।सभी ने सूप, सिजलर व स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया। वापसी में एक परिवार उनके साथ आया, घर तथा यह सोसाइटी उन्हें अच्छी लगी। सुबह वाटर फ़िल्टर काम नहीं कर रहा था, शाम को वे वापस गये तो मकैनिक आया, उसने फ़िल्टर बदल दिये। सवा छह बजे वे एक नाटक देखने के लिए रवाना हुए। ‘श्री हरि खोड़े’ प्रेस्टीज के नये थियेटर में ‘सआदत हसन मंटो’ का एक नाटक ‘एक हाँ’ खेला जाने वाला था। इसमें शेखर सुमन ने मंटो की भूमिका निभायी है, उनका अभिनय कमाल का था। इसमें सुचित्रा कृष्णामूर्ति पत्रकार की भूमिका में थीं। नाटक में मंटो के जीवन के उतार-चढ़ाव, उनकी विचार प्रक्रिया को उनकी कुछ कहानियों द्वारा दर्शाया गया है। नन्हा व सोनू भी आये थे। नाटक के बाद सबने ‘आनंद’ में स्वादिष्ट उत्तर भारतीय भोजन ग्रहण किया। नन्हे ने कल शाम के लिए भी एक नाटक की टिकट बुक कर दी हैं। मानव कौल का नाटक है, जिसका ‘शक्कर के पाँच दाने’ पहले देखा था। 

आज सुबह नौ बजे वे नन्हे के घर जाने के लिए रवाना हुए। शाम को साढ़े छह बजे घर लौटे। एक अनुवाद कार्य किया। कल छोटी बहन का जन्मदिन है, एक पुरानी कविता को आज के परिप्रेक्ष्य में दुबारा लिखा। दिन में दोपहर बाद एक दूसरा हिन्दी नाटक देखा, ‘तुम्हारे बारे में’ मानव कौल द्वारा लिखित और निर्देशित भी।आधुनिक काल में स्त्री-पुरुषों के संबंधों पर आधारित है। सोनू को लेखक से मिलने का बहुत मन था, उसने मानव कौल के साथ तस्वीर भी खिंचवाई। 

अगले दिन तक नाटक का असर उसके मन पर था। जिसने कुछ लिखने को प्रेरित किया। जीवन अनेक-अनेक रूपों में उनके सम्मुख आता है। हर दिन कुछ न कुछ नया अनुभव दे जाता है। हर दिन समाज में कुछ न कुछ अच्छा या बुरा घट जाता है, जो अख़बार के पहले पन्ने की खबर बन जाता है। उनकी दृष्टि जहाँ जाकर ठहरती है, जीवन उनके लिये उसके द्वार खोल देता है। एक लेखक को मिलने-जुलने वाले लोगों में कई कहानियाँ नज़र आती हैं। एक वैद्य या चिकित्सक की नज़र लोगों में किसी न किसी तत्व की कमी भाँप लेती है। बच्चों को आइसक्रीम और चॉकलेट में आनंद मिल जाता है तो किसी भक्त को दूर से आती भजन की एक पंक्ति भी सुकून से भर जाती है। जब इतनी विचित्रता है यहाँ तो आश्चर्य होता है कि कैसे कुछ लोग जीवन से ऊब जाते हैं, बोर हो जाते हैं, या उदासी मिटाने के लिए नशे या ड्रग्स का सहारा लेने लगते हैं। जीवन इतना रसपूर्ण पहले से ही है और संगीत, साहित्य, नाटक तथा अन्य विभिन्न कलाएँ इसमें चार चाँद लगा देती हैं। वरिष्ठ साहित्यकार व कलाकार अपने में इतने सघन होते जाते हैं कि सारे जग का दर्द मिटाने की भावना उन्हें चैन से बैठने नहीं देती। उनका अपना स्वार्थ नहीं होता फिर भी कुछ लोग समाज के लिए दिन-रात प्रयत्न करते हैं। ऐसे ही लोगों के बल पर यह दुनिया और खूबसूरत बन जाती है। वे थके हारे लोगों के दर्द भी महसूस करते हैं और महिलाओं की पीड़ा को भी शब्द देते हैं। मानव कौल एक ऐसा ही नाम ही है, उनका लिखा व निर्देशित किया नाटक ‘तुम्हारे बारे में’ देखना एक सुखद अनुभव था। यह एक प्रायोगिक नाटक है, जिसमें हास्य और व्यंग्य भी है और असफल रिश्तों के पीछे छिपी हुई पीड़ा का दंश भी। छह पात्रों द्वारा अभिनीत किया यह नाटक समाज में आज के समय में स्त्री-पुरुष संबंधों में आते हुए बदलावों के बारे में बात करता है। यहाँ दिखाया गया है कि आज स्त्रियाँ रिश्तों में पहले की सी सुरक्षा व स्थिरता पाने के लिए घर में बँधना नहीं चाहतीं। वे स्वतंत्रता का अनुभव करने के लिए आकाश में उड़ना चाहती हैं; जबकि पुरुष पात्र पेंग्विन बनना चाहते हैं, अर्थात उनके पास पंख तो हों पर उनसे उड़ा न जा सके। नाटक में तीन महिला और तीन पुरुष पात्र हैं, एक जोड़ा सात वर्ष बाद मिला है और उन कारणों को ज्ञात करना चाहता है जिनकी वजह से वे अलग हुए थे। एक जोड़े की आमने-सामने यह पहली मुलाक़ात है, सोशल मीडिया पर वे मिल चुके हैं और तीसरा जोड़ा अलग होने की कगार पर आ चुका है। किसी कैफ़े में वे मिल रहे हैं और ठंडी व गरम काफ़ी को पसंद करने के प्रतीक से समय के साथ पात्रों में आये बदलावों को चिन्हित किया गया है। कैफ़े में पूरे फ़र्श पर कविताओं के पन्ने बिखरे हुए हैं, जिन्हें पढ़कर महिलाएँ उड़ने की कला सीखना चाहती हैं; शायद लेखक कहना चाहता है, बंधनों से भरे जीवन में कविता ही हमें मुक्ति का अहसास दे सकती है। बीच-बीच में टैगोर का एक मधुर गीत बजता है जो रिश्तों में आयी टूटन के इस दर्द को और गहराई देता है। एक दृश्य में दिखाया है कि मोबाइल का बढ़ता हुआ प्रयोग कैसे व्यक्ति को आत्म केंद्रित कर रहा है।कहीं न कहीं एक-दूसरे के प्रति एकनिष्ठता की कमी तथा उसके कारण पनपा अपराध बोध रिश्तों के बिखरने का मुख्य कारण है।


Wednesday, September 2, 2026

नटखट बकरी

नटखट बकरी

आज शाम वे दोनों पूरा डेढ़ घंटे तक कभी बातें करते, कभी मौन पेड़-पौधों को निहारते चलते रहे। ‘प्रकृति फार्म हाउस’ से होते हुए ‘थरालू स्टेट झील’ तक पहुँचे, कुछ पल वहाँ रुककर ‘थतगुप्पे झील’ पर रुके, जहां से ‘ट्यूज़डे फ़ार्म स्टे’ होते हुए घर पहुँचे। वापसी में सड़क पर बकरियों और भेड़ों का एक झुंड आगे-आगे जा रहा था। एक महिला उन्हें हाँक रही थी। एक छोटी बकरी बहुत नटखट थी, उसी को सँभालने में महिला का अधिक समय व श्रम लग रहा था। रास्ते में नन्हे से बात हुई, उन्हें आश्चर्य हो रहा था, कि वे लोग इतनी पैदल यात्रा कैसे कर सके। नूना ने कुछ तस्वीरें भी उतारीं। सुबह भी जून कार से दूर तक ले गये। दोनों तरफ़ घनी हरियाली और सुबह का सन्नाटा ! अधिकतर रास्ता बहुत अच्छा था, कहीं-कहीं सड़क टूट गई थी।

कल की लंबी पैदल यात्रा के कारण आज सुबह उठने में थोड़ी देर हुई, पर उसके बाद दिनचर्या नियमित हो गई।जब तक योग साधना आरंभ की, दिन शुरू हो गया था। स्कूल बसें आनी शुरू हो गयीं, इसलिए सिट आउट पर काफ़ी शोर आ रहा था, बहुत दिनों बाद योग कक्ष में ध्यान किया। शरीर से बाहर आकाश में ध्यान टिकाने से शरीर में कितना हल्कापन महसूस होता है। इसीलिए गुरुजी सदा सिर से एक फुट ऊपर ध्यान ले जाने को कहते हैं। देह और मन रेत और चीनी की तरह कभी मिल ही नहीं सकते। चेतना सदा पदार्थ से अलग है पर उसका अनुभव पदार्थ में जाकर ही हो सकता है। यदि पानी ही पानी हो तो पानी को अपनी खबर नहीं होगी, थोड़ी सी भूमि आ जाये तो जल स्वयं को भूमि से पृथक मानेगा और अपने पर भी नज़र जाएगी। उनका भी यही हाल है, वे जो नहीं हैं, जब वह देखते हैं तो ख़ुद पर भी नज़र जाती है। आज छोटी बहन से बात हुई। वह अब प्रसन्न है। उसका क्लिनिक खुल गया है और एओएल के शिक्षक का कार्य भी कर रही है। आज उसका ऑनलाइन इंट्रो है, शनिवार को दोपहर के भोजन के साथ इंट्रो है। छोटा भाई घर आया हुआ है, अगले महीने उसकी सेवा निवृत्ति हो जाएगी, पापाजी ने बताया। उसके बाद वह घर पर रहेगा तो उन्हें बहुत अच्छा लगेगा।अगले महीने वह लखनऊ जा रहा है, छोटी बिटिया की डाक्टरी की पढ़ाई समाप्त हो रही है, उसे घर लाना है। 

आज लिखने के लिए पर्याप्त समय है, पर नूना का पेन रीफ़िल बदलने के कारण ठीक नहीं चल रहा। शायद रीफ़िल छोटी है। जब तक चीजों की नाप ठीक न हो , जैसे चप्पलों या वस्त्रों की तो वे भी खलते हैं। आज ओबीए की एक वरिष्ठ सदस्या का फ़ोन आया, इस माह के अंत में वे उन्हें तथा दो अन्य परिवारों को दोपहर के भोजन के लिए ले जायेंगी। जून ओबीए के काम में उनकी बहुत सहायता करते हैं। जून ने उससे पूछा, उन्होंने ‘आदमी और इंसान’ फ़िल्म देखी है ? कुछ याद नहीं आया तो उसने कहा, इस फ़िल्म में अवश्य ही एक आदमी होगा और दूसरा इंसान, आदमी यदि इंसान नहीं बन पाया तो हैवान बन जाएगा। आज महर्षि अरविंद की ‘सावित्री’ पुस्तक के अंश की व्याख्या सुनी। वह अंग्रेज़ी में पढ़ रही है, पर उसकी भाषा अति क्लिष्ट है और भाव भी अति दुरूह। दोपहर को चैत्य सत्ता पर आलोक पांडे का प्रवचन सुना। चैत्य सत्ता को जागृत करना अध्यात्म में पहला कदम है, उसके बाद ही साधना का आरम्भ होता है। जैसे नरसी मेहता ने भी कहा है, आत्मज्ञान के बिना भक्ति अधूरी है। शाम को गुरुजी द्वारा निर्देशित चक्रों पर ध्यान किया, हवा इतनी तेज चलने लगी थी पर तब भी मन टिका हुआ था।उसने कहीं पढ़ा था, गुरुजी घंटों ध्यान में बैठे रहते थे।उन्होंने वर्षों पूर्व महर्षि महेश योगी के साथ रहते हुए दिल्ली में (नक़ली) पंडितों के क्रोध को शांत किया था। उनके अंदर समझौता कराने की कला पहले से ही थी। गुरुनानक की पुस्तक आगे बढ़ रही है, कैसे चौथे-पाँचवे गुरु के आते-आते सिख धर्म के रूप में परिवर्तित होता गया।नानक की यात्राओं का वर्णन लेखक ने बहुत सुंदर ढंग से किया है। आज सुबह कुछ देर पार्क आठ में प्राणायाम किया, हवा शीतल थी और वातावरण शांत, तब छह भी नहीं बजे थे। जून कैलाश मानसरोवर यात्रा के बारे में  एक वीडियो देख रहे हैं संभवत: वे भी कभी भविष्य में यह यात्रा कर सकते हैं। यह पर्वत पंद्रह हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित हैं, यात्रा अत्यंत कठिन है, पर हज़ारों लोग हर वर्ष यहाँ जाते हैं।  

आज सुबह चार बजे नन्हा अपने एक सहकर्मी के साथ चेन्नई गया है। उसका फ़ोन आया, तब काम ख़त्म करके होटल जा रहा था। उसे कल भी आज की तरह तीन-चार मीटिंग्स करनी हैं। अस्पतालों में जाकर उनके सीईओ से मिलना है, ताकि उन्हें प्रैक्टो के बारे में बता सके।उसने बताया, सोनू के माँ-पापा बांग्लादेश गये हुए हैं। नूना को रुद्र पूजा के बारे में एक लेख का अनुवाद करना है। सावन के महीने में हर सोमवार को आश्रम में रुद्र पूजा होती है। 

आज दिन भर बादली और वर्षा का साम्राज्य छाया रहा। हवा ठंडी हो गई है और तापमान २०-२१  डिग्री। आज मणिरत्नम द्वारा निर्देशित एक तमिल फ़िल्म ‘पोन्नियिन सेल्वन’ का पहला भाग देखना शुरू किया है। इसमें दसवीं शताब्दी के चोल वंश के राजाओं की कहानी दर्शायी गयी है। दोपहर को पेंटिंग का काम थोड़ा सा आगे बढ़ाया। सुबह का ध्यान गहरा था। सूक्ष्म शरीर को कितना स्पष्ट अनुभव किया। बिना कान के सुना, बिना वस्तु के वस्तु का होना महसूस किया। कितना विचित्र था सब कुछ। दिन भर मन एक विचित्र से आनंद में डूबा रहा। मानव देह के भीतर कितने महान रहस्य छिपे हैं। शाम को गुरु जी की आवाज़ में रुद्रम की व्याख्या सुनी। जून ने सुबह स्वादिष्ट पोहा तथा दोपहर को स्वादिष्ट कढ़ी बनायी। आजकला वह भी बहुत प्रसन्न रहते हैं। नन्हे का फ़ोन आज नहीं आया, कल सुबह वह वापसी की यात्रा पर निकलेगा। 

अभी कुछ देर पहले मन फिर अहंकार के बहकावे में आ गया। जब वे स्वयं को देह मानते हैं तभी तो अहंकार के शिकार होते हैं। यदि स्वयं को आत्मा ही मानें तो कैसा अपमान और कैसा सम्मान, ऐसा लगता है जैसे किसी बाह्य शक्ति ने विचारों को भ्रमित कर दिया हो। जहां केवल ज्ञान और प्रेम का वास होना चाहिए, वहाँ क्रोध, शिकायत, उलाहना और अलगाव का क्या काम? मन का स्वभाव ही ऐसा है, वह संस्कारों के वश होकर ही ऐसा करता है। पर यह तो तय है कि पल भर के लिए वाणी कठोर हो सकती है पर दिल जरा भी नहीं ! आज नन्हा चेन्नई से वापस आ गया, सीधा ऑफिस चला गया, जैसे जून किया करते थे। अभी-अभी यह ख़्याल मन में आया, कहीं यह वाद-विवाद किसी अन्य बात की तरफ़ इशारा तो नहीं कर रहा ? सुबह से ही मन में हल्की सी बेचैनी थी, जिसकी परिणति हुई। आश्चर्य होता है कि अब किसी बात का इतना असर होने का क्या कारण है? जबकि पहले इससे बड़ी बात को भी नज़रंदाज़ किया है। इसका कारण ईश्वर ही जानते हैं, अब उसके साथ जो भी होता है, उससे जो भी होता है, उसके पीछे एक वही कारण है। उसकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता, जब यह जीवन भी उसी का दिया है, तो हर पीड़ा और हर ख़ुशी भी उसी की दी हुई है। आज सुबह एक कविता लिखी थी, यदि उसे कविता कहा जा सकता है तो….