Wednesday, December 18, 2019

पीला अमलतास



जून आ गए हैं, दोपहर को योग अभ्यास करने के बाद बच्चे चित्र बना रहे थे, तभी वह आये. हमेशा की तरह फल व मेवे लाये हैं. कल शाम को जे कृष्णामूर्ति को सुना, उनके भीतर मन नाम की कोई स्थायी सत्ता नहीं है.  मन यानि सोचना, सोचना एक विचार है और सोचने वाला भी एक विचार है. वे शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा हैं जिसे कुछ भी छू नहीं सकता. भीतर स्थिरता बढ़ गयी है. उन्होंने एक और बात भी कही. वे इमेज बनाते हैं अपनी भी और सामने वाले की भी. उस इमेज के कारण ही वे सुखी-दुखी होते रहे हैं. ध्यान से चीजों को जैसी वे हैं वैसी ही देखने की क्षमता भी उन्हें मिलती है. ध्यान के क्षण पूरे जीवन पर फ़ैल जाएँ तभी उसकी सार्थकता है. आज सुबह अमलतास के फोटो उतारे। ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, फूलों से लदा पीला वृक्ष और सुंदर पक्षी दिखे, चलते हुए जीवन्त ! सेंटर में फॉलोअप है पर वह नहीं जा रही है, इतवार को एक सौ आठ बार सूर्य नमस्कार का आयोजन हो रहा है. उसे नहीं लगता उसमें वह भाग ले सकती है. कल शाम क्लब में बच्चों के हिंदी कविता पाठ में निर्णायक के रूप में उसे निमन्त्रित किया है, कल की शाम वहीं बीतेगी, नई कॉटन साड़ी पहनने का अवसर और बच्चों के मुख से हिंदी की कविताएं सुनने का ! बाहर कहने को कितना कम है, वैसे ही भीतर भी यदि कोई सजग रहे तो कितना कम है. कल रात स्वप्न में सासु माँ के पैर छुए और मस्तक से हाथ लगाया, दो बार किया यह और तत्क्षण यह स्मरण भी हो आया कि यह स्वप्न है, पुराने हिसाब-किताब को चुकतू करने के लिए. आज दोपहर एक साधु और उसका एक शिष्य आये, कहने लगे नादिया से आये हैं, मन्दिर के लिए धन एकत्र कर रहे थे. भजन गा गाकर लोगों को सुनाते हैं, उनका भजन सुना, अच्छा लगा, श्रद्धा पूर्वक दक्षिणा दी. आज से पूर्व कितने साधुओं को कुछ दिया, कभी नहीं दिया, उन सभी से क्षमा स्वरूप यह आज का कृत्य था, परमात्मा भीतर एक व्यवस्था को जन्म दे रहे हैं. 

कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह उठी तो गले में दर्द था, जीभ के अंत में दाहिनी तरफ एक उभार था. भ्रमण का पथ छोटा किया, नेति, गरारे आदि किये. स्कूल जाना था. वापसी में बंगाली सखी से मिलने गयी. उसने पिछले महीने हार्निया का ऑपरेशन करवाया है. पेट पर बेल्ट बाँधी हुई थी, तीन महीने इसी तरह रहना होगा. रोग इंसान को किस तरह विवश कर देता है. वहां से को ऑपरेटिव गयी, कुछ सामान बदलवाना था, उसके बाद अस्पताल जाना था, एक परिचिता की बेटी को देखने , जो बुखार के कारण वहाँ दो-तीन दिन से रह रही थी. शाम को क्लब में कविता प्रतियोगिता थी. आज नॉट आउट 102 है. दीदी से बात हुई, इस बार योग दिवस पर प्रधान मंत्री देहरादून जा रहे हैं. बिजली चली गयी तो वह बाहर बरामदे में आडवाणी जी की पुस्तक पढ़ने लगी, अटल जी का प्रसंग चल रहा है, आज सुना उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है. 

आज सुबह आचार्य प्रद्युम्न जी को सुना. विवेक चूड़ामणि सुनते-सुनते ही ध्यान लग गया. वे देह नहीं हैं, मन व बुद्धि भी नहीं हैं, भाव भी नहीं हैं, वे साक्षी चैतन्य हैं. जब यह अनुभव ध्रुव हो जाता है, यह स्मृति सदा ही बनी रहती है. जीवन में सुख-दुःख तो आने ही वाले हैं, क्योंकि देह की अपनी सीमा है, मन व् बुद्धि पूर्व संस्कारों के कारण अथवा पूर्व कर्मों के उदित होने पर सुख-दुःख का अनुभव करेंगे ही, किन्तु सदा ही जो ब्रह्मा भाव में रहता है, वह इनसे अछूता रह जाता है.  उनके भीतर अग्नि ही वाणी रूप से विद्यमान है. जून ने ड्राइविंग स्कूल में बात की है, आज दोपहर को जाना है. कल से सम्भवतः कक्षा होगी. पिछले वर्ष तैरना सीखा था, इस वर्ष ड्राइविंग सीखना अच्छा ही है. 

सुबह उठे तो वर्षा हो रही थी. साढ़े आठ बजे ड्राइविंग के पहले दिन के अभ्यास के लिए गयी, जरा भी डर नहीं लगा. धीरे-धीरे क्लच से पैर उठाते हुए गाड़ी बढ़ाना अच्छा लग रहा था. वे पांच किमी की गति से चल रहे थे. लगभग दो किमी तक होकर आये. ड्राइवर के पास भी गाड़ी का कंट्रोल है, एक अन्य छात्रा भी थी जो पीछे बैठ गयी थी. एक महीने के अभ्यास के बाद वह उनकी अपनी कार पर अभ्यास कर सकती है. कल सुबह साढ़े छह बजे जाना है, थ्योरी की पहली क्लास है. दोपहर को आर्ट ऑफ़ लिविंग के विश्व सांस्कृतिक उत्सव पर ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित की. बड़े भाई ने उन दिनों बहुत ख्याल रखा था. इस समय शाम के पांच बजे हैं, जून अभी आये नहीं हैं, शाम को उनकी एक सहकर्मी कुछ चर्चा के लिए आ रही है, रात्रि भोजन  भी उनके साथ करेगी. भोजन लगभग बन गया है. कुछ देर पहले एक बुजुर्ग परिचिता से फोन पर बात की, उन्होंने रोजा रखा है. कल ईद है, नन्हा सोनू के साथ उसके घर गया है. उसने ईद पर लिखी एक पुरानी कविता भी फेसबुक पर पोस्ट की है. 

Monday, December 9, 2019

मन की शांति



“दुःख, उदासी, शरीर में अस्थिरता, श्वास में कंपन आदि समाधि में अंतराय होते हैं. आध्यात्मिक दुःख यदि न हों तो अन्य दो प्रभावित नहीं कर सकते”. आज सुबह टीवी पर उपरोक्त वाक्य सुना. वैदिक चैनल पर डॉ सुमन विद्यार्थियों को ‘पतंजलि योग सूत्र’ पढ़ाते समय कह रही थीं. समाधि शब्द सुनते ही उसके भीतर कोई कमल खिल जाता है. सम्भवतः योग के हर साधक का यही लक्ष्य होता है, वह भाव समाधि का अनुभव कर चुकी है, निर्विकल्प समाधि का अनुभव इसी जन्म में होगा, ऐसा स्वप्न भी कितनी बार देखती है. परमात्मा की कृपा से ही यह सम्भव होगा. कल सुबह की तैयारी हो चुकी है, सामान काफी हो गया है इस बार. ग्यारह दिनों के लिए वे बाहर जा रहे हैं. चार रात्रियाँ कोलकाता में, सात भूटान में. तीन थिम्पू, दो-दो पुनाखा और पारो में। आज योग कक्ष का रेगुलेटर बदल गया है. पुराने में अंक स्पष्ट नहीं दिखते थे, पर इतने वर्षों से काम चला रहे थे वे. कई बार समस्या का हल कितना आसान होता है पर उन्हें समस्या के साथ रहने की आदत पड़ जाती है. जैसे मानव देह के रोग, कमजोरी आदि से परेशान रहता है, पर आत्मा की खोज नहीं करता. परेशानी के साथ जीने की आदत डाल लेता है. आज सुबह अकेले ही प्राणायाम किया, जून तैयारी में लगे थे. उन्हें साधना के लिए प्रेरित करने का अब मन नहीं होता, वह स्वयं के लिए निर्णय लेने में समर्थ हैं. वाणी का दोष स्पष्ट नजर आने लगा है, सो बोलने से पूर्व बोलने का तरीका भी स्पष्ट हो रहा है. परमात्मा कितना धैर्यपूर्वक उन्हें सिखाते हैं, वैसे वे खुद हैं ही कहाँ, वही तो है, वही खुद को संवार रहा है, उसी का एक अंश... जिसने स्वयं को उससे जुदा मान लिया था भ्रम वश ! 

अभी कुछ देर पहले ही यात्रा से वह घर लौटी है, जून घर नहीं आये, सीधा दफ्तर चले गए. उन्हें किसी मीटिंग में जाना था. नैनी ने सफाई का काम करवा  दिया है. सफाई कर्मचारी भी आ गया था और धोबी भी, घर कुछ ही घण्टों में व्यवस्थित हो गया है. सुबह की फ्लाइट से आने का कितना फायदा है. आज पूरे ग्यारह दिनों बाद यह डायरी खोली है. भूटान में हर दिन का यात्रा विवरण लिखा था, छोटी डायरी में. आज दोपहर से टाइप करने आरंभ करेगी. मृणाल ज्योति के लिए भी कुछ लिखना है. पिछले दिनों जे कृष्णामूर्ति की किताब पढ़ती रही. कोलकाता में कल काफी समय मिला. बहुत कुछ स्पष्ट होता जा रहा है. मन किस तरह स्वयं ही स्वयं का विरोध करता है, फिर स्वयं के जाल में फंस जाता है. मन यदि स्थिर हो तो भीतर कैसी शांति का अनुभव होता है. किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति जैसे ही मन कोई राय बनाता है उससे दूर हो जाता है. अब वह राय ही उसकी आँख पर पर्दा बन जाती है. जैसे गोयनका जी  कहते हैं, प्रतिक्रिया करने के बाद उनका मन प्रतिक्रिया से उत्पन्न संवेदना के प्रति प्रतिक्रिया करता है, मूल कारण तो पीछे छूट जाता है. मन जो भी विचार करता है वे  अतीत के अनुभवों पर आधारित होते हैं, यानि अतीत की लहरें वर्तमान के तट से टकराती हैं और भविष्य का जन्म होता है. शुद्ध वर्तमान को वे देख ही नहीं पाते. मन अपनी धारणाओं, मान्यताओं और विश्वासों के आधार पर एक मशीन की तरह काम करता है. ‘ऐसा होगा तो ऐसा करना है’, उसका अपना नियत एजेंडा है. 

आज चौथा दिन हैं उन्हें वापस लौटे, अभी भी मन भूटान की स्मृतियों से भरा है. जून ने जिस किताब का ऑर्डर वहाँ से किया था, वह आ गयी है. काफी मोटी पुस्तक है, भूटानी इतिहासकार की. उसे पढ़ना शुरू किया है, अभी यात्रा विवरण लिखना आरम्भ नहीं किया. आज सुबह स्वप्न में भगवान शिव की एक मूर्ति देखी। अंग स्पष्ट नहीं थे, पत्थर की आकृति से जान पड़ता था कि शिव हैं, फिर कुछ क्षण बाद श्वेत पत्थर की नन्दी की मूर्ति की झलक मिली. कल सुबह भी शिव-पार्वती दोनों की मूर्ति दिखी थी और बाद में भीतर शब्द प्रकट हुए थे दुर्गा,लक्ष्मी, सरस्वती.... भीतर कोई पुरानी स्मृति जाग उठी थी शायद ! आजकल भिन्न-भिन्न गंधों को महसूस करती है, ज्यादातर समय कोई मधुर गन्ध, कभी-कभी धुंए की गन्ध, पता नहीं यह कोई अनुभव है या रोग.. कुछ भी तो नहीं ज्ञात ! कल गुरूजी को सुना, उन्होंने बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातें बतायीं. एक लेखक को क्या और कैसे लिखना चाहिए, यह भी बताया. आज शाम को मीटिंग है, क्लब की एक सदस्या की बेटी का स्वागत समारोह, वह आईएएस में उत्तीर्ण हुई है. कुछ देर पूर्व छोटी बहन से बात हुई, वह खुश थी, परसों से उसे अपने भीतर शांति का अनुभव हो रहा है, ईश्वर उसे सदा इसी तरह प्रसन्न रखे ! उसके भीतर भी शांति का साम्राज्य है, जो अब खण्डित नहीं होता, होता भी है तो कुछ क्षणों के लिये. मन अपने पुराने स्वभाव में लौटना चाहता है, पर मन वास्तविक नहीं है, एक मिराज है ! एक इंद्रधनुष जैसा... मन का कहना नहीं मानना चाहिए अर्थात मन का भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि मन को कोई तवज्जो नहीं देनी चाहिए जब यह कुछ नासाज हो ! 

Friday, December 6, 2019

आडवाणी जी की किताब





दोपहर के तीन बजने वाले  हैं. आज मौसम गर्म है, इस मौसम का पहला गर्म दिन ! माया के अधीन होकर ही आज दीदी से फोन करते वक्त पूछ लिया कि  कविता पढ़ी या नहीं, जीजाजी ने अपने स्वभाव के अनुरूप कह दिया, वह अपनी तारीफ सुनने के लिए कविता लिखती है क्या  ? कोई प्रशंसा करे तो भीतर जिसे ख़ुशी होती है अहंकार ही तो है वह, और यही कर्म का बन्धन है. फोन पर या आमने-सामने भी, किसी से बात करते समय बहुत सजग रहना होगा, अलबत्ता तो बात उतनी ही करनी चाहिए जितनी जरूरी हो. सुबह लॉन में घास पर नंगे पैरों चली, अच्छा लगा. माली को बुलाकर कुछ काम बताये पर उसने गेट के बाहर झाड़ू लगाने के सिवाय कुछ भी नहीं किया, शायद उसे काम पर जाना था.  इसी हफ्ते उन्हें यात्रा पर निकलना है. स्कूल से आकर नन्हे व सोनू से बात की. सोनू ने रोजे का महत्व बताया. यह उपवास राजा और रंक को एक धरातल पर ले आता है. अनुशासन सिखाता है, संकल्प शक्ति को बढ़ाता है. पूरे तीस दिन उसे यह करना है, यदि किसी दिन छूट जाये तो अगले वर्ष से पहले पूरा कर लेना है. दोपहर को भोजन में उसने आलू परांठा खाया, जून के न रहने पर पूरा भोजन बनना तो बन्द हो जाता है, अक्सर वह तहरी बनाती है. आज भी पंचदशी पर व्याख्यान सुना, बहुत विस्तार से इसमें तत्वज्ञान समझाया गया है.

ग्यारह बजने वाले हैं, जून आज आने वाले हैं. स्पीकिंग ट्री के एक लेख में स्वयं के विषय में एक जानकारी मिली. कल फोन पर भी ध्यान दिलाया गया था कि सम्मान पाने की आकांक्षा यदि भीतर अभी तक है तो हृदय फूलों के साथ काँटों से भी युक्त है. अपनी चिंता पहले सताये और दूसरा बाद में रहे तो साधना फलित नहीं हुई. वर्षों पहले वाणी के दोष से पीड़ित थी तो स्वयं को समझ कितनी बार सुधारा था, अब ऐसे ही भावों को अंतिम बिंदु तक शुद्ध करना है, कर्म तभी शुद्ध होंगे. जब पूरा का पूरा परमात्मा गुरूजी ने पकड़ा दिया है तो कैसा भय और कैसी सुरक्षा .. अब तो अंतिम पड़ाव नजदीक है. सत्य वही है जो सदा एक सा है, बदलने वाला मन और बदलना वाला तन तो सत्य नहीं हो सकता, पर ये दोनों उसी के विस्तार हैं, एक चेतना ही विभिन्न नाम-रूपों में अभिव्यक्त हो रही है, उस एक पर दृष्टि हो तो सभी एक ही विस्तार प्रतीत होंगे. उस एक का अनुभव विचार से भी किया जा सकता है और समाधि में भी. उस पर टिके रहना ही एक कला है, चेतना निरन्तर गतिमय है, चैतन्य अटल है. चैतन्य में स्थित होकर इस जगत को देखना है. उनका लाभ उसी में है और यदि इसके लिए अन्य हानियाँ भी उठानी पड़ें तो कोई बात नहीं.

परसों भूटान की यात्रा पर निकलना है. आज उसके विषय में कुछ लेख पढ़े. आडवाणी जी की पुस्तक आगे पढ़ी. आजादी के समय लाखों लोग मारे गए और लाखों बेघर हुए. विश्व के इतिहास में ऐसी दर्दनाक घटना शायद ही कभी घटी हो. राम और बुद्ध के देश में गाँधी जी के अहिंसा के सन्देश के बावजूद इतना रक्तपात, सोचकर भी भय भी लगता है. बचपन में उसे एक स्वप्न बार-बार आता था कि एक कोने में घेर कर किसी व्यक्ति को भीड़ मार रही है. सँकरी गलियाँ और और सटे हुए मकानों से गुजर कर भागना भी कितनी ही बार देखा होगा. अब तो गुरूकृपा से जीवन ही एक स्वप्न लगता है, भीतर एक ऐसा ठिकाना मिल गया है, जहाँ कुछ भी नहीं घटता, जो बस है.. जो ज्ञाता है और द्रष्टा ! आज सुबह साक्षी भाव काफी देर तक बना रहा. इन्द्रियों को अपना काम करते हुए देखा, मन भी अपना करता है और बुद्धि भी. आहार के अनुसार तीनों गुण भी घटते-बढ़ते हैं, फिर देह में हल्का व भारीपन लगता है.

Tuesday, December 3, 2019

पंचदशी का ज्ञान



सुबह मौसम अच्छा था. स्कूल में एक छात्रा को योग कक्षा लेने को कहा, जब वह यहाँ नहीं रहेगी तो वह आराम से सिखा सकेगी. अभी-अभी छोटी बहन से बात की, पिछले एक महीने से वह बहुत व्यस्त थी. पहले उसकी बड़ी बिटिया आयी, जो विदेश में रहती है, वह व्यायाम करती है, फिट रहती है. एओल का एडवांस कोर्स भी उसने किया और डीएसएन भी करने वाली है. उसकी जीवन चर्या देखकर माँ खुश है, फिर उसकी ननद परिवार सहित आयी, उसके बाद छोटी बिटिया, जो कल लगभग तीन महीनों  के लिए इंटर्न बनकर दक्षिण अफ्रीका गयी है. कनाडा से केन्या के स्कूलों को पढ़ाया जाने वाला गणित उनके लिए कितना उपयोगी है, इस पर रिसर्च करेगी. आज सुबह पिताजी से बात की और छोटे भाई से भी, वह उन्हें एक बार फिर कम्प्यूटर पर वीडियो देखना सिखा रहा था. यू-ट्यूब पर अनुभवानन्द जी को डिब्रूगढ़ मेडिकल कालेज में बोलते सुना, रिकार्डिंग अच्छी नहीं हुई है, पर उनका वही अंदाज है. उन्होंने नब्बे किताबें लिखी हैं. बड़ी-बड़ी किताबें भी. उनकी बातें सुनकर मन झट प्रेरित हो जाता है, जैसे गुरूजी के वचन सुनकर मन शांत हो जाता है. सदगुरू जीवन को पंख देते हैं, वे सीमित दायरों से निकाल क्र एक बड़े फलक का दर्शन कराते हैं. उनका संकीर्ण मन पहले-पहल विरोध करता है, पर आकाश में उड़ना कौन नहीं चाहता. जून ने मुल्तानी मिट्टी मंगाई है, देह पर उसका लेप करने से पित्ती ठीक होती है.

कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह रविवार के विशेष कार्य, दोपहर को बच्चों के साथ गुरूजी का जन्मदिन मनाया. शाम को एओल सेंटर गए वे. कार्यक्रम अच्छा रहा. साढ़े आठ तक वापस लौटे. नैनी ने सुंदर बड़ी सी माला बनाकर दी थी. पहले भी वह बड़ी और छोटी माला बनाकर दे चुकी है. गुरूजी का जन्मदिन सारे विश्व में मनाया गया. बंगलूरू आश्रम में भी कई धर्मों के पुरोहित आए थे. सभी ने उन्हें बधाई दी. युगों-युगों में कोई ऐसी महान आत्मा धरती पर जन्म लेती है. इस समय रात्रि के आठ बजने को हैं. बाहर वर्षा हो रही है. आज सुबह इस मौसम में पहली बार वे टहलकर आते समय भीग गए. पहले हल्की सी बूंदा-बूंदी थी, फिर तेज वर्षा होने लगी. जून ने दौड़ना शुरू किया, वह भी भागने लगी, फिर बच्चों के स्कूल के शेड में आकर रुके वे. कुछ देर बाद वर्षा की गति कम हुई तो घर लौटे. नाश्ते में मकई का दलिया बनाया जी बैंगलोर से लाये थे, सोनू ने दिया था. दोपहर को सहजन की सब्जी बनायी, मोटे वालर सहजन, जो उस दिन बगीचे से तोड़े थे. इससे पहले वह बिलकुल कोमल लगभग गुलाबी सहजन ही खाते थे, मोटे बाँट देते थे, पर इनका अलग स्वाद है. इंसान को अपनी सीमाएं बढ़ाते रहना चाहिए, वे ऐसा कुछ हर दिन करें जो पहले कभी न किया हो. वे देह को ठीक करने के लिए हजार उपाय करते हैं पर आत्मा या मन को अपने सहारे या भगवान के सहारे छोड़ देते हैं. कल से शाम की योग कक्षा में  श्री श्री की पुस्तक का एक पृष्ठ पढ़ना आरम्भ किया है. उन्हें हर दिन एक नोटबुक में कुछ न कुछ लिखने को भी कहा है. एक साधिका ने अपना लिखा भजन गया, धुन भी  मनहर थी.

आज सुबह निकले तो आकाश नीला था, वर्षा काफी पहले होकर रुक चुकी थी. आज सफाई कर्मचारी फिर नहीं आया. नैनी ने घर की सफाई की, उसे कुछ मेहनताना देना ठीक रहेगा. दुबली-पतली है और तीन बच्चों को संभालने व घर का काम करने में दिन भर लगी रहती है. बारह बजने वाले हैं, जून अभी तक नहीं आये हैं. आज उसने गोभी वाले चावल बनाये हैं, जो कल शाम वे लाये थे. शिलांग की गोभी, मई के महीने में. दस दिनों बाद उन्हें भूटान की यात्रा पर निकलना है. आज प्रतियोगिता के लिए कहानी लिखना आरंभ किया है. यू ट्यूब पर ‘पंचदशी’ सुना, अच्छा लगा. इस ग्रन्थ का नाम पहली बार सुन रही है. भारत का प्राचीन साहित्य इतना विशाल है कि कोई सामान्य जन एक जन्म में इसे पढ़ ही नहीं सकता. दोपहर को मृणाल ज्योति जाना है. चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग है. विशेष बच्चों को होस्टल में रखकर स्कूल चलाना कोई आसान काम नहीं है. उन्हें साफ-सुथरा रहना सिखाना पड़ता है. उन्हें अपना काम खुद करना भी सिखाना पड़ता है. जो सहायक व अध्यापक वहाँ काम करते हैं, उनका वेतन भी अधिक नहीं है. कई समस्याओं पर चर्चा हो सकती है.

आज आडवाणी जी की लिखी किताब पढ़ी. बहुत रोचक है. उनके जीवन के साथ-साथ देश के इतिहास का भी ज्ञान हो रहा है. गुरूजी की पुस्तकें निकालकर योग साधिकाओं के सामने रखीं, पर किसी ने कोई पुस्तक नहीं ली, शायद उन्हें पढ़ने का शौक नहीं है. आजकल रमजान का महीना चल रहा है. पिताजी का फोन आया दोपहर को. जून ने व्हाट्सऐप का फैमिली ग्रुप कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया है. वह यह बात समझ गए कि बड़े-बड़े वीडियो और पोस्ट देखने का समय नहीं है किसी के पास, साथ ही मोबाइल में स्पेस भी नहीं बचता। समाचारों में सुना कर्नाटक में बीजेपी सरकार बना रही है, उन्हें ग्यारह विधायक मिल गए हैं अर्थात उन्होंने खरीदे हैं ! 

हरसिंगार के फूल


दोपहर के तीन बजे हैं. आज का दिन भी वर्षा से आरम्भ हुआ, प्रातः भ्रमण के बाद जैसे ही घर पहुँची, बूँदें पड़ने लगीं, पर दिन चढ़ते-चढ़ते धूप निकल आयी. आज धारावाहिक का अंतिम भाग भी देख लिया. बुद्ध के अनोखे जीवन की गाथा पढ़ -सुनकर कौन प्रभावित नहीं होगा. वे अपार आशावादी थे जबकि कुछ लोग उन्हें दुखवादी कहते हैं. वह मानव को उसके मूल स्वरूप का अनुभव करना चाहते थे. वह उन्हें मानसिक रोगों के चक्र से बाहर निकलना चाहते थे. बुद्ध कहते हैं हर दिन को कृतज्ञ होकर जिन चाहिए. कोई न कोई सत्कर्म करना चाहिए. परमात्मा ने जो ज्ञान, प्रेम और शक्ति मानव को दी है, उसका वितरण करना चाहिए. भीतर के आनंद को जो स्वयं में पा लेता है, वह अन्यों को भी उसे पाने का मार्ग बता सकता है. बुद्ध होने की क्षमता हरेक के भीतर है. सदमार्ग पर चलना ही धर्म का पालन करना है, जिसके द्वारा वह बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है. मन की बिखरी हुई शक्तियों को एक्टर करना ही संघ की शरण में जाना है. वे जब अपने केंद्र में स्थित होते हैं तो सारी शक्ति एक पुंज के रूप में प्राप्त होती है, जो किसी कार्य को सजगता पूर्वक करने के लिए अनिवार्य है. आज भी सदगुरू को सुना, कर्म व पुनर्जन्म पर उनकी व्याख्या अत्यंत मनोरम व सरल है. जग की प्रत्येक वस्तु में चार बातें होती हैं, धर्म, प्रेम, कर्म तथा ज्ञान. उनमें भी ये चार बातें हैं, प्रेम से वे घिरे हैं, वह उन्हें चारों ओर से स्पर्श कर रहा है, इसी प्रकार ज्ञान वह अविनाशी सत्ता है जो जानने की क्षमता है. जानना है. हर वस्तु अपने नियत धर्म के अनुसार कर्म करती है, जैसे अग्नि का धर्म है जलाना  और प्रकाश देना. उनके पूर्व कर्मों का फल उन्हें अब मिल रहा है और वर्तमान के कर्मों का फल भविष्य में मिलेगा. जून कल शाम को अपने गन्तव्य पर पहुँच गए. सोनू का फोन आया, बैंगलोर में एक स्टार्टअप कम्पनी छोटे-छोटे प्लॉट लोगों को सब्जी उगने के लिए दे रहे हैं, जिसमें हर महीने दो हजार रूपये देकर ऑर्गैनिक सब्ज़ियाँ उगाई जा सकती हैं. उनके माली ही काम करेंगे, बस अपनी पसंद बतानी है और यदि मन हो तो बीच-बीच में जाकर देख सकते हैं कुछ काम भी कर सकते हैं.  महिला क्लब की साहित्यिक प्रतियोगिता होने वाली है, पर सलाहकार होने के नाते क्या उसे उसमें भाग लेना चाहिए, शायद नहीं, शेष लोगों को भी मौका मिलना चाहिए. हिंदी में बेहद कम प्रतियोगी होते हैं, इसलिए हर बार उसे कहा ही जाता है.

सामने हरा-भरा बगीचा है. बोगेनविलिया के फूल शाखाओं पर शीतल हवा में झूम रहे हैं. कुछ देर पहले हवा चलने लगी थी जैसे आंधी आने वाली हो. उत्तर भारत में पिछले दिनों अंधी-तूफान में कारण कितनी हानि हुई. बुद्ध ऐसी आंधी-तूफान में छह वर्षों तक तप करते रहे. अद्भुत थी उनकी आत्मशक्ति ! राजा के पुत्र होकर सन्यासी की भांति बेघर होकर रहना और भिक्षा मांगकर गुजारा करना कितना कठिन रहा होगा. उनके आकर्षण से खिंचे कितने ही युवा उस कल में सन्यासी बन गए. हिंसा का जीवन त्याग दिया. भारत में सैनिकों के प्रति श्रद्धा घट गयी और कालांतर में इसका परिणाम हुआ विदेशी राजाओं का आक्रमण, लेकिन बुद्ध के काल में जो हिंसा व्यर्थ ही होती थी, वह रुक गयी. आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर पोस्ट प्रकाशित की. बुद्ध पूर्णिमा के दिन अंतिम पोस्ट की थी. उनके प्रति श्रद्धा तो थी पर वे इतने महान हैं, इसका अनुभव नहीं किया था. अद्भुत थी उनकी करुणा, उसका हजारवां अंश भी यदि उसमें आ जाये तो जीवन सफल हो जायेगा. ऐसा लगता है जैसे वह कुछ भी नहीं जानती. जीवन और यह सृष्टि अनंत रहस्यों से भरी है, इसे जाना नहीं जा सकता, कोई बुद्ध होकर ही, इसके साथ एक होकर ही इसको थोड़ा-बहुत जान सकता है. सामने गमले में लाल सुर्ख एक गुलाब खिला है, जिस पर उसका ध्यान बरबस चला जाता है. बुद्ध के निर्वाण के समय उन पर फूलों की वर्षा आरम्भ हो गयी थी, जिस वृक्ष के नीचे वे लेटे थे, उसके फूलों का मौसम भी नहीं था तब. वनस्पति में भी जीवन है, चेतना है, ज्ञान है. जिस वर्ष वे इस घर में रहने आये थे, उस पुराने घर में हरसिंगार ने असमय फूल उगाये थे. प्रातःकाल भ्रमण के लिए जाते समय निकलते ही एक काली तितली सम्मुख आ गयी थी. कल सुबह उसे आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर जाना है, वहां से किसी स्कूल में, गुरूजी के जन्मदिन पर सेवा कार्य के लिए. आज उनके लिए एक कविता लिखी. एक कविता आस्ट्रेलिया निवासी छोटी भांजी के लिए भी जिसका जन्मदिन भी इसी दिन पड़ता है. उसने बताया वहाँ ठंड पड़नी शुरू हो गयी है, जब भारत में ठिठुरती सर्दियां होती हैं, वहां तेज गर्मी होती है. जून ने उस स्थान की तस्वीरें भेजी हैं, जहाँ वह ठहरे हैं, बहुत सुंदर स्थान है. उन्होंने सुंदर फूलों के चित्र और एक मोर का चित्र भी भेजा है. अगली बार वह अवश्य जाना चाहेगी, पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है ! पिताजी से बात करे ऐसा मन हो रहा है, इस वर्ष उनसे मिलना होगा या नहीं, पता नहीं !

आज सुबह हल्की फुहार पड़ रही थी, वातावरण शांत था. सदगुरू को सुना,  चेतना में अपार शक्ति है. देह को स्वस्थ करने का सामर्थ्य भी है. यदि मन टिक हो तो चेतना अपना काम कर सकती है, वरना विचारों का विक्षेप उसे अभिव्यक्त होने से रोकता है. ध्यान मन को स्थिर रखने का, निर्मल रखने का उपाय ही तो है. सुबह वह आर्ट ऑफ़ लिविंग के अन्य सदस्यों के साथ एक स्कूल में गयी, बच्चों से बातें किन, उन्हें योग कराया, कुछ सामान वितरित किया, दो घण्टे वहां बिताकर वे वापस लौटे. जैन धर्म के बारे में कुछ जानकारी हासिल करने के लिए महावीर स्वामी पर एक फिल्म देखी. इस समय रात्रि के सवा नौ बजे हैं मन आज किसी अनोखे लोक में भ्रमण कर रहा है. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अहसास इतना सघन है कि लगता है उसे हाथ बढ़ाकर छुआ जा सकता है. भीतर एक मधुर सी झंकार जैसी आवाज सुनाई दे रही है, किसी पंछी की आवाज या चिड़िया की, जाने कहाँ से. शाम को एक घंटा ध्यान किया शायद उसी का परिणाम है, वैसे परम् कार्य-कारण से परे है, अकारण दयालु है ! शाम को नन्हे और जून से बात हुई, वे लोग इस स्थान पर गए थे, जहाँ नन्हे ने बारह क्यारियां किराए पर ली हैं, जहाँ से उन्हें ताज़ी सब्जियां मिला करेंगी. 

Saturday, November 30, 2019

मुक्ति बोध



आज सुबह तेज वर्षा हुई, उसी वर्षा में वे मृणाल ज्योति गए. बच्चों को योग कराया और क्लब की सदस्याओं द्वारा दिया सामान सौंपा. एक अध्यापिका ने कुछ पैसे मांगे थे, वे भी उसे दिए, वर्ष के अंत तक धीरे-धीरे करके लौटा देगी, ऐसा उसने कहा है. पिछले चार दिनों से मन बुद्ध के साथ है. वह बुद्ध के जीवन पर आधारित धारावाहिक देख रही है, जो बुद्ध पूर्णिमा के दिन देखना आरम्भ किया था. उस दिन उनके निर्वाण का दृश्य देखा था. उनके उपदेश हृदय को छू गए थे, फिर जन्म से लेकर उनके बुद्ध बनने तक का संघर्ष देखा. कितने महान थे वे, कितने करुणावान और कितने बड़े तपस्वी किन्तु देवदत्त उन्हें कभी समझ नहीं पाया. उन्हें मरवाने के कितने षड्यन्त्र किये उसने. यशोधरा का त्याग भी अनुपम है, उसने बुद्ध के हृदय को समझ था. स्वयं में स्थित होकर ही कोई सुखों-दुखों के पार जा सकता है. मानव के शुभ कर्म एक दिन मुक्ति पथ पर ले जाते हैं और दुष्कर्म बन्धन की ओर. जिसे बुद्ध निर्वाण कहते हैं उसे ही ऋषि मोक्ष कहते हैं, जहां पूर्ण शांति है, जहां जाकर मन खो जाता है. जो सारे द्वंद्वों से अतीत है. जून आज पाँच दिनों के लिए बाहर गए हैं. अभी कुछ देर बाद नैनी व उसके साथ की महिलाएं आएँगी योग कक्षा के लिए, शाम के योग सत्र को एक घन्टा पहले खिसका दिया है क्योंकि शाम को मीटिंग है, फ्रिज को कल रात से बन्द किया है, भीतर की सारी बर्फ पिघल जाएगी तब वह अपना काम करना शुरू कर देगा. मानव का मन भी कभी कभी नकारात्मकता के कारण जम जाता है, फिर उसे साधना के द्वारा पिघलाया जाता है, पहले सा खुशनुमा हो जाता है, प्रेम की ऊष्मा जो भीतर दबी हुई थी, फिर झलकने लगती है. उसके सर के दाहिने भाग में ज्यादा देर तक स्क्रीन देखने के कारण तनाव महसूस हो रहा है, विश्राम देने से वह ठीक हो जायेगा. पिछले कई दिनों से नियमित लेखन नहीं हुआ. अब समझ-बुझ कर, जागकर लिखना होगा. इस समय मौसम सुहाना है, भीतर एक सहजता का अनुभव हो रहा है, ध्यान के बाद की सहजता ! भीतर के उस अछूते केंद्र का पता उसे भी मिल गया है, वर्षों पूर्व उसकी झलक मिली थी, पर उसमें हर पल स्थित रहने के लिए सजगता बहुत जरूरी है. 

शाम के साढ़े चार बजे हैं. मन बुद्धमय हो गया है. उनकी मंजुल मूर्ति तथा सुंदर देशना भीतर तक छू जाती है. उनके उपदेश सरल हैं और अनुभव से उपजे हैं. वे सिद्धांत की बात नहीं कहते, व्यावहारिक ज्ञान देते हैं वे कहते हैं, सन्देह अति विकट शत्रु है, वह मानव को पतन की ले जाता है. ईर्ष्या, घृणा, क्रोध, अग्नि के समान जलाते हैं और अहिंसा व करुणा आनंद को उपजाते हैं. बुद्ध शीलाचरण की बात करते हैं, फिर ध्यान का मन्त्र सिखाते हैं, जिससे विवेक का जन्म होता है, तथा शील का पालन सहज ही होने लगता है. ध्यान की गहराई में जो ज्ञान मिलता है, वही सच्चा ज्ञान है जिसके प्राप्त होने के बाद शील का पालन प्रयास पूर्वक नहीं करना पड़ता, लेकिन आरम्भ में तो पुरुषार्थ करना होगा, सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा. शम, दम, तप, सन्तोष व ईश्वर प्राणिधान का पालन भी करना होगा. आज सुबह उठी तो एक स्वप्न चल रहा था, दुःस्वप्न ही कह सकते हैं अथवा तो पूर्व के किये अशुद्ध कर्मों का फल देने वाला स्वप्न ! बुआ जी को देखा, उनका मुख बिलकुल अलग था. उनकी पुत्री का विवाह हो रहा है. वह रसोईघर में है पर शौच का पालन नहीं किया. अतीत के कितने ही विकर्मों का स्मरण हो आया. वह जगी तो भीतर प्रार्थना चल रही थी. उनका अवचेतन मन नींद में भी सक्रिय रहता है. उठकर टहलने गयी, वर्षा के बाद सब कुछ साफ-सुथरा था, मौसम शीतल था. सद्गुरु को सुना जो कह रहे थे, यदि अपने घर वापस लौटना है तो पहले पूरी तरह थक जाओ, जैसे बुद्ध कहते हैं, अपने भीतर सुख के केंद्र को खोजना है तो जीवन में दुःख है इसे अनुभव करना होगा. भीतर जाकर पता चलता है, परम् आनंद व प्रेम का स्रोत भीतर ही है . आज भी बुद्ध के जीवन की गाथा देखी-सुनी. अब कुछ ही अंक रह गए हैं. मगध, कपिलवस्तु, कौशल आदि राज्यों में ही बुद्ध विहार करते थे, पर उनका धर्म पूरे विश्व में फ़ैल गया जैसे सदगुरू का सन्देश पूरे विश्व में अपनाया जा रहा है. इसी महीने उनका जन्मदिन है, उस दिन वे दोपहर को श्रमदान करेंगे  और शाम को गुरुपूजा में सम्मिलित होंगे. जून आज तमिलनाडु जा रहे हैं, वह जो पौधे ले गए थे, नन्हे ने गमलों में लगा दिए हैं. 

Friday, November 29, 2019

बुद्धं शरणं गच्छामि




कल का पन्ना कोरा ही रह गया है, स्वास्थ्य ठीक न हो तो उत्पादक क्षमता कितनी घट जाती है. डायरी में आज भी कल की तरह नासिका में विचित्र सी गंध आ रही है . कल दिन भर मन में अनुत्तरित प्रश्न चलते रहे, आज सुबह तक सन्देह का सा वातावरण था. कोई स्वास्थ्य संबन्धी समस्या है या कोई रहस्य है सृष्टि का. आज दोपहर कोर्स का अंतिम दिन था, सेंटर गयी, वहाँ का सकारात्मक वातावरण तथा टीचर के प्रेरणादायक वचन सुनकर मन पुनः आह्लाद से भर गया है. जो भी  है परमात्मा का प्रसाद है, आज से पूर्व किसी भी स्वास्थ्य संबंधित समस्या ने उसे परेशान नहीं किया, पर गंध आने पर भविष्य में कोई समस्या हो सकती है, इसी भय का असर था कि मन घबरा गया था. कल किसने देखा है, जो ‘है’ उसी पर ध्यान देना है. जो नहीं है उसे महत्व नहीं देना है. गुरु का ज्ञान भी उसी वक्त काम आता है जब वे शरणागत हो जाते हैं उनके हाथ में कुछ नहीं है, जो भी जब भी होगा उसका सामना वे करेंगे, यह भरोसा गुरु उन्हें देता है. गुरूजी कहते हैं, परमात्मा, आत्मा और गुरु में कोई भेद नहीं है. उसका जीवन किसी के काम आये तभी सार्थक होगा. जो काम वह भली प्रकार कर सकती है, उसी के द्वारा संसार के किसी काम आ सकती है. उसने सोचा कल स्कूल जाना है, एक नए सन्देश के साथ, फिर कैलेंडर पर नजर गयी, कल बुद्ध पूर्णिमा है. वह लिख रही थी कि ड्राइवर का फोन आया, उसे दस किलो अख़बार की रद्दी चाहिए, शाम को ले जायेगा. छोटे भाई ने आज छोटी बुआ से वीडियो कॉल पर बात करायी, उनका सुंदर घर भी देखा. कुछ वर्ष अस्वस्थ रहने के बाद अब वह पुनः ठीक हो रही हैं. 

नौ बजने वाले हैं आज बुद्ध पूर्णिमा है. भगवान बुद्ध  के जीवन पर आधारित एक धारावाहिक  भी है यू-ट्यूब पर, दो एपिसोड देखे. सभी भाग देखेगी एक एक कर ! ब्लॉग पर उनके बारे में दो पोस्ट्स लिखीं, उनका जीवन आज भी एक मिसाल है, अनोखी थी उनकी तपस्या और अद्धभुत था उनका ज्ञान.  आनन्द ने उनके उनकर वचनों को संग्रहित किया. काश्यप उनके प्रिय शिष्य थे. रात वे समय पर सोये सो सुबह भी सहजता से उठे. माली से कुछ काम करवाना था, बुलवाया पर उसके सर में पीड़ा थी, शायद ज्यादा नशा करने के कारण. योग कक्षा में आज बच्चों को आनंद पूर्वक बड़ा करने के कुछ उपाय बताये, जो उस किताब में पढ़े थे. नैनी को भी बताना है, वह अपने बेटे को बहुत डांटती है. विचित्र गन्ध विदा हो गयी, इस समय नासिका से भीनी-भीनी मधुर गन्ध आ रही है. परमात्मा की सृष्टि में सब कुछ कितना रहस्यमय है. आज दोपहर डॉक्टर के पास भी गयी थी, उसने एक फ्री एयर स्प्रे दिया है, दिन में एक ही बार डालना है. एक्स रे  भी किया. आज क्लब में ‘अक्टूबर’ फिल्म थी. जून गए थे. 

परसों वे शिवसागर गए थे, कल तीन कविताएं लिखीं, एक परसों के पन्ने पर है, आशा और विश्वास से भरे शब्द.. यदि पीड़ा न हो जीवन में तो सुख का सम्मान भला कौन करेगा. इन कविताओं को एक-एक कर ब्लॉग पर प्रकाशित करेगी, हो सकता है उसके शब्द किसी आकुल उर को शांति की एक छांव दे जाएँ. इस समय रात्रि के आठ बजे हैं अभी-अभी छोटे भाई का फोन आया. आज सुबह छह बजे उसे कोई उठाने आया था, किन्हीं हाथों ने उसे स्पर्श किया और थपकी देकर कहा भोई, उठो, उठो ! उसने आवाज भी स्पष्ट सुनी और वह सुबह से ही आश्चर्य विमुग्ध है. परमात्मा उनके आस-पास है, वह कभी उनसे दूर नहीं होता, वे ही अपनी व्यर्थ की उलझनों में उसे भुला बैठते हैं. टीवी पर तेनालीराम की चतुराई की कहानी आ रही है. 

Thursday, November 28, 2019

सिंधी कोकी




रात्रि  के आठ बजने वाले हैं, आज सुबह उठने में देर हुई. उठते ही पहले की तरह मन उत्साह व शक्ति से भरा नहीं था. नींद जैसे पूरी न हुई हो, या फिर नींद पूरी नहीं है यह भाव अथवा विचार.. उसने स्वयं ही नींद को मृत्यु की निशानी मानकर सम्मान देना बन्द कर दिया था. सोने से पूर्व ध्यान करके मन को इतना होश से भर लेती थी की नींद के लिए जरूरी तमस कहीं दूर चला जाता था, निद्रा भी आवश्यक है पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए, ध्यान के समय ध्यान करना है और नींद के समय नींद लेनी है. पिछले दिनों ध्यान के बाद कुछ सुनकर सोने का क्रम बना लिया था तो मन उस पर भी चिंतन करता ही रहता होगा. खैर .. अब भी कुछ देर नहीं हुई है, जब जागो तभी सवेरा ! दिन सामान्य रहा. मौसम आजकल बहुत सुहावना है. पंछियों का कलरव दिनभर गूँजता रहता है. गंधराज की सुगन्ध भी आती होगी पर उसकी सूंघने की क्षमता कुछ घट गयी है. कोई अन्य गन्ध ही उसे घेरे रहती है, कभी लगता है यह कोई रोग है  फिर लगता है नहीं इसका अध्यात्म से ही कोई संबंध है. परमात्मा उसके साथ है, उसे सब ज्ञात है. आजकल उसे अपनी अल्पज्ञता का बहुत भान होता है, लगता है उसे कुछ भी ज्ञात नहीं है, बिलकुल अज्ञानी जान पड़ती है स्वयं को. वैसे भी जब इतना विराट आयोजन चल रहा है, पंछी बिना पढ़ाये  ही अपने गीत बना लेते हैं, ऋतुएँ बदल जाती हैं तो उसमें उसका होना भी तो शामिल है. अस्तित्त्व को जो बनाना हुआ बनाएगा, करना हुआ कराएगा. शरीर प्रकृति का अंश है और आत्मा परमात्मा का, मन समाज का दिया हुआ है. ‘मैं’ एक  भ्रम ही है. इसी देह को तुष्ट करने के सारे प्रयास होते हैं . पर देह तो जड़ है, सूक्ष्म इन्द्रियां चेतन होती हुई प्रतीत होती हैं जो मन को नचाती हैं, जैसे मन बुद्धि को नचाता है और जैसे बुद्धि स्वयं को नचाती है . स्वयं जो आत्मा के सान्निध्य में समीपता का अनुभव कर सकता था, इतर सुखों के लिए लोभ से भरा नजर आता है, गिरने की भी कोई गरिमा होनी चाहिए न, आसक्ति उसी को तो कहते हैं जो आ तो सकती है पर जा नहीं सकती. सत्य में स्थित होना है तो हर आसक्ति को जाना होगा.



आज ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ कोर्स का तीसरा दिन था, सोचा था कि जायेगी पर शाम को प्रेजिडेंट का संदेश फोन पर पढ़ा, गवर्निंग बॉडी की मीटिंग बुलायी है. स्कूल में एक बच्चे को चोट लग गयी है. जब वहां गयी तो  पता चला आँख के ऊपर माथे पर दरवाजे से चोट लगी है, हाथ में हल्का फ्रैक्चर भी है, डिब्रूगढ़ ले जाना पड़ा है बच्चे को. प्रिंसिपल भी आयी थीं, दो शिकायतें भी आयी थीं दो बच्चों के माता-पिता की और से, दो अध्यापिकाओं के खिलाफ. शायद उन्होंने बच्चों पर ज्यादा कठोरता दिखाई थी. मीटिंग में और किसी विषय पर कोई बात नहीं हुई. क्लब के स्थापना दिवस पर सफाई का सेवा कार्य करने के लिए जो सुझाव व तस्वीर उसने भेजी थी, उस पर भी कोई टिप्पणी नहीं की किसी ने. जून आज गेस्टहाउस गए हैं, आजकल वह सेफ्टी विभाग भी देख रहे हैं कोई ऑडिटिंग टीम आयी है, जिसको पार्टी दी गयी है. जाने से पूर्व उन्होंने पिताजी से बात की, उन्हें जून का भेजा वेट वाइप्स का पैकेट मिल गया है.



ग्यारह बजने वाले हैं. अभी-अभी बिजली चली गयी. मौसम आज गर्म है. बाहर से एक कोयल के कूकने की आवाज आ रही है. नैनी ने बगीचे से ढेर सारी गाजरें लाकर दीं। आजकल फूलों से भी बगीचा भर हुआ है. पिटूनिया, गंधराज, श्वेत लिली, जरबेरा अपने पूरे शबाब पर हैं. माली भी इस हफ्ते रोज ही आ रहा है. उस समय जून आ गए, फिर दोपहर का भोजन, कुछ देर विश्राम, ब्लॉग लेखन, सांध्य योग कक्षा, रात्रि भोजन तथा बाद का भ्रमण, सब कुछ करने के बाद अब पुनः डायरी उठायी है, भोजन करते समय जून ने ‘कोकी’ बनाने  का वीडियो  दिखाया. किन्हीं पूनम जी ने इस सिंधी नाश्ते की अच्छी सी विधि सिखाई है. उनका कहना है पहली तारीख को मई दिवस पर दफ्तर बन्द है उसी दिन यह नाश्ता बनाएंगे. उसके बाद उन्हें शिवसागर जाना है. आज दो वर्ष पूर्व की डायरी में चेट्टीनाड की साड़ियों का जिक्र पढ़ा, जून अगले महीने फिर वहीं जाने वाले हैं. कल पुस्तकालय से दो नई किताबें लायी, एक ‘न्यू एज पेरेंटिंग’ पर है और दूसरी ‘जे पी वासवानी’ की लिखी है, जो परमात्मा के प्रति प्रेम से भरी हुई है. भक्ति और श्रद्धा जीवन में न हों तो जीवन कितने सूना-सूना रहता है. परमात्मा जो सदा ही मानव के साथ है, वह उससे दूर ही रह जाता है. वे पूरी तरह उसके प्रति समर्पित नहीं होते तो वह भी उन्हें पूरा नहीं मिलता. आज दोपहर को कितनी गहरी नींद आयी, पिछले दिनों रात की नींद गहरी नहीं थी, नींद में वे अहंकार से मुक्त हो जाते हैं और उस परम् के साथ एक हो जाते हैं. आज योग कक्षा में गुरूजी का ज्ञान सुनकर एक साधिका ने कहा, यह ज्ञान पहले मिला होता तो इतना दुःख नहीं सहना पड़ा होता. 

Thursday, October 3, 2019

नारियल स्ट्यू और अप्पम



नौ बजे हैं सुबह के, जून को आज पहली बार चेहरे पर एक हल्का सा लाल रैश दिखा, जिसका इलाज उन्होंने इस बार की बैंगलोर यात्रा में करवाना आरम्भ किया है, डाक्टर ने कहा, ये सूखे मेवों अथवा किसी दवा के कारण भी हो सकते हैं. कई वर्षों से कभी-कभी त्वचा पर रैशेस होते रहे हैं उन्हें  जो अपने आप ही कुछ देर में समाप्त हो जाते हैं. पिछले कई वर्षों से वह रक्तचाप की दवा ले रहे हैं. कल एक योग साधिका ने बताया उसके हाथ की उँगलियों के जोड़ों की त्वचा फट जाती है, एक अन्य को महीनों से जुकाम की शिकायत है, स्वस्थ रहना कितना कठिन हो जाता है उम्र बढ़ने के साथ-साथ. आज मौसम बादलों भरा है, हवा बंद होने से उमस भी है. कल दोपहर को कई दिनों बाद एक कविता लिखी. शाम को भजन गाये. उनका सुख भीतर है, किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति का गुलाम नहीं है, इस बात को स्वयं को बार-बार याद दिलाने की जरूरत है.

आज वे तिनसुकिया गये थे, फल व सब्जियां खरीदीं. जून का गोहाटी से लाया असमिया सूती सूट सिलने दिया और वहीं से डिब्रूगढ़ में अस्पताल चले गये. एक योग साधिका का किशोर बेटा चार दिनों से वहाँ इलाज करा रहा है. उसके बारे में सुना था पर पहली बार देखा. पीछे से देखा तो अच्छा-ख़ासा बड़ा लग रहा था, कद भी लंबा है, पर उसे बचपन से ही एपिलेप्सी के दौरे पड़ते आये हैं. मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर है. उसका मुख खुला था और पाइप लगा था, नाक में भी पाइप लगा था. शायद तकलीफ में होगा पर निकट जाते ही उसने हाथ पकड़ लिया और एकटक देखने लगा. चेतना जागृत थी भीतर. माता-पिता ने बताया ढाई वर्ष का था जब उन्हें पहली बार पता चला कि उनका पुत्र अन्य बच्चों से अलग है, तभी से भारत के कितने ही शहरों में उसे दिखा चुके हैं, आयुर्वैदिक इलाज भी करवाया पर विशेष लाभ नहीं हुआ. उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद घट गयी है सो जल्दी ही सर्दी-जुकाम पकड़ लेता है और जल्दी ठीक नहीं होता. पिछले वर्ष भी निमोनिया हो गया था. उन्होंने हालात से समझौता कर लिया है, और पूर्ण धैर्य के साथ उसके स्वस्थ होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. अस्पताल में ही रह रहे हैं, जहाँ खाना बाहर से मंगाना पड़ता है. ईश्वर ही उन्हें शक्ति दे रहा है. वापस आकर उसने भी भोजन बनाया, केरल की एक डिश पुदुअप्प्म या ऐसा ही कुछ नाम था, उसके साथ नारियल के दूध का हरी सब्जियों के साथ बना स्ट्यू. जून को नये-नये पकवान बनाने का शौक है. उसी समय एक परिचिता मिलने आई. वह इसी महीने के अंत में कम्पनी में नौकरी के लिए इंटरव्यू दे रही है. सम्भवतः जून भी जाएँ इंटरव्यू लेने, तब तो उनके लिए कठिनाई हो जाएगी.  

टीवी पर तेनाली राम आ रहा है. उनका दिन शुरू होता है 'संस्कार' से और समाप्त होता है 'सोनी' पर. आज जून ने भूटान जाने की टिकट बुक कर दी है. अगले महीने के अंतिम सप्ताह में वे कोलकाता होकर भूटान जाने वाले हैं. उसका जन्मदिन भी वहीं मनेगा इस बार. कल से 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' का बेसिक कोर्स आरम्भ हो रहा है. शाम को योग कक्षा में एक साधिका ने कहा, एक घंटे के कार्यक्रम में उसे सबसे अच्छा उसे अंत का ज्ञान स्तर लगता है. ज्ञान मुक्त करता है. उनकी गलत धारणाएं जो बंधन में डालती हैं, उन्हें तोडना है. आजकल माली ठीक से काम नहीं कर रहा है, शाम को मालिन को समझाया, अवश्य ही इसका कुछ तो असर होगा. स्कूल में चार बच्चों को स्टेज पर बुलवाकर आसन करवाए, वे आत्मनिर्भर बन सकें यही उसका प्रयास है.

आज इस मौसम में पहली बार तैरने का अभ्यास किया, आरम्भ में पानी ठंडा लगा पर बाद में शरीर अभ्यस्त हो गया. जाने से पूर्व मन में संशय था, कि महीनों से अभ्यास छूट गया है, पता नहीं कर पाएगी या नहीं ? जून ने स्वयं कहा कि उसे ड्राइविंग भी सीखनी चाहिए. उस दिन वह परिचिता जब घर आयी थी इंटरव्यू की बात करने, तब उस से यह भी कहा कि उन्होंने ही उसे जॉब करने नहीं दिया, अच्छा जॉब मिला भी नहीं. समय के साथ इंसान की सोच बदलती है. आज माली आया था सुबह, बगीचे में कई काम हुए. उसे रोज सुबह एक घंटा आने के लिए कहा है, पर वह अक्सर सुबह देर तक सोता है, कोई न कोई बहाना बनाता है अथवा तो पीकर सोने के कारण उठने की हालत में ही नहीं होता. आज दोपहर को भी योग करवाया, शाम की कक्षा में एक साधिका ने कहा, उसे आये दिन साधु-संतों के बारे में नकारात्मक बातें सुनकर गुरूजी के प्रति भी श्रद्धा नहीं जन्मी थी. पहले-पहल, ऐसा होना स्वाभाविक है, पर पता नहीं क्यों ऐसा सुनकर मन प्रतिवाद करने लगा. बाद में स्वयं ही स्वयं को समझाया कि आवाज ऊँची करने से ही कोई बात को सही समझ लेगा यह जरूरी तो नहीं. आत्मा के प्रकाश में स्वयं की भूल तुरंत दिख जाती है, कितनी बड़ी कृपा है यह परमात्मा की ! नैनी ने गुरूजी की तस्वीर के लिए माला बनाकर दी थी, एक साधिका आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर में होने वाले बेसिक कोर्स में जाते समय ले गयी थी. कल पहला दिन था, आज सुदर्शन क्रिया होगी, वे लोग फ़ॉलोअप के लिए कल जा सकते हैं.

Tuesday, September 24, 2019

भारत की बात सबके साथ



तीन बजने वाले हैं दोपहर के, आज महिलाओं के योगाभ्यास का दिन है. उन महिलाओं का जो घरों में काम करती हैं और अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग हैं. जिन्हें घर के कामों से समय निकालना मुश्किल लगता है पर योग करने में आनंद आता है. 'योग' कितना अनोखा शब्द है, इसके अनेक अर्थ हैं. हर साधक के लिए उसका अपना अर्थ ! परमात्मा से मिलन का नाम भी योग है और खुद को जानने के अभ्यास का नाम भी योग है. वह लिख ही रही थी कि एक महिला आयीं, उन्हें अकेले करने में झिझक हो रही थी, सो सभी बच्चों ने उनका साथ दिया और तभी और भी आ गयीं. एक घंटा साथ मिलकर व्यायाम, आसन, प्राणायाम तथा भजन किये. प्रेसिडेंट का फोन आया, तीन दिन बाद वार्षिक सभा है क्लब की. अभी तक मुख्य नये पदाधिकारीगण का चुनाव नहीं हो पाया है. आज सुबह समय पर उठे वे, पूरे दो सप्ताह बाद इस तेल नगरी की जानी-पहचानी डगर पर टहलने गये. जून के दफ्तर में आज समारोह था, कम्पनी को पहली बार एक पेटेंट मिला है, इसलिए दोपहर का भोजन वहीं था. रात को भी उन्हें बाहर जाना है. दोपहर को काफ़ी भोजन बच गया. बंगलूरू से एक नई तरह का राजमा लाये थे वही बनाया है. आज सुबह से ही बिजली आँख-मिचौनी खेल रही है, नया ट्रांसफार्मर लगा है या नया सबस्टेशन आरम्भ हुआ है इसलिए. जून को चश्मे का एक सुंदर केस मिला था बंगलूरू में, वह उसे दे दिया. घर काफी व्यवस्थित हो गया है. बहुत दिनों बाद स्वामी रामदेव पर आधारित धारावाहिक देखा, अब बालकृष्ण जी भी आ गये हैं इसमें. देश में महिलाओं और लडकियों पर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं, समाज में इतनी बेचैनी, इतनी असंवेदनशीलता कहाँ से आ रही है. लोगों के मन जैसे अपने नियन्त्रण में नहीं रह गये हैं.

आज का दिन मिला-जुला आरम्भ हुआ पर अंत सुखद है. कल रात्रि जून ग्यारह बजे लौटे. वह साहित्य अमृत पढ़ती रही. महीनों बाद उसका अप्रैल अंक आया था. उसके पूर्व कुछ देर टीवी देखा, उसके भी पूर्व अँधेरे में ध्यान किया, बिजली काफी देर तक गुल रही. योग कक्षा के बाद साधिकाओं को बंगलूरू से लाये सुगंधित द्रव्य के पैकेट उपहार में दिए. शाम को बगीचे में टहलते हुए आयुर्वेद पर एक पुस्तक पढ़ी. भारत की चिकित्सा व्यवस्था कितनी समृद्ध थी प्राचीन काल में. कल रात से नेट  नहीं चल रहा है. एक दिन यदि सुबह-सुबह फोन काम न करे तो..कितनी उलझन महसूस हो रही थी, ज्ञात हुआ कि फेसबुक और व्हाट्स एप किस तरह जीवन के अंग बन गये हैं. सवा नौ बजे मृणाल ज्योति गयी, बच्चों को योग-व्यायाम कराया. लौटकर कुछ देर पुस्तक पढ़ी, मन अपेक्षाकृत स्वीकार कर चुका था कि आज नेट नहीं चलेगा. दोपहर को जून ने कोई शिकायत भरा वाक्य कह दिया तो मन कुम्हला गया. परमात्मा ऐसी परिस्थति जानबूझ कर रचते हैं ताकि साधक को अपने अहंकार का बोध हो सके. मन यदि परेशान होता है तो इसका अर्थ ही है, अहंकार बना हुआ है. अहम् के रहते कोई सहज रह ही नहीं सकता. शाम को क्लब में टेक्निकल फोरम में एक भाषण सुनने जाना है.

कल शाम न्यूरोलोजिस्ट डाक्टर उपाध्याय का भाषण सुनने गये. लौटने में साढ़े नौ बज गये. लौटकर रात्रि भोजन किया, सोने से पूर्व प्रधानमन्त्री का कार्यक्रम देखा, 'भारत की बात सबके साथ'. उनका जोश, जज्बा और बातचीत बहुत प्रभावशाली है. देश को उन पर भरोसा है और देश के पास उनके सिवा कोई विकल्प भी तो नहीं है. साढ़े दस बजे टीवी बंद किया, सोने से पूर्व कुछ देर सद्वचन सुने. रात्रि को स्वप्न में डाक्टर साहब को पुनः बोलते देखा. वह कह रहे थे, दो तरह के लोग होते हैं एक सूर्य की तरह दूसरे चाँद की तरह. जून कह रहे हैं वह चाँद की तरह हैं. कल लौटते समय उपाध्याय जी ने कहा था, जो कुछ उन्होंने कहा है, कोई उसे ठीक से सुने, फिर पुनर्स्मरण करे तो वह धारण कर सकता है. कल भाषण सुना तो ध्यान से था, उसने सोचा अब रिकाल करती है फिर डायरी में रिटेन कर लेगी. उन्होंने वृद्धावस्था में होने वाली सामान्य बिमारियों का जिक्र किया था, जैसे रक्तचाप, शर्करा, भूलने की बीमारी, कंपवात, गठिया आदि. चालीस के बाद से ही व्यक्ति को अपना ध्यान रखना होगा, नियमित व्यायाम, टहलना आवश्यक है और फिर योग को पूरा अपनाना होगा. यम, नियम से समाधि तक, न कि केवल दो भाग-आसन व प्राणायाम ! वृद्धावस्था के लाभ गिनाते हुए कहा, उस समय व्यक्ति अपने समय का मालिक होता है. उसे समाज में सम्मान मिलता है, वह अपने पोते-पोती, नतिनी-नातियों के साथ अच्छा रिश्ता बना सकता है. यह भी बताया की वृद्धावस्था में देह में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं. मस्तिष्क की कोशिकाएं अर्थात न्यूरोन कम होने लगते हैं. आँखों का लेंस धुधंला पड़ जाता है. उन्होंने बताया, वैज्ञानिक अनुसन्धान कर रहे हैं कि कोशिकाएं सदा जीवित रह सकें, कोशिकाओं के मृत होने पर ही देह वृद्ध होने लगती है. अंत में कहा, प्रार्थना और ध्यान का बहुत महत्व है शरीर व मन को स्वस्थ रखने में.

Saturday, September 21, 2019

नंदी हिल पर एक सुबह



आज बैसाखी है. बाहर तेज धूप है. कुछ देर में वे आश्रम जायेंगे, उससे पूर्व बाजार, जहाँ जून को थोड़ा काम है. घर का सामान खरीदने की जिम्मेदारी उन्हीं की है, उन्होंने संभाली हुई है. आज सुबह देर से उठे वे, कारण कल रात देर से सोये. कल शाम डेंटिस्ट के यहाँ पहुँचे तो क्लिनिक पर कोई नहीं था. आठ बजे तक का समय सामने की दुकान पर काफ़ी पीकर व स्नैप सीड पर फोटो ठीक करके बिताया. कल दोपहर को दोनों मित्र परिवार आये थे. उन्हें पुलाव खिलाया, पुरानी यादें ताजा कीं, भविष्य के लिए योजनायें बनायीं और दो घंटे का समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. असमिया सखी तीन दिन बाद अपने पुत्र के यहाँ जा रही है, जिसके यहाँ सन्तान का जन्म होने वाला है. आज सुबह व कल शाम को ओशो पर बनी एक डॉक्युमेंट्री देखी. उनके आश्रम में क्या चल रहा था, वह उससे अनभिज्ञ तो नहीं रहे होंगे. जीवन विरोधाभासों से भरा है. इंसान जब अपने भीतर के पशु को पूरी तरह से देख लेगा, तभी उसके भीतर नये मानव का जन्म होगा, शायद इसीलिए ऐसा करते रहें हों वे लोग.

आज सुबह वे चार बजे से भी पहले उठे. कल शाम को ही नंदी हिल जाने का कार्यक्रम नन्हे ने बनाया था. नहा-धोकर वे तैयार हुए और पांच बजे उसके मित्र की कार लेकर निकल पड़े. रास्ते में ही लालिमा दिखाई दी, अर्थात सूर्योदय तो हो चुका था. लगभग डेढ़-पौने दो घंटे की यात्रा के बाद सुंदर पर्वत आरंभ हो गये. घुमावदार चढ़ाई पर कार के टायर घिसने लगे और एक गंध हवा में भर गयी. सैकड़ों लोग वहाँ पहुँच चुके थे. मौसम ठंडा था. बादल, धुंध और कोहरे के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. पेड़ों से गिरती पानी की बूंदों ने सडकों को गीला कर दिया था. हवा ठंडी थी. उन्होंने जैकेट पहन लिए थे और सिर भी ढक लिए थे. ऊपर कई रेस्तरां थे. एक जगह बैठकर चाय पी और एक प्लेट सांबर बड़ा में से सबने आधा-आधा बड़ा खाया, जिसका स्वाद अच्छा था, क्योंकि यह सुबह का पहला भोजन था. जगह-जगह वाचिंग टावर बने थे. जिसपर चढ़कर सूर्योदय तथा नीचे की घाटी का दृश्य देखा जा सकता था. थोड़ी देर बाद वहाँ बन्दर आने लगे, जो आदमियों को देखकर जरा भी नहीं डर रहे थे. कुछ समय बिताकर वे वापस आये तो पता चला कि गाड़ी का एक टायर पंक्चर हो गया है. रास्ते में पंक्चर ठीक कराया, बीस मिनट लगे, वापसी में परांठे की एक प्रसिद्ध दुकान पर नाश्ता किया, आलू, मूली, गोभी और पिज़ा परांठे का नाश्ता !

पौने दो बजे हैं दोपहर के. आज ओशो की फिल्म का अंतिम भाग भी देख लिया. उन जैसे व्यक्ति दुनिया में हलचल मचाने के लिए ही आते हैं. वे सोये हुए लोगों के भीतर क्रांति के जागरण का बीज बोते हैं. कल उन्हें वापस जाना है, पैकिंग लगभग हो गयी है. आज बीहू है, यहाँ हर दिन ही उत्सव है. नन्हा ढेर सारा भोजन ऑन लाइन मंगवा लेता है. सोनू ने केक बनाया है. जून ने आम काटे और कल नंदी हिल से वापसी की यात्रा में लिए काले अंगूर धोकर खिलाये. शाम को नन्हे के एक परिचित के यहाँ जाना है. बनारस के रहने वाले हैं. सुबह उसका एक सहकर्मी परिवार सहित आया था. नीचे बच्चों के तैरने की आवाजें आ रही हैं. सोसाइटी के तरणताल पर दिन भर रौनक लगी रहती है.

आज वे घर वापस लौट आये हैं. सुबह चार बजे से थोड़ा पूर्व ही उठे. साढ़े पांच बजे एयरपोर्ट के लिए रवाना हुए और साढ़े छह बजे पहुँच गये. कल शाम नन्हा और सोनू ढेर सारा सामान ले आये साथ ले जाने के लिए. अंजीर की बर्फी के रोल स्वादिष्ट थे और रिबन पकौड़ा भी. साढ़े ग्यारह बजे कोलकाता पहुँचे अगली फ्लाईट के लिए. हिन्दू, टाइम्स ऑफ़ इंडिया पढ़ते हुए समय बीत गया. साढ़े तीन बजे वे घर पहुँच गये. ढेर सारे फूल खिले हैं बगीचे में. सामने वाला गुलाबी फूलों वाला पेड़ फूलों से पूरा भर गया है. घर आकर सफाई आदि करते-कराते सात बज गये. नैनी अपनी देवरानी को ले आई, माली की दोनों पत्नियों को भी बुला लिया, चारों ने मिलकर सफाई की व कपड़े धोये.     

Thursday, September 19, 2019

फूलों की तस्वीर






आज कामवाली नैनी की जगह उसकी भांजी काम करने आयी है, उन्हें भी बाद में एक सहायिका को नियुक्त करना होगा, इतने बड़े घर की देखभाल व सफाई के लिए कोई तो चाहिए होगा. जून नेट फ्लिक्स पर 'तीन' देख रहे हैं, अमिताभ बच्चन की फिल्म है यह. उसे फ़िल्में देखने का जरा भी मन नहीं होता अब, जगत ही नाटक लगने लगे तो किसी और नाटक की जरूरत ही नहीं रहती. यहाँ आने के बाद एक बार भी तैरने नहीं गयी, मौसम सदा ही ठंडा रहता है, भीगा-भीगा सा. लेखन कार्य भी बंद है. अपना घर अपना ही होता है, यह बात उनके मन को कितना संकुचित कर देती है, अपना तो यह सारा जहान है !

दोपहर के बारह बजकर दस मिनट हुए हैं. मौसम हल्का गर्म है, धूप तेज है. शाम को मॉल जाना है. वाशिंग मशीन की एएमसी करके अभी-अभी कर्मचारी गया है. कल रात देर से सोये, नन्हा नये घर के लिए खरीदने वाली वस्तुओं की सूची बना रहा था. सोनू देर से लौटी, उसके बाद साढ़े ग्यारह बजे वे सोने गये. सुबह मन्दिर के बाहर बैठने वाली मालिन से फूल लेने गये, छोटी-छोटी दो मालाएं और गुलाब के ढेर सारे फूल ! वह मर्फी की किताब के साथ कार्नेगी की एक पुस्तक भी पढ़ रही है. जीवन को जब तक कोई दिशा नहीं मिलती, वे नया सीखने में उत्सुक नहीं रहते. आत्मा का स्वभाव है जानना, वह हर पल नयी है और नया सीखना चाहती है. अभी क्रोम बुक नही खोली है, आज की पोस्ट लिखनी है.

आज पूरा एक सप्ताह हो गया उन्हें यहाँ आए हुए. नन्हे व सोनू का घर बहुत सुंदर है, सारी सुख-सुविधाओं से पूर्ण, उनका आपसी व्यवहार भी बहुत अच्छा है, भरोसे और सहयोग से भरा ! शाम को नेत्रालय जाना है, परसों डेंटिस्ट के पास. इंटीरियर डेकोरेटर के पास सप्ताहांत में. आज बड़ी भाभी की तीसरी बरसी है. समय जैसे पंख लगाकर उड़ता है. आज सुबह पांच बजे नींद खुली. सुंदर स्वप्न चल रहा था, मुस्कान थी चेहरे पर जब आँख खुली. फूलों की तस्वीरें उतारीं. कल शाम को एक जगह सुंदर फूल देखे थे, पर आज सुबह नहीं थे, माली ने कटिंग कर दी, पता नहीं कहाँ फेंके होंगे श्वेत व रक्तिम वे पुष्प ! जून ने कल रात ढेर सारा पुलाव बना दिया, नन्हा सुबह टिफिन में वही ले गया है. जाने से पूर्व घर भी ठीक-ठाक कर के जाता है, उसे जरा भी काम नहीं करने देता. उसे अँधेरे से डर लगता है, बचपन में ही यह डर उसके मन में बैठा होगा. उसके खुद के मन में भी कितने भय के संस्कार थे, जिनका सामना करने से वे समाप्त प्रायः हो गये हैं. जून आज सुबह भविष्य के लिए चिंतित थे जब वे वृद्ध हो जायेंगे. यह घड़ी पर्याप्त है जीने के लिए, न कोई भूत सताये न भविष्य  सताये..वर्तमान का यह पल ही पर्याप्त है ! नेट पर एक लेख पढ़ा मछली खाने को लेकर, लेखिका को एक रोग है जो व्यक्ति को कमजोर कर देता है. गेहूँ, चावल, दूध के बने पदार्थ उन्हें नहीं पचते. उसे इतने बड़े विश्व में इस पल अथवा तो ज्यादातर समय किसी से कुछ लेना-देना नहीं होता, वह अपने आप में ही प्रसन्न है ! कोई जवाबदेही न हो किसी के भी प्रति, यही तो सच्ची आजादी है ! यह आजादी जिसने एक बार अनुभव कर ली वह भला क्यों बंधना चाहेगा ! सेवा का बंधन भी नहीं, कर्त्तव्य का बंधन भी नहीं..सदा-सर्वदा मुक्त और अपनी आजादी में जो हो उसे होने देना..जो अस्तित्त्व कराए हो जाने देना !

दस बजे हैं सुबह के, आज असमिया सखी आने वाली है, कई बार पहले भी उसने कहा, अंततः वे लोग यहाँ आ रहे हैं. हो सकता है एक और मित्र परिवार भी आये. आज बहुत दिनों बाद दीदी का ब्लॉग पढ़ा. शाम को बड़े भाई से बात की, कल दोपहर वह परेशान हो गये थे, अकेलेपन का दंश और भाभी की उपस्थिति का अभाव उन्हें चुभ रहा था, पर स्वयं को स्वयं ही समझाकर वह उस स्थिति से बाहर आ पाए. मन का काँटा मन से निकलता है फिर उस कांटे को भी फेंक देना है. मौसम आज अच्छा है, बाहर का भी और मन का भी !

Thursday, August 29, 2019

डेंटल क्लीनिक



सुबह के साढ़े दस बजे हैं. नन्हा व सोनू दफ्तर चले गये हैं. रात को नींद खुल गयी थी, असमिया सखी की बेटी का एक चेक लाना भूल गयी, कहाँ रखा होगा, इसके लिए मन में पुनः विचार आ गया. मन को इस गोल्डन रूल से समझाया, जो होता है अच्छा होता है. जो दूध गिर गया है उसके लिए क्या पछताना. मन ने खुद को उस दिन के लिए भी समझाया जब कोर्स के दौरान एक लड़की ने चेहरा धोने के लिए ठंडा पानी माँगा था और उसने देने में एक पल के लिए आनाकानी की थी, क्योंकि गर्मी बहुत थी और वह उसी समय खरीदकर लायी थी. स्वयं में ही व्यस्त रहने का जो सत्य कोर्स के दौरान दिखाया था वह भी याद आया. भोजन के प्रति आसक्ति स्पष्ट दिखी जब नाश्ते के बाद गुड डे बिस्किट अकेले खाया था. समूह में रहने का जो मौका कोर्स ने दिया उसका पूर्ण उपयोग नहीं किया, सबके साथ रहकर भी वह अकेले ही रह रही थी. गुरूजी कहते हैं, प्रवृत्ति और निवृत्ति साथ-साथ चलते हैं, जैसे श्वास का आना और जाना. जब वे ध्यान में हों तब सब कुछ छोड़कर अकेले हो जाना है पर जब व्यवहार में हैं तब स्वयं को भुलाकर दूसरे को ही प्राथमिकता देनी है. आज दोपहर जून की आँख का आपरेशन होना है.

रात्रि के आठ बजे हैं. आज का दिन व्यस्त रहा. सुबह छत पर टहलने गयी, सूर्योदय की तस्वीरें उतारीं. बाद में जून के साथ नीचे उतरे ड्राइव वे पर उसने चक्कर लगाये और जून बेंच पर बैठे रहे. उनकी आँख का आपरेशन कल ठीक से हो गया था. आज बच्चे घर पर हैं. नाश्ते में मेथी के परांठे बनाये कुक ने. दस बजे चेकअप के लिए नेत्रालय गये. साढ़े बारह बजे डेंटिस्ट के पास जाना था. काफी साफ-सुथरा व आधुनिक उपकरणों से युक्त क्लीनिक बहुत प्रभावित करने वाला था. रिसेप्शनिस्ट से लेकर डाक्टर, सहायक तक सभी का व्यवहार मधुर था. उसके दातों का फुल एक्सरे लिया. डाक्टर ने कहा, एक दांत निकालना पड़ेगा, एक ब्रिज लगाना है, एक दांत इम्प्लांट करना है. वापस आकर चार बजे दुबारा गये. डेंटिस्ट ने दांत निकाला और क्राउन के लिए दांत को घिसा. वहाँ से एक शोरुम में गये जहाँ किचन तथा वार्डरोब के मॉडल देखे. दांत में दर्द नहीं है. दो दिन बाद फिर जाना है. सोनू ने खिचड़ी बनाई है रात के खाने में. टीवी पर पद्मावत फिल्म आ रही है, जो उनकी देखी हुई है.

आज सुबह नन्हा उन्हें 'तिंदी ताजा' ले गया जो बंगलूरू का प्रसिद्ध रेस्तरां है, पर वहाँ लाइन लगी थी, सो एमटीआर पहुँच गये. सुबह अलार्म सुनकर नींद खुली पर न तो उठी न ही सजगता रही, सो महीनों बाद स्वप्न आरम्भ हो गया. मन स्वयं ही कल्पनाओं के जाल बुनता है और स्वयं ही उसमें फंस जाता है. सोनू घर को ठीक-ठाक करने में लगी है. उसने कल बेहद स्वादिष्ट केक बनाया था ब्लू बेरी डालकर जो जून लाये थे. उसने आज तेल लगाया और नूना को भी इसके लिए याद दिलाया. वह हर चीज का ध्यान रखती है और ज्यादा वादविवाद में नहीं पडती. कम बोलती है और धीरे भी.

आज यहाँ छठा दिन है, अभी छह दिन और शेष हैं. सुबह नींद जल्दी खुल गयी, नीचे टहलने गये तो अँधेरा था. चौकीदार सिर पर एक सफेद वस्त्र ओढे बैठा हुआ सो रहा था. जून के आपरेशन को हुए आज चौथा दिन है. अज वह अपने पुराने जोश में हैं. सिर पर पानी भी डाल लिया और किचन में कुक के साथ मिलकर पनिअप्प्म बनवाया. आज शाम को उनका भी एक डाक्टर के साथ अपॉइंटमेंट है, नन्हे की कम्पनी के एप द्वारा किया है. उसकी कम्पनी कितने लोगों का कितना भला कर रही है. कल शाम वे उनके नये घर गये थे, घर अब साफ-सुथरा हो गया है, अगले कुछ महीनों में वहाँ इंटीरियर का काम आरम्भ हो जायेगा. असम में सब कुछ पूर्ववत होगा, उसने सोचा नैनी को फोन करके घर की खबर लेगी. बस पौने दो वर्ष उन्हें और वहाँ रहना है, फिर बंगलूरू ही उनका निवास बन जायेगा. यह शहर सभी का स्वागत खुली बाहों से करता है.

Wednesday, August 28, 2019

जोसेफ मर्फी की किताब



रात्रि के आठ बजे हैं. यात्रा की तैयारी लगभग हो गयी है. अभी थोड़ी बहुत पैकिंग शेष है, जैसे तैरने का सामान, डायरी, किताबें आदि. शाम को लाइब्रेरी गयी दो नई किताबें इश्यू करायीं, एक सुधा मूर्ति की दूसरी डाक्टर जोसेफ मर्फी की 'पॉवर ऑफ़ सबकॉनशियस माइंड' शाम को योग कक्षा में कोर्स में सीखे चक्र-ध्यान के बारे में बताया, उन्हें डिवाइन शॉप से खरीदीं किताबें पढने को दीं और सकारात्मक चिन्तन करने को भी कहा. उससे पूर्व एक सहप्रतिभागी आया था, उसे हरिओम ध्यान के बारे में बताया. कोर्स के बाद जब सुबह स्कूल गयी तो तन बिलकुल हल्का था. योग सिखाते समय फिर एक पतंगा आकर सम्मुख बैठ गया था, परमात्मा का संदेश वाहक..आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर लिखा. काव्यालय की संस्थापिका के ब्लॉग को सब्सक्राइब किया, हर मंगलवार को उस पर पोस्ट आती है. नैनी ने अपनी बेटी के स्कूल प्रोजेक्ट के लिए कमल का एक सुंदर फूल बनाया, उसके लिए नयी ट्यूटर भी खोज ली है. उसके माता-पिता नहीं रहे जब वह छोटी थी, नानी के यहाँ रहकर पली, ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पायी पर अपने बच्चों को वह बहुत पढ़ाना चाहती है.

कल उन्हें यात्रा पर निकलना है. बड़ा सा सूटकेस जो वे ले जाने वाले हैं, काफी भारी हो गया है. कभी-कभी खुद भी उठाना पड़ सकता है, न भी पड़े तो जो भी उठाएगा उसकी कमर पर असर पड़ सकता है. आज विश्व ऑटिज्म डे है, शायद मृणाल ज्योति में कुछ आयोजन हुआ हो इस उपलक्ष में. बाहर बच्चों के झूला झूलने की आवाजें आ रही हैं, कल से उन्हें पूरा बगीचा मिल जायेगा. दीदी का फोन आया, दोपहर को वे दोनों सिडनी जा रहे हैं, एक डेढ़ महीना वहाँ रहेंगे. बेटी ने टिकट भेज दी है, पिछली बार तीन साल का वीजा मिल गया था, जिसमें हर वर्ष तीन महीने वे लोग सिडनी में बिता सकते हैं. बंगलूरू में उनके नये घर की चाबी मिल गयी है, वर्ष के अंत तक उसमें साज-सज्जा का कार्य हो जाना चाहिए. दोपहर की योग कक्षा में आज पहली बार छह महिलाएं आयीं, साथ में दस बच्चे.

आज सुबह चार से थोड़ा पहले उठे, और साढ़े पांच बजे तक तैयार थे. डिब्रूगढ़ से कोलकाता की उड़ान समय पर थी, जहाँ अगली फ्लाईट के लिए साढ़े पांच घंटे बिताने थे. डाक्टर जोसेफ मर्फी की पुस्तक पढ़ते हुए समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला. एक सखी बंगलूरू से वापस जा रही थी, कुछ देर उससे बात की. उसका पुत्र हैदराबाद में कानून पढ़ रहा है, जिसने आधुनिक कार्लमार्क्स कहे जाने वाले एक समाजविज्ञानी का इंटरव्यू लिया, बेटी बंगलूरू में जॉब करती है. रात्रि साढ़े आठ बजे घर पहुँचे तो नन्हा और सोनू घर आ गये थे. कुक खाना बना कर चला गया था. बड़े भाई की बिटिया और उसकी एक सखी भी आये थे, नन्हे का एक मित्र भी, सबने मिलकर रात्रि भोजन किया. मौसम गर्म था.

सुबह साढ़े पांच बजे उठे, साधना की फिर कुक के हाथ की बनी चाय पी. पोहा बनाया था उसने नाश्ते में, सोनू ने फल काट दिए. उसके बाद इंटीरियर डेकोरेटर से मिलने गये, जिसने ३डी डिज़ाइन दिखाए घर के, काफ़ी प्रभावित करने वाले थे. उसके बाद एक संबंधी के यहाँ लंच खाया, अगले महीने होने वाले उनकी बेटी के विवाह में आ नहीं पायेंगे, सो उसे उपहार दिया. एक सखी से बात की, उसकी देवरानी की बेटी जो बंगलूरू में रह कर पढ़ाई करती है, बुखार से पीड़ित है, वह उनके घर रहने आई है. जून ने बताया, उनके दफ्तर की वह महिला अधिकारी फिर अस्पताल पहुँच गयी है. जीवन कितना नाजुक है और क्षण भंगुर भी, बड़े जतन से इसकी देखभाल करनी पडती है. उसे स्मरण हो आया, घर पर महिलाएं योग करके वापस जा रही होंगी, वह चाबी देकर आई थी. यहाँ उसकी दिनचर्या बिलकुल बदल गयी है. नीचे पूल में बच्चों की आवाजें आ रही हैं.

Monday, August 26, 2019

मरणोपरांत स्तवन



आज कोर्स का तीसरा दिन था, सुबह छह बजे वे निर्धारित स्थान पर पहुँच गये थे. सुबह वह जल्दी तैयार होकर ड्राइवर की प्रतीक्षा कर रही थी तो कपोफूल के चित्र उतारे, फेसबुक पर पोस्ट भी किये. सुबह के सत्र में दो बार पद्म साधना करवाई गयी. नाश्ते में दलिया मिला, जो काफ़ी स्वादिष्ट था पर नमक थोड़ा कम था. एक प्रक्रिया करवाई गयी जिसमें अपनी पहचान बदल लेनी थी, एक महिला प्रतिभागी के साथ उसने अपनी पहचान बदली. वह पटना में रहने वाली अपनी जेठानी के व्यवहार से बहुत परेशान है. उत्तर भारत में विवाह किया जब वह दिल्ली युनिवर्सिटी में थी, एक पुत्री है पर अब डिस्टेंट मैरिज चला रही है, क्योंकि सरकारी नौकरी है उसकी स्कूल में. लेकिन वह आश्वस्त है कि शादी निभेगी. एक अन्य प्रक्रिया में एक नेता जैसे चलेगा समूह के सभी लोगों को वैसे ही चलना है. उससे दो बार भूल हुई इसमें, समूह के अन्य सदस्यों को सही करना है यदि कोई भूल करता है. दो बार योग निद्रा की, तीन बार भस्त्रिका प्राणायाम. देह में ऊर्जा का स्तर बढ़ गया है और बहुत सारी सीमाएं टूटी हैं. मन में जो बाधाएं थीं उनका भान हुआ है. गुरूजी का दूसरा सेशन था आज. उन्होंने कमिटमेंट के बारे में बहुत अच्छी तरह समझाया और प्रश्नों के उत्तर दिए. एक व्यक्ति कोर्स के दौरान परेशान हो गये और टीचर को उनकी कठोरता के लिए कुछ शब्द कहे. अहंकार को तोड़ने के लिए किये गये उपाय बताये गये हैं इस कोर्स में, सो अहंकार को चोट लगना स्वाभाविक है. प्रतिभागियों को उन तीन क्षेत्रों के बारे में लिखने को भी कहा जिनमें वे अटक गये हैं और आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं. कल रात्रि जो गृहकार्य दिया गया था, वह अद्भुत था. उनकी मृत्यु हो चुकी है और उन्हें अपनी मृत्यु के बाद eulogy लिखी है, अर्थात मरणोपरांत लिखने वाला संदेश लिखना है. आज सुबह उनका नया जन्म हुआ है, जीवन को अब नये दृष्टिकोण से देखना होगा. वे देह नहीं हैं, एक आत्मा हैं, जिसे यह देह मिली है. जिसके द्वारा उन्हें अपने जीवन की शेष कहानी लिखनी है, कुछ ऐसा करना है जिससे उनके इर्दगिर्द कुछ परिवर्तन आये. डीएसएन का यह कोर्स उसके जीवन में अवश्य ही एक परिवर्तनकारी मोड़ साबित होगा. सत्रह वर्ष पहले उसने बेसिक कोर्स किया था, इतने समय के बाद यह अवसर मिला है. अवश्य ही परमात्मा उसके जीवन की बागडोर उसके विवेक के हाथ में देना चाहते हैं न कि उसके मन के हाथों में. कल से खुली आँखों से ही जो भी दृश्य सोचती है मन में, देख पा रही है. शिवानी कहती है, मन सोचता है, बुद्धि दिखाती है. आज यह स्पष्ट हो रहा है. उनके मन की क्षमता अपार है, जिसे उलीचना उन्हें आना चाहिए.

आज कोर्स का अंतिम दिन था. टीचर का उत्साह देखते ही बनता है. उन्होंने प्रतिभागियों को प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. अब यह उन पर निर्भर करता है कि अपने लक्ष्य के प्रति वे कितने समर्पित हैं. इस समय रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. सुबह चार बजे उठी थी, पौने सात बजे से कोर्स आरंभ हुआ. पहले साधना, फिर टीचर ने शुभकामना कार्ड्स बनाने को कहा, बाद में पता चला निमन्त्रण पत्र बनाने हैं जो गुरूजी के जन्मदिन पर लोगों को बांटने हैं. एक प्रक्रिया में समूह के सभी लोग एक सदस्य को एक-एक कर उसकी एक भूल बताते हैं. उसे अन्तर्मुखी होने, खुद में ही व्यस्त रहने, अहंकारी होने तथा दूसरों की बात न सुनने का दोषी पाया गया. ये सारी बातें किसी हद तक सही हैं. अपने सामने उसे कोई कोई नजर नहीं आता क्योंकि दूसरा यहाँ कोई है ही नहीं. पर पारमार्थिक सत्य और व्यावहारिक सत्य में अंतर होता है. आज वे ज्ञान के मन्दिर भी गये. नाश्ता और भोजन आज दोनों ही विशेष थे और गरिष्ठ भी. टीचर ने अन्य सभी आर्ट ऑफ़ लिविंग टीचर्स को जिन्होंने यह कोर्स करवाने में मदद की, सामने बुलाकर सम्मानित किया और उनके अनुभव सुनवाये. इसी महीने पहला तथा अगले महीने दूसरा बेसिक कोर्स करवाना है, 'गतिमय उसे' भी इसमें सहयोग देना है. एक टीचर ने कहा, तीसरे महीने वह ध्यान का कोर्स भी करवाएगी. उन्हें गुरूजी के आध्यात्मिक सैनिक बनकर समाज में ज्ञान का प्रचार और प्रसार करना है. कोर्स के दौरान तीन तरह के लोगों की बात भी गुरूजी ने बताई. पहले वे जो दूसरों को सुख देते हैं, दूसरे जो लोगों के साथ सहज व्यवहार करते हैं और तीसरे वे जो अन्यों को परेशान करते हैं. इसी तरह कुछ लोग चींटी की तरह होते हैं, कुछ मक्खी की तरह, कुछ तितली की तरह और कुछ मधुमक्खी की तरह होते हैं. उन्हें समाज के लिए उपयोगी बनना है. सेवा का छोटा सा कृत्य भी उन्हें तृप्त कर देता है.


Friday, August 23, 2019

मेक इन इंडिया



पौने ग्यारह बजे हैं, अभी-अभी वह बाजार से आई है. उस सखी से बात की, सो रही थी. कल यहाँ से जाते समय उसकी आँख में नमी नहीं थी, पता नहीं उसका खुद का क्या हाल होगा. आज सुबह ध्यान के बाद पूरी हनुमान चालीसा पढ़ी बहुत दिनों बाद. बचपन में हर मंगलवार को बारह बजे पढ़ती थी दादी जी को सुनाने के लिए, स्कूल जाने से पहले. उसका स्कूल साढ़े बारह बजे से आरम्भ होता था, घर के बिल्कुल निकट ही था. आज दोपहर की योग कक्षा में महिलाओं को ग्रामीण महिला का योग कराया, आर्ट ऑफ़ लिविंग का सीडी चलाकर. चक्की चलाना, पानी भरना, धान लगाना, काटना और कूटना फिर साफ़ करना, सभी काम गाँव में आज भी किये जाते होंगे. शहर में तो टीवी देखना, स्मार्ट फोन पर संदेश भेजना ही मुख्य कार्य रह गया है, जिसमें जरा भी दैहिक श्रम नहीं होता. आज ग्वारफली की सब्जी बनाई है उसने जो वे डिब्रूगढ़ से लाये थे.

कल शाम को जैसे ही योग कक्षा समाप्त हुई, जून के विभाग की एक महिला अधिकारी का फोन आया, वह अस्पताल में थी, उसे साँस लेने में तकलीफ हो रही थी. वे गये और आठ बजे लौटे. उसे डिब्रूगढ़ ले जाया गया, अवश्य अब वह ठीक होगी. पिछले हफ्ते भी एक दिन उसे श्वास की समस्या हुई थी, पर कल वह मानसिक रूप से भी काफी परेशान लग रही थी. परमात्मा उसे शक्ति दे ताकि वह इस रोग से बाहर निकल सके. फुफेरे भाई से फोन पर बात हुई, बुआ जी अभी भी कोमा में हैं, पानी भी नहीं जा रहा है उनके मुख में, पर निकल रहा है, शायद देह का रक्त व अन्य पदार्थ अवशिष्ट के रूप में निकल रहे हैं. जून को कल गोहाटी जाना है. भारत सरकार के 'मेक इन इंडिया' के अंतर्गत गोहाटी आई आई टी भी उन्हें जाना है.

मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ है आज. आकाश काले मेघों से घिर आया है और गर्जन-तर्जन भी आरम्भ हो गया है. नन्हे से बात हुई, वह पिछले दस दिनों से बहुत व्यस्त है. दफ्तर में बजट का काम चल रहा था, फिर किसी सीनियर मार्केटिंग मैनेजर  ने एक ऐसा विज्ञापन दे दिया, जिससे कुछ लोग नाराज हो गये और कानूनी कार्यवाही की बात करने लगे. कम्पनी का नाम बदनाम हो या उन पर कोई इल्जाम आये, इसे बचाना बहुत जरूरी है. जून का फोन आया, उस महिला अधिकारी को थायराइड की समस्या है. हवाई अड्डे जाने से पहले वे उसे देखने अस्पताल गये थे.

रात्रि के सवा दस बजे हैं. शाम को साढ़े चार बजे वे कोर्स के लिए गये, एक सखी का पुत्र भी यह कोर्स कर रहा है. एओल टीचर का उत्साह देखने लायक है, ऊर्जा और ज्ञान से भरपूर हैं वह. उन्होंने बताया, अधिकतर लोग कुछ नया सुनना नहीं चाहते, वे अपने कम्फर्ट जोन में रहना चाहते हैं और चुनौती को स्वीकार नहीं करते. इसीलिए जीवन में जड़ता है, उन्हें इस सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा, लोगों तक पहुंचना होगा और अपनी क्षमताओं को पहचानना होगा. कल सुबह साढ़े पांच बजे तक तैयार हो जाना है. आज 'पद्म साधना' भी करवाई. गृहकार्य में पन्द्रह लोगों से फोन पर बात करने को कहा है. आठ से ही हो पाई, उसने सोचा, सात को संदेश भेज देगी.

रात्रि के साढ़े नौ बजे हैं. आज का दिन कितना अलग है. अभी कुछ देर पहले ही रोटरी क्लब के हॉल से लौटी है, जहाँ डीएसएन कोर्स चल रहा है. आकर दूध-रस्क का भोजन किया. शाम को गुरूजी का ऋषिकेश से विशेष प्रसारण था, उन्होंने बहुत अच्छी बातें बताईं. कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने पर उनका कम्फर्ट जोन बढ़ जाता है. उन्हें अपने मूड्स को चलाना है न कि मूड्स के द्वारा चलाया जाना है. जीवन में प्रतिबद्धता न हो तो जीवन को एक दिशा नहीं मिलती और जीवन एक अधखिले फूल की तरह रह जाता है. उन्होंने कहा कि जीवन में गति के लिए सबसे पहली आवश्यकता है सुख के दायरे से बाहर निकलने की और दूसरी आवश्यकता है उत्साह तथा मन की निर्मलता व स्पष्टता की और तीसरी बात उन्हें विचारनी है, उन्हें ऐसा क्या करना चाहिए कि जीवन गतिमान बना रहे. यदि जीवन में कोई आकस्मिकता आ जाये या कोई विघ्न आ जाये तो वे कम्फर्ट जोन से बाहर निकलते हैं.या मन में बहुत उत्साह हो तो वे कुछ करना चाहते हैं. प्रेम या लोभ से प्रेरित होकर भी वे कुछ करना चाहते हैं. गुरूजी की वार्ता से पहले सत्संग हुआ, उसके पूर्व आसन, प्राणायाम व ध्यान. दो बार सभी लोग बाहर भी गये, एक बार समूह क्रिया में उन्हें लोगों से बेसिक कोर्स के लिए फॉर्म भरवाने थे और दूसरी बार लोगों को ख़ुशी के कार्ड बांटने. कोर्स के दौरान एक प्रक्रिया में उन्हें अभिनय करना था और दूसरी में उन दो घटनाओं का जिक्र करना था जिसमें उन्होंने उत्तरदायित्व निभाया या नहीं निभाया. उनके समूह में आठ लोग हैं. कल सुबह भी छह बजे पहुँचना है. आज सुबह ही छोटे भाई का फोन आ गया था. बुआ जी का कल रात देहांत हो गया, आज अंत्येष्टि क्रिया भी हो गयी. तीन दिन बाद उठाला है. एक जीवन की कहानी समाप्त हो गयी.  

Thursday, August 22, 2019

बैलीनो कार ड्राइव



आज भी दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह उठी तो सिर की चोटी पर हल्का सा दर्द था, पर देह पर सभी जगह सहजता थी, सो ध्यान वहीं ले गयी और दर्द का ख्याल जाता रहा. दोपहर को डिब्रूगढ़ में ब्रह्मपुत्र पर बने नये पुल को देखने वे गये. यात्रा अच्छी रही. वापसी में छोटे भाई का फोन आया, बुआ जी कोमा में चली गयी हैं, उन्हें मृत समझकर एक बार नीचे लिटा दिया गया था पर डाक्टर ने कहा, नब्ज अभी चल रही है. जीवन का अंत भी कितने विचित्र तरीकों से होता है. लौटकर वे तैयार हुए और एक परिचिता के यहाँ भोज आमन्त्रण में गये. उसकी माँ से खूब बातें हुईं, उसके पिताजी नब्बे वर्ष के हैं और उम्र के हिसाब से काफ़ी ठीक हैं. 

सुबह नींद देर से खुली, रात्रि को घर आते-आते साढ़े दस बज गये थे. मौसम गर्म था, और कमरे में एक मच्छर भी आ गया था, सो नींद आती-जाती रही. सुबह की दिनचर्या को नियमित रखा, रविवार होने के कारण जल्दी नहीं थी. नाश्ते में अखरोट, भीगे बादाम, खुबानी, और च्यवनप्राश के रूप में पौष्टिक आहार भी था. जून को बैलीनो कार की टेस्ट ड्राइव पर जाना था, जो वह बंगलूरू जाकर खरीदना चाहते हैं. वह अपनी पिछली यात्रा के दौरान ही खरीदना चाहते थे पर नन्हे ने मना कर दिया. आर्ट ऑफ़ लिविंग के दो टीचर मिलने आये तब वह वापस आ चुके थे. उन मित्र के घर गये जिनका सामान ट्रक में लोड हो रहा था, उसे भविष्य का वह दिन कल्पित हो आया जब उनका सामान भी इसी तरह चढ़ाया जा रहा होगा. तीन दशक के असम प्रवास के बाद वे जब यहाँ से जायेंगे तो कितनी स्मृतियाँ साथ ले जायेंगे. दोपहर को बच्चों की योग कक्षा थी, वे उत्साह से भरे थे, दो घंटे कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. रात को सहजन के फूलों की सब्जी बनाई उसने. 

सवा दस बजे हैं सुबह के यानि प्रथम प्रहर बीत चुका है. सुबह अलार्म सुनाई दिया, पर बंद कर दिया, कुछ देर बाद कोई आवाज सुनाई दी, फिर दोबारा सुनाई दी और नींद खुल गयी. परमात्मा उनसे अकारण प्रेम करता है, प्रेम उसका स्वभाव है, उसके प्रति हृदय कृतज्ञता से भर गया. घूमने गये, सड़क भीगी हुई थी, रात को कभी पानी बरसा होगा. स्कूल से वापसी में उस सखी से मिलने गयी शाम को वे लोग जा रहे हैं, शाम को फिर उनसे मिलने जायेंगे, उसकी माँ के लिए खाना बनाकर ले जाना है. बाहर बिजली की तार बिछाने का कोई काम चल रहा है, नैनी की आवाज भी आ रही है, जितना धीरे वह यहाँ बोलती है उतना ही तेज घर पर बोलती है. कल शाम को घर में झगड़ा कर रही थी, मारपीट पर भी उतर आते हैं ये लोग, बाद में उसे बुलाकर समझाया और सबके लिए चाय बनाकर ले जाने को कहा. उनके जीवन में शांति और प्रेम के कुछ क्षण आएं, ऐसा उसका मन सदा ही रहता है. फोन नहीं चल रहा है कल से सो वाई फाई भी नहीं चल रहा है. फोन पर डाटा है सो ठीक है. अभी-अभी बुआजी को स्काइप पर देखा, वह शांत भाव से लेटी हैं, इस दुनिया में होकर भी यहाँ नहीं हैं जैसे. एक बार आवाज निकाली और मुंह बंद किया, उनकी श्वास चल रही है पर न बोल रही हैं, न ही सुन रही हैं. मृत्यु के कितने नये-नये ढंग हैं इस दुनिया से ले जाने के. शाम की योग कक्षा में आर्ट ऑफ़ लिविंग टीचर आई थी, कोर्स में भाग लेने के लिए कहने पर सभी साधिकाओं के साथ कोई न कोई समस्या है. जीवन उन्हें अवसर देता है पर वे व्यस्त होते हैं, उसने भी न जाने कितने अवसर गंवा दिए हैं. शायद जब तक सारे संयोग न मिलें, कोई कृत्य नहीं हो पाता. दोपहर को बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर लिखा.